भारतीय इतिहास का एक रहस्य पानीपत का युद्ध – १७६१

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लेखक – स्वामी ओमानंद सरस्वती, गुरुकुल झज्जर
१४ जनवरी १९६१ को पानीपत के प्रसिद्ध युद्ध को, जो मराठों और अहमदशाह अब्दाली के मध्य हुआ, पूरे २०० वर्ष हो गये। पंजाब सरकार के माननीय राज्यपाल श्री नरहरि विष्णु गाडगिल ने घोषणा की है कि “पानीपत के युद्ध की द्वितीय शताब्दी इस वर्ष मनाई जायेगी तथा इस विषय में एक पुस्तक भी प्रकाशित की जायेगी”। ऐसी अवस्था में इसी पानीपत के युद्ध के विषय में एक रहस्य का उद्घाटन करना मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ। वैसे तो मैं पानीपत के सभी युद्धों पर विस्तार पर लिखना चाहता हूँ, परन्तु वह ईश कृपा से फिर कभी होगा। अब तो सभी इतिहास लेखकों की सेवा में इतना ही निवेदन करना चाहता हूँ कि पानीपत की युद्धभूमि से मराठा सेनापति श्री सदाशिवराव भाऊ किस प्रकार लुप्त हो गया और उसने बहुत वर्षों तक हरयाणा प्रान्त में साधु बनकर गुप्त रूप से रहस्यपूर्ण जीवन व्यतीत किया। जिसके विषय में आज तक सभी इतिहास लेखक अंधकार में हैं। आज सर्वप्रथम मैं इतिहासप्रमियों तथा इतिहासज्ञों की सेवा में अनेक वर्षों की खोज के पश्चात् संक्षेप में लिख रहा हूँ कि मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ पानीपत के युद्ध में मारा नहीं गया अपितु वह लड़ता लड़ता सांघी ग्राम (जि० रोहतक) में पहुंच गया और वहां साधु बनकर अनेक वर्षों तक जीवित रहा तथा अनेक ग्रामों में भ्रमण करता रहा।
जितने भी इतिहास लेखक हैं, प्रायः यही लिखते हैं कि भाऊ लड़ते लड़ते मारा गया, कुछ यह लिखते हैं – न मालूम कहां चला गया। उदाहरणार्थ कुछ के मत उद्धृत करता हूँ –
त्र्यम्बक शंकर शेजलाल्कर बी० ए० जिन्होंने पानीपत १७६१ नाम की पुस्तक बड़े पुरुषार्थ और खोज करके लिखी, वे लिखते हैं कि – नाना फडनवीस अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि
“भाऊ अन्त तक लड़ता रहा जबकि केवल ५० घुड़सवार सैनिक उसके पक्ष में लड़ रहे थे। तत्पश्चात् नाना फडनवीस उसे छोड़कर पानीपत की ओर चल दिया। युद्ध का अन्तिम समय था, उस समय दोपहर पश्चात् ४ बजे थे। भाऊ का क्या बना, यथार्थ में कोई व्यक्ति नहीं जानता।”
आधुनिक इतिहास के लेखक प्रो० आशीर्वादीलाल, अध्यक्ष इतिहास विभाग, आगरा कालिज, मुगलकालीन भारत में लिखते हैं –
“यह पानीपत का युद्ध पूर्णरूप से निर्णायक सिद्ध हुआ, मराठा सेना तथा उसके नायकों का सर्वनाश हो गया था। मराठा शक्ति का इतना अधिक विनाश हो गया था कि ३ महीने तक तो पेशवा को हताहतों का वास्तविक ब्यौरा तथा भाऊ एवं दूसरे नेताओं की मृत्यु का समाचार मिल ही न सका।”
श्री देवतास्वरूप भाई परमानन्द जी एम० ए० तारीख महाराष्ट्र में लिखते हैं –
राजकुमार विश्वासराव को एक गोली लगी, जिससे वह बुरी प्रकार से जख्मी हो गया। विश्वासराव महाराष्ट्र में सबसे सुन्दर माना जाता था। सदाशिवराव उससे बहुत स्नेह करता था। उसी ने इसे युद्धकौशल सिखाया था। विश्वासराव को गिरता देख भाऊ पर विद्युत् सी गिर गई। उसका साहस टूट गया। उसकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगी और अपनी स्त्री पार्वती देवी को उसने कहा अब वह किस मुंह से पेशवाओं के सम्मुख जायेगा। रोते हुये और सिसकियाँ लेते हुए उसने एक बार विश्वास! विश्वास! करके पुकारा। मरते हुये राजकुमार ने अपनी आँखें खोलीं और वीरों के समान उत्तर दिया – “प्रिय चाचा! अब मेरी अवस्था पर दुःखी होने की क्या आवश्यकता है? मुझे भय है जब आप यहाँ बैठकर ऐसे करेंगे तो युद्ध का परिणाम हमारे पक्ष में अच्छा न होगा। सदाशिवराव अपने सैनिकों को ‘काटो, मारो’ के शब्दों द्वारा उत्साहित करते करते आगे बढ़ रहा था। बोलते बोलते उसकी आवाज बैठ गई थी। वह विवश हो अपने संकेतों से ही सैनिकों को उत्साहित करता हुआ मृत्यु के मुख में आगे बढ़ा। मुकुन्दशिन्दे ने इसके घोड़े की बाग पकड़ ली और कहा – “इस समय पीछे हट जाने में ही बुद्धिमत्ता है”। किन्तु भाऊ नहीं माना। वह खड्ग हाथ में लिये शत्रुओं के मध्य में घुस गया, अपने कथन के अनुसार लड़ता हुआ न मालूम किधर चला गया (गुम हो गया)।
युद्ध के पश्चात् क्या हुआ, इस विषय में भाई परमानन्द जी आगे लिखते हैं –
“विश्वासराव का शव अब्दाली के पास लाया गया, कई पठान इसमें भूसा भरकर काबुल भेजना चाहते थे। किन्तु शुजादोल्ला के एक हिन्दू साथी ने ३ लाख रुपये देकर विश्वासराव, तुकाजीशिन्दे, सन्ताजी बाघ, और जशवन्त पुवाड़ के शव ले लिये और वैदिक रीति से जला दिये।”
युद्ध के पश्चात् पेशवा ने हिन्दू राजाओं को पुनः संगठित होने के लिये पत्र लिखा। इस विषय में भाई परमानन्द जी लिखते हैं –
“पानीपत के पराजय होने पर सभी हिन्दू राजाओं को उत्साहवर्धक पत्र लिखे। जिसमें यह लिखा कि – ऐसे समय में जबकि हिन्दू धर्म और हिन्दुओं को, हिन्दू जाति के शत्रु इन्हें नष्ट करने के लिये अपनी शक्ति को संगठित कर रहे हैं, हिन्दुओं को भी उचित नहीं है कि वे एक दूसरे से पृथक् रहकर अपने सर्वनाश की रीति को धारण करें। उन सबको स्वतन्त्रता युद्ध में सम्मिलित होने के लिये आमन्त्रित किया, और उनको विश्वास दिलाया कि यद्यपि पानीपत के युद्ध में मराठों की पराजय हुई है, जिसमें मेरा युवा पुत्र मारा गया और मेरे भाई (सदाशिवराव भाऊ) और जनकोजी जैसे सेनापतियों का कुछ पता नहीं लगता। किन्तु इतने पर भी मैं अब्दाली की इच्छाओं को पूर्ण न होने दूंगा। वह मुगलिया राज्य के खण्डहरों पर अफगानी राज्य की आधारशिला रखने में सफल न हो सकेगा।”
पानीपत १७६१ नामक पुस्तक का लेखक १९३५ में इसी खोज में पानीपत तथा वहाँ के निकट के ग्रामों में घूमा। भाऊ की लड़ाई के गीत गाने वाले हिन्दू और मुस्लिम जोगियों से भी मिला। उनसे भाऊ की लड़ाई की गाथा लिखकर १९४३ में पूना दक्कन कालिज से प्रकाशित बुलेटिन में इसे प्रकाशित भी कराया। किन्तु अपनी थोड़ी खोज के कारण वह इस सत्य पर विश्वास न कर सका कि सदाशिवराव भाऊ पानीपत युद्ध में मारा नहीं गया, अपितु वह अनेक वर्षों तक जीवित रहा। ऐसा भी प्रतीत होता है कि उसे, उसकी अपनी खोज में सहायतार्थ कोई योग्य सहायक भी नहीं मिला। द्वितीय, हमारे जोगी जो गाते हैं, वे कथा को पौराणिक रूप देकर उपन्यास का ढंग बना देत हैं। अतः उन जोगियों द्वारा अतिशयोक्तिपूर्ण कथा को सुन आधुनिक इतिहास लेखक उन कथाओं पर विश्वास नहीं करता। फिर १७५ वर्ष पश्चात् कोई किसी ऐतिहासिक सत्य की खोज के लिये किसी अपरिचित प्रान्त में आये तो उसको कितनी कठिनाइयाँ इस कार्य में आयेंगी, यह कोई इस प्रकार की खोज करने वाला व्यक्ति ही अनुमान कर सकता है। कुछ व्यर्थ बातें बनाने वाले गप्पी लोग भी भ्रम में डाल देते हैं। और दो शती पश्चात् किसी बीती हुई घटना को बताने वाले व्यक्ति भी दुर्लभ होते हैं। थोड़ी ही दिनों में ऐसी घटनाओं की खोज भी नहीं हो सकती।
मैं इसी प्रान्त का निवासी, और रात दिन यहीं विचरने वाला, बाल्यकाल से ही पैतृक संस्कारों से मुझे इतिहास में रुचि और प्रेम है, और कुछ ऐतिहासिक खोज में स्वयं यत्नशील हूँ। अतः मुझे आज अनेक वर्षों की खोज के पश्चात् यह निश्चय हुआ है कि सदाशिवराव भाऊ युद्ध में मारा नहीं गया, अपितु जीवित रहा तथा उसने हरयाणा प्रान्त में साधु बनकर भ्रमण तथा निवास किया। जोगियों की कथा के आधार पर श्री त्र्यम्बक शंकर शेजवाल्कर पानीपत १७६१ में इस प्रकार लिखते हैं –
“पानीपत के आसपास ग्रामों में घुमक्कड़ हिन्दू और मुस्लिम जोगी आज भी भाऊ के युद्ध के विषय में गाथाएँ गाते हैं। यह इसका जीता जागता प्रमाण है कि इस युद्ध का प्रभाव विचित्ररूप से पड़ा। और जो था भी स्वाभाविक। इसी के परिणामस्वरूप अनेक कथाएँ इस युद्ध के विषय में बनीं, और जो पूना दक्कन कालिज अनुसंधान संस्था की ओर से बुलटिन में प्रकाशित हुईं। उनमें यह नहीं लिखा कि भाऊ की मृत्यु हुई, किन्तु यह लिखा है कि वह भाऊपुर ग्राम में चला गया, जो पानीपत से दक्षिण-पश्चिम में १२ मील की दूरी पर स्थित है। वहां वह बहुत समय तक एक फकीर (साधु) के पास रहा। उसने अपने आप को प्रकट नहीं किया, पूर्णतया अपने आपको छिपाकर रखा। अपने नाम, स्थान आदि का परिचय नहीं दिया। तत्पश्चात् वह यमुनापार कैराना (जि० मुजफ्फरनगर) में गया। कुछ वर्ष के पश्चात् वह कहां गया, कहां रहा। पानीपत के निकट निवासियों से इस विषय में कोई पता नहीं चलता। उसके आगे जीवन के विषय में वहां के लोग कोई परिचय नहीं देते।”
भाऊ पानीपत के युद्ध में नहीं मारा गया, और पीछे बहुत काल तक जीवित रहा यह विश्वास प्रायः सारे ही भारतवर्ष की जनता में फैल गया था। और परम्परा से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता रहा। हमारा विचार है कि भाऊ की कथा करने वालों ने यह प्रचार कर दिया कि भाऊपुर ग्राम जिसमें भाऊ बहुत दिन तक रहा, भाऊ के कारण ही इसका नाम भाऊपुर पड़ गया, किन्तु यह ग्राम भाऊसिंह नामक किसी व्यक्ति के नाम पर बसा है, और इसका सम्बन्ध मराठा सेनापति भाऊ के नाम गाने वालों ने प्रसिद्ध कर दिया।
इस लेखक को यह जोगियों द्वारा गाई जाने वाली कथा काल्पनिक, पौराणिक कथा के समान दिखाई दी। क्योंकि उसे इसके सत्य मानने के लिये पूर्ण सामग्री नहीं मिली। वह कथा मेरे सम्मुख नहीं जो दक्कन कालिज पूना की संस्था ने प्रकाशित की है। अतः इस विषय में मैं कुछ नहीं कह सकता। मुझे तो केवल यह दिखाना था कि सारे भारतवर्ष में यह समाचार फैल गया था कि सदाशिवराय युद्ध में मारा नहीं गया, किन्तु वह जीवित था। स्वयं पेशवा भी कई मास पश्चात् राजाओं को अपने पत्र में लिखते हैं कि – मेरे भाई सदाशिवराव भाऊ का पता नहीं, वह कहाँ गया।
पाठकों ने मेरे लेख में यह भी पढ़ लिया कि ‘विश्वासराव’ आदि का शव तो पानीपत के युद्ध में मिल गया, तथा कई अन्य मराठा सरदारों के शव भी मिले। किन्तु भाऊ का शव नहीं मिला। यद्यपि बात यह है कि जब ‘विश्वासराव’ मारा गया और ‘सदाशिवराव भाऊ’ अपने हाथी से उतरकर घोड़े पर चढकर पागलों के समान लड़ने लगा। उसी समय इसी की सेना में से २ सहस्र वा ५ सहस्र मुस्लिम सैनिकों ने धोखा देकर उल्टा इसी के शिविर में स्त्री, बालकों और भृत्यों पर, जो डेढ़ लाख से भी अधिक थे, आक्रमण कर दिया। इससे युद्ध का पाशा पलट गया, मराठा सेना में भगदड़ पड़ गई। अपने सभी बालकों के बचाने की भी चिन्ता शिर पर सवार हुई। स्वयं भाऊ और विश्वासराव की धर्मपत्नी भी वहीं थी। उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध जो भी हो सकता था, उसे करके भाऊ अन्तिम निर्णय के लिये आगे बढ़ा। उस समय जब यह अन्धा होकर मुसलमानों की सेना में मारकाट करता हुआ अन्दर घुस रहा था, उसी समय मुकुन्द शिंदे ने इसके घोड़े की लगाम पकड़कर रोकना चाहा और कहा – “इस समय पीछे हट जाने में ही बुद्दिमत्ता है” किन्तु वह नहीं माना। किन्तु जब इसके सभी सरदार मारे गये और केवल इसके ५० सैनिक ही रह गये, तब नाना फड़नवीस, माधव सिन्धिया आदि प्राण बचाने के लिये भाग गये। इब्राहीम गार्दी का तोपखाना भी ठंडा हो गया और गार्दी स्वयं घायल होकर बन्दी बना। भाऊ का शिविर लुट गया तब इसका विचार बदला और इसने बच निकलने में ही कल्याण समझा। यह लड़ता लड़ता १५ कोश दक्षिण-पश्चिम की ओर चला गया। इसके पीछे इतिहासकारों को कुछ पता नहीं। वे बिना खोज किये मनमानी लिखते रहे। किसी ने लिख दिया वह मारा गया, किसी ने यह लिखा कि वह लुप्त हो गया।
भाऊ जब लड़ता लड़ता १५ कोश से भी आगे निकल गया, और लड़ने वाले शत्रु भी पीछे रह गये तब वह अपने घोड़े पर शस्त्रादि से सुसज्जित सांघी (रोहतक) ग्राम में पहुंच गया। वहां एक बुढ़िया जो उस ग्राम की सीमा पर मिली, उस ग्राम के विषय में तथा अपने ठहरने के लिये ग्राम के श्रेष्ठ चौधरियों के नाम पूछकर वह अपने घोड़े को जंगल में ही छोड़कर सुखदेव साध जो उस समय अपने ग्राम सांघी में ही नहीं, किन्तु आसपास के ग्रामों में प्रतिष्ठित था, और पञ्चायती चौधरी था, उसके पास चला गया, तथा उससे एकान्त में ही बातचीत कर अपना सब रहस्य सुखदेव जी को ही बता दिया।
सुखदेव जी बड़े चतुर व्यक्ति थे। उन्होंने बहुत समय तक किसी को इसका पता नहीं चलने दिया कि वह कौन व्यक्ति है। चौधरी सुखदेव जी की सम्मति से भाऊ ने अपने गेरवें (काषाय) कपड़े रंगकर साधु वेष धारण कर लिया। लोग उसका अच्छा आदर करने लगे। भोजन छादन की सब सुविधाएँ साधु वेष होने से मिल गईं। सुखदेव जी की प्रेरणा से भोजन के लिये विशेष निमन्त्रण भी मिलने लगे। जनता में अच्छा आदर सम्मान हो गया। आसपास के ग्रामों में भी भ्रमणार्थ जाने लगे, किन्तु मुख्य निवास स्थान ग्राम सांघी में ही रखा। सुखदेव साध को वह अपने गुरु के समान मानकर आदर करते थे। उनके रहने का स्थान भी ग्राम वालों ने ग्राम से बाहर बना दिया।
कुछ काल पश्चात् मल्हाराव होल्कर हरयाणे से चौथ लेने के लिये सेना सहित आया। किन्तु पानीपत के युद्ध में मराठों की पराजय के कारण मराठों का प्रभाव इस प्रान्त में समाप्त हो गया था अतः किसी भी ग्राम ने सहर्ष (बिना लड़े) चौथ का धन नहीं दिया। बड़ी कठिनाई सामने आई। होल्कर ने लोगों से पूछा कि चौथ का धन कैसे इकट्ठा किया जाये? सभी स्थानों से यही उत्तर मिला कि यदि ग्राम सांघी चौथ दे देवे तो सारा प्रान्त चौथ दे देगा। होल्कर अपनी सेना सहित सांघी ग्राम में पहुंच गया। वहाँ के १० नम्बरदारों को कर देने के लिये बुलाया। किन्तु सबने स्पष्ट निषेध कर दिया। चौथ की प्राप्ति नहीं हुई। अन्त में सारे प्रान्त के योद्धा वहीं सांघी में एकत्रित हो गये। ६ मास तक होल्कर के साथ युद्ध हुआ। गुप्तचरों ने होल्कर को यह सूचना दे दी कि भाऊ जीवित है और इसी ग्राम में रहता है। और वही चौथ नहीं देने देता। होल्कर, सदाशिवराव भाऊ (जो साधु वेश में था) से मिलने गया। दोनों ने एक दूसरे को पहचान भी लिया था। किन्तु परस्पर इस भेद को छिपाये रहे।
सदाशिवराव भाऊ ने (जो साधु वेश में था) हरयाणे की पञ्चायती सेना का नेतृत्व किया, और अनुशासन में रखते हुये ६ मास तक युद्ध को चालू रखा। जब भाऊ ने हरयाणे की सेना को अनुशासन में रखकर लड़ाया, तब लोग समझ गये कि यह तो साधुवेश में कोई राजा वा सेनापति है। फिर भेद खुला कि यह तो साधु वेष में प्रसिद्ध मराठा वीर सदाशिवराव भाऊ पानीपत युद्ध का सेनापति है। होल्कर ने अन्त में संधि करके बिना कुछ लिये मुस्लिम ग्राम कलानौर और इस्मायला (समाल) जो उस समय रांघड़ों और बलोचों की बस्ती थीं, इन दोनों ग्रामों को आक्रमण कर तोड़ डाला। अच्छी लूट खसोट कर इस प्रान्त से लौट गया।
इन मुस्लिम ग्रामों को तोड़ने में हरयाणे के लोगों ने भी होल्कर की सहायता की थी। होल्कर तो चला गया लेकिन भाऊ साधुवेश में यहीं रहा। आगे चलकर वह नाथ सम्प्रदाय में सम्मिलित हो गया। बाबा मस्तनाथ, जो बोहर के नाथों के मठ के संस्थापक थे, उन दिनों घूमते हुये कथूरा ग्राम से अपनी मण्डली सहित सांघी पहुंचे। भाऊ उनसे प्रभावित हुआ और उनका शिष्य बन गया। वे उसे साथ ले गये और उसे दर्शन – अर्थात् कान फाड़कर मुद्रायें पहना दी और उसे अपना शिष्य बनाकर नाथ सम्प्रदाय में सम्मिलित कर लिया और भौमनाथ नाम रख दिया। इसी नाम से वे इस प्रान्त में प्रसिद्ध हो गये और उन्होंने अच्छा यश प्राप्त किया।
वे अधिक तो सांघी ग्राम में ही रहे किन्तु समय-समय पर बाहर ग्रामों में भी घूमने जाते थे। वे धामड़ आदि ग्रामों में भी आये। इस प्रकार अनेक वर्षों तक जीवित रहे, अन्त में सांघी ग्राम में ही उनकी मृत्यु हुई। उनकी समाधि नाथों के मठ में सांघी ग्राम में बनी हुई है। प्रायः सभी पुराने वृद्ध सज्जन जानते हैं और श्रद्धा से बताते हैं कि यह भौमनाथ वा भावना जोगी की समाधि है।
मैंने जानबूझकर ही बहुत संक्षेप में लिखा है। इस विषय में मैंने पर्याप्त खोज की है, किन्तु विस्तार से पुस्तक रूप में फिर कभी लिखूँगा।
(पंजाब के राज्यपाल श्री नरहरि विष्णु गाडगिल (जो महाराष्ट्र से थे) ने सांघी में जाकर अपने बच्चों का मुण्डन कराया था। वे भी यही मानते थे कि सदाशिवराव भाऊ की समाधि सांघी ग्राम में ही है। सदाशिवराव भाऊ द्वारा लिखित तीन पत्र और उनके जूतों की प्रतिकृति गुरुकुल झज्जर के संग्रहालय में है – सम्पादक, सुधारक (मासिक पत्रिका)

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