देवोत्थानी एकादशी का वैज्ञानिक विवेचन

सुप्रभातम
आज देवोत्थान एकादशी की शुभकामनाएं।
देवोत्थान क्या होती है?
यह तिथि देवों के उठने की तिथि है।
तो क्या देव अभी तक सोए हुए थे?
नहीं,देव कभी नहीं सोते।
जब देव सोते ही नहीं तो देवों के उठने से क्या तात्पर्य है?
इसके लिए पहले हम यह समझ लें कि देव किसको कहते हैं।
देव उसके लिए कहा जाता है जो कुछ देते हैं।
ऐसे ही देवों में हमारे पंडित, विद्वान, आचार्य, ऋषि, मुनि, अतिथि आदि होते हैं। जो हमको जीवन जीने की कला और ईश्वर प्राप्ति अथवा मोक्ष प्राप्ति की शिक्षा देते हैं,हमको आचरण सिखाते हैं,हमको मनुष्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हमको ज्ञान देते हैं। ज्ञान भी तत्व ज्ञान देते हैं। ज्ञान भी सत्य ज्ञान देते हैं। तत्वज्ञान और सत्य ज्ञान से हमारी अविद्या का नाश करते हैं। अविद्या ही सभी दोषों का कारण है, क्लेशों का कारण है। अविद्या के नष्ट होने पर शेष 4 क्लेश अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश स्वयं नष्ट हो जाते हैं। तथा व्यक्ति मोक्ष की तरफ चल पड़ता है। यह उन देवों की भूमिका है हमारे जीवन में।
उपरोक्त के अतिरिक्त हमको यह भी समझना है कि आषाढ़ मास की अमावस्या के पश्चात आने वाली नवमी को देव सो जाते हैं।
नहीं ,तब भी देव नहीं सोते। यदि सोए हुए होते तो फिर जागते भी।
फिर इसका क्या तात्पर्य है कि आषाढ़ मास की नवमी से देव सोए मान लिए जाते हैं?
सर्वप्रथम इस पर ही विचार करते हैं।
आषाढ़ मास की अमावस्या के पश्चात आने वाली नवमी को शादियां एवं अन्य शुभ कार्य बंद कर दिए जाते हैं। क्योंकि इस तिथि तक उत्तरी भारत में वर्षा ऋतु का पूर्ण प्रभाव आ चुका होता है। यह भी हमारे अनुभव में आया है कि वर्षा ऋतु में आवागमन के साधन बाधित हो जाते हैं। वर्षा ऋतु में बने हुए खाने में कीट पतंग के पड़ने की संभावना अधिक रहती है। वर्षा ऋतु में बनाए गए भोजन में वर्षा आ जाने पर वर्षा के पानी के मिल जाने की संभावना अधिक रहती है ।जिससे भोजन का स्वाद, रोचकता प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है। वर्षा ऋतु के काल में हमारे आचार्य ,पंडित, विद्वान्, ऋषि मुनि अतिथि बनकर ईश्वर की चर्चा करने के लिए गांव की तरफ जंगल से अपनी कुटिया से आ जाया करते थे । और गांव में चौपाल पर या बैठकों पर बैठकर अपने उपदेश दिया करते थे। समाज का ,राष्ट्र का निर्माण किया करते थे।क्योंकि वर्षा ऋतु के काल में जंगल में जंगली जानवरों का प्रभाव अधिक हो जाता है। उससे बचने के लिए और जगत के कल्याण के लिए ऋषियों, मुनियों और आचार्यों का आबादी की तरफ आगमन होता था ।वे ईश्वर की चर्चा किया करते थे। चर्चा के पश्चात भोजन की व्यवस्था होती थी। उस ईश्वर की चर्चा को, उस ईश्वर की उस कथा को श्रावण मास में अधिक श्रवण किया जाता था। श्रवण करने के उपरांत पवित्र भोज खीर परोसा जाता था। इससे ही अपभ्रंश होकर श्रावण मास में वेदों की, उपनिषदों की, शास्त्रों की, ईश्वर की, मोक्ष की प्राप्ति की बात न करके केवल खीर खाने की प्रथा रूढ हो गई।
इसलिए भी वर्षा काल में शादियों का कार्यक्रम रोक दिया जाता था। जिसको देव सोना कहते हैं।
कार्तिक मास की अमावस्या के पश्चात आने वाली एकादशी को यह अनुमान लगाया जाता है कि पूरे उत्तरी भारत से वर्षा काल समाप्त हो चुका है। आवागमन के साधन जहां वर्षा के कारण बिगड़ गए थे वह भी लगभग ठीक कर लिए जाते थे। क्योंकि पहले पूर्व काल में अधिकतर रास्ते कच्चे होते थे तथा कच्ची सड़क होती थी ,इसलिए आवागमन बाधित होता था।
इसलिए हमारे आचार्य ,पंडित, विद्वान, ऋषि ,मुनि अपने ठहरने के स्थान से उठकर जंगल की तरफ चले जाते थे । आवागमन के साधन ठीक हो जाने पर विवाह शादी के कार्य होने लगते थे।
उन देवों का उसे सार्वजनिक चौपाल अथवा बैठक से उठकर अपने स्थान से जंगल की तरफ प्रस्थान करना ही देव -उत्थान कहा जाता था।
जो अब बिगाड़ कर देव उठनी एकादशी कहते हैं।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ना तो देव सोते हैं और न देव जागते हैं। बल्कि यह ऋषि, मुनियों और अतिथियों के आने और उठकर अपनी कुटिया में पुनः जंगल की तरफ चले जाने से संबंधित है।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट अध्यक्ष उगता भारत समाचार पत्र
चलभाष 9811 838317

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