मानव अधिाकार हमारे स्वभाव मे अंतर्निहित हैं

अनिल पारासर

गतांक से आगे : परिणामस्वरूप यह आवश्यक हो गया कि कुछ अन्य उभरते हुए मानव अधिकारों के नए प्रतिमानों को मान्यता दी जाये, जो अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय निकायों द्वारा अपनी मान्यता हेतु दस्तक दे रहे हैं। उस श्रेणी से संबंधित पांच मुख्य मानव अधिकार है, जिन्हें मानव अधिकारों की तीसरी पीढ़ी कहा जा सकता है। 1. शांति का अधिकार, 2. विकास का अधिकार, 3. स्वस्थ्य पर्यावरण का अधिकार, 4. मनुष्य की सामान्य विरासत का उपयोग करने का अधिकार, 5. मानवीय सहायता का अधिकार।

आतंकी संगठनों द्वारा तथा कभी-कभी कुछ राष्ट्रीय सरकारों के समर्थन से विश्व के विभिन्न भागों में की गई हाल की घटनाओं ने जीवन को अत्यधिक संकटपूर्ण बना दिया है।

शांति के अधिकार के महत्व पर अत्यधिक जोर नहीं दिया जाना चाहिए। बढ़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद,जो घातक हथियारों द्वारा मासूम लोगों की नृशंस हत्या, का रूप अखत्यार करता है, प्रच्छन्न एवं खुला दोनों ही रूप में अंतर्राष्ट्रीय आक्रमण, हवाई जहाजों के अपहरण आदि ने सरकारों को अस्थिर करने तथा दुनिया के लोगों के दिमागों में एक अंतहीन डर पैदा करने का कार्य किया है। आतंकी संगठनों द्वारा तथा कभी-कभी कुछ राष्ट्रीय सरकारों के समर्थन से विश्व के विभिन्न भागों में की गई हाल की घटनाओं ने जीवन को अत्यधिक संकटपूर्ण बना दिया है। इसने वास्तव में मानव सभ्यता के उत्कृष्ट पहलुओं के विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। मानव जाति से संबंधित सभी सदस्य संसार में शातिपूर्वक जीने के हकदार हैं। दुर्भाग्यवश विश्व के अन्य जीवों, जिनमें राक्षणी क्षमता अंतर्निहित नहीं होती से विपरीत केवल मनुष्य ही है जो इतना नृशंस हो जाता है कि अपनी ही जाति की हत्या करता है। शांति का अधिकार विश्व के विभिन्न भागों में रहने वाले व्यक्तियों के समूह का एक सामूहिक अधिकार है। उनके लिए शांति सुरक्षित रखने हेतु प्रत्येक प्रयास किया जाना चाहिए। शांति बनाये रखने के लिए एक प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय यंत्रावली होनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर अपनाए गये वर्तमान प्रबंध शांति लागू करने में असफल रहे। संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्रा का इन 43 वर्षों में अर्जित अनुभवों की दृष्टि से पुनः मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

विकास दशाएं केवल तभी पक्ष में हो सकती हैं यदि आर्थिक उन्नति एवं सामाजिक कल्याण को प्राप्त करने हेतु सभी उपलब्ध संसाधनों की गतिशीलता हेतु शांति का सामान्य वातावरण हो तथा यदि व्यक्ति की गरिमा की पूर्ण स्वीकृति द्वारा अपेक्षित मान्यता दी जाये। परंतु यह बात भी समान रूप से सच है कि मानव अधिकारों का संवर्धन तथा बढ़ी संख्या में जनता की भौतिक जीवन की दशाओं में सुधार के बिना शाति को पुनः लागू करना अकल्पनीय है जिसे केवल विकास द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। इसका अनिवार्य अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य विकास का लाभ तथा दशाओं एवं अवसरों की प्रभावी समानता प्राप्त करने में तत्काल सक्षम हों, बल्कि यह है कि सभी के सुधार हेतु अभियान को सभी के लिए आरंभ किया जाये। सबसे स्पष्ट दृष्टिगत बुराइयों को अवश्य दूर किया जाना चाहिए। न्याय की आवश्यकता के अनुसार जीवनयापन की स्थितियों में सुधार किया जाना चाहिए। उनके विकास हेतु अपनाए जाने वाले उपायों से संबंधित निर्णयों में लोगों की भागीदारी होनी चाहिए। उन्हें स्वयं सुधार की प्राप्त संभावनाओं हेतु नए शिविर खोलने चाहिए।

दुर्भाग्य से यह विश्व जो इस शताब्दी के प्रारंभिक भाग में उपनिवेश और उपनिवेशी ताकतों मे विभाजित था। पूर्व में उपनिवेश रहे देशों के राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के बावजूद अभी भी उसी स्थिति में रह रहा है। कम वस्तु मूल्य और सस्ते श्रम की उपलब्धता की अदायगी पर उनके प्राकृतिक संसाधनों का शोषण पूर्ववत निरंतर जारी रहा है तथा विश्व के विकसित देश जिन्होंने अत्यधिक उच्च तकनीकी विकास हासिल कर लिया है। निरंतर गरीब देशों के ऐसे शोषण से अधिकतम लाभ कमा रहे हैं। लगभग प्रत्येक विकाशील देश कर्ज के जाल में फंसा है और किसी प्रकार की प्रगति करने में स्वतंत्रता नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और अमीर देशों द्वारा भी ली जा रही ब्याज की उच्च दर इतनी ज्यादा है कि उसे वहन नहीं किया जा सकता। जुलाई 1988 में हरारे में आयोजित गुट निरपेक्ष देशों की बैठक में इसी समस्या पर चर्चा की गई थी। विश्व के कुछ हिस्सों में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज से आई तेजी ने निःसंदेह कुछ पिछड़े देशों को आगे बढ़ने में सहायता की है। किंतु ये देश विकासित देशों द्वारा तैयार हथियारों और उपभोक्ता सामान के बाजार बन गये हैं जिसके परिणाम स्वरूप इन देशों के धन का बहुत बड़ा हिस्सा अमीर देशों में स्थानांतरित हो गया है।

कुल मिलाकर एशिया और अफ्रीका में विश्व का बहुत बड़ा हिस्स अविकसित रहा। हथियारो पर खर्च हुई राशि करोड़ों डॉलर में है जबकि विकसित देशों में लोगो के खाने के लिए पर्याप्त भोजन और पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं। इन देशों में रहने वाले ज्यादातर लोग झुग्गी-झोपडि़यों में रह रहे हैं। उनके पास न्यूनतम शिक्षा सुविधाओं और स्वास्थ्य देखभाल की भी कमी है। वे भूख, निरक्षरता, गंदगी और बीमारियों से निरंतर पीडि़त हैं। उत्तर और दक्षिण के बीच संवाद लगातार निष्फल और असफल हो रहे हैं। उत्तर-दक्षिण सहयोग व्यापक रूप से अभी प्रारंभ नहीं हुआ है। आर्थिक रूप से विकसित और विकाशील देशों में बढ़ती दूरी ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में मानव अधिकारों के उपयोग में रुकावटें पैदा की हैं।

बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1986 में विकास के अधिकार को सामूहिक मानव अधिकार के रूप में पहचानते हुए एक संकल्प पारित किया। फिर भी विकाशील देशों के पास अधिकारों के कार्यान्वयन हेतु पर्याप्त साधन नहीं हैं।

(क्रमशः)

 

 

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