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Dr D K Garg

पौराणिक कथा : असुरों के राजा बलि ने देवताओं को युद्ध में पराजित कर दिया था और स्वर्ग अपने कब्जे में ले लिया था। बलि की वजह से सभी देवता बहुत दुखी थे। दुखी देवता अपनी माता अदिति के पास पहुंचे और अपनी समस्या बताई। इसके बाद अदिति ने पति कश्यप ऋषि के कहने पर एक व्रत किया, जिसके शुभ फल से भगवान विष्णु ने वामन देव के रूप में जन्म लिया।
कुछ काल बाद दैत्य राज बलि ने अपनी विजय के उपलक्ष्य में एक महान यज्ञ के अनुष्ठान का आयोजन किया। बौने ब्राह्मण के रूप में भगवान भी वहाँ पहुँचे । सब ब्राह्मणों की तरह, उस बौने ब्राह्मण का भी महाराज बलि के दरबार में आदर-सत्कार किया गया । सब लोगों को मुँह माँगी वस्तुएँ दान में दे दी गयी । पूर्ण-मनोरथ हो-होकर सब लोग अपने स्थान को जाने लगे । अब उस बौने ब्राह्मण का भीं नम्बर आया ।
महाराज बलि ने पूछा – “कहिये, ब्राह्मण-देवता ! आप क्या चाहते हैं ?”
वामन – “महाराज ! मैं जो कुछ माँगूँगा, क्या आप उसे देंगे ? क्या मुझ बौने की अभिलाषा आप पूरी करेंगे ? यदि आप मेरा मनोरथ पूर्ण करने का वचन दें, तो मैं कहूँ ? “
बलि – “मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, ब्राह्मण देवता ! कि आप जो कुछ माँगेंगे, वही दूँगा ।“
वामन – “अच्छी बात है, महाराज ! मुझे तीन पग भूमि की आवश्यकता है ।
महाराज बलि भिक्षु की बात सुन हँसते-हँसते, लोट-पोट होने लगे । उनके लिये तीन पग भूमि क्या चीज़ थी ? सो भी तीन पग भूमि माँगने वाला एक बोना आदमी था । पेट-भर हँस लेने के बाद बोले – “ब्राह्मण देवता ! इसी के लिये आप इतनी प्रतिज्ञा करा रहे थे ? जाइये, जहाँ आपकी इच्छा हो, तीन पग भूमि नाप लीजिये ।“
वह बौना ब्राह्मण कोई साधारण बौना थोड़े ही था ! उसने एक पैर मत्त्य-लोक में रखकर दूसरा पैर एकदम स्वर्गलोक में रखा और फिर पूछा – “कहिये महाराज ! अब तीसरा पैर कहाँ रखूँ ?”
पल भर के लिये बलि उस अद्भुत वामन की लीला देखकर दंग रह गये । बलि कुछ भी न समझ सके, कि तीसरा पग कहाँ रखने को कहें ? बलि भी अपने वचन के सच्चे निकले ।
उन्होंने कहा – “भगवन् ! तीसरा पग इस मस्तक पर रखिये ।”
भगवान ने उस पर पैर रखा और बलि को बाध्य होकर स्वर्ग और मत्स्य का राज्य छोड़कर पाताल में जाना पड़ा। वहाँ भी भगवान ने उसे बन्दी कर रखा पर कुछ काल बाद, देवर्षि नारद के परामर्श से जब उसने भगवान की आराधना की, तब उन्होंने उसे सपरिवार पाताल लोक में वास करने की आज़ादी दे दी।

कथानक का विश्लेषण : जब कोई विषय गूढ़ ज्ञानं का होता है तो उसको समझाने के लिए या तो किसी काल्पनिक कथानक का या किसी घटना का सहारा लेना पड़ता है। ये सदियों से होता रहा है और आज भी प्रवचान देने वाले पंडित,विद्वान बीच बीच में किसी कथानक को जोड़ देते है। इसका कारण है की ज्ञान के गहराईयों में उतरना आसान नहीं होता ,चंचल मन इधर उधर भटकता रहता है और मूल विषय या तो खो जाता है या समझ ही नहीं आता। इस कारण अतीत में उदहारण के लिए प्रयुक्त कथानकों में अत्यधिक अलंकार की भाषा का प्रयोग किया गया। ऐसी प्रकार की ये कहानी राजा बलि ही है जो सत्य कथा नहीं है। केवल एक दृष्टांत कथा है।

कथा का मूल ये है – जब कोई राजा अत्यंत बलवान हो और जिसका सम्पूर्ण क्षेत्र में राज्य हो तो ऐसे राजा का अहंकार प्रजा पर भारी पड़ता है। ऐसा राजा असुरो के श्रेणी में गिना जाता है। जब अहंकार ज्यादा हो तो मानव की बुद्धि भी ठीक से काम नहीं करती ,इस कथा में राजा ने अपने मंत्रीगण की सलाह भी नहीं मानी। इस कथानक में राजा कोई अन्य व्यक्ति नहीं है , बल्कि मनुष्य स्वयं में राजा है जिसको परमात्मा ने कर्म करने की शक्ति , इसके लिए बुद्धि दी है और शरीर में वह इंद्रियों के माध्यम से अपने मन के अनुसार निर्णय लेकर शासन करने में स्वतंत्र है। अपने कर्म के आधार पर मनुष्य तीनों लोकों का स्वामी बन जाता है।
ये तीन लोक कौन से है – तीन लोक —हमारे तीनों शरीरों को ही तीन लोक कहते हैं। हमारे तीन शरीर स्थूल शरीर, कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर ही तीन लोक है। और चौदह भुवन हमारे शरीर में ही है — पांच ज्ञानेंद्रियां पांच कर्मेंद्रियां ओर चार अंतःकरण (मन बुद्धि चित्त और अहंकार)
सूक्ष्म शरीर उस Microchip की भांती है जिसमें जीवात्मा के कर्म संस्कारों के रूप में अंकित रहते हैं और स्थूल शरीर उस Hardware की भांती है जिसमें आत्मा सूक्ष्म शरीर सहित कर्मों के आधार पर प्रवेश पाता है । इसी को जन्म कहते हैं ।
कर्म अनंत हैं परंतु जब किसी शरीर छोड़ने के बाद जिन कर्मों की प्रधानता होती है या यूँ कहें कि जो कर्म कतार में सबसे आगे आकर खड़े हो जाते हैं उन्हीं के फल के रूप में आत्मा को स्थूल शरीर प्राप्त होता है । हमने कहा कि स्थूल शरीर Hardware की भांती है । जैसे एक Microchip जिसमें की जानकारियाँ सुरक्षित हैं उनको चलाने के लिए कभी किसी बड़े तो कभी छोटे Hardware में आवश्यकता अनुसार डाला जाता है । बस यहीं से पुनर्जन्म का सिद्धांत समझ लें वैसे ही जीवात्मा भी कई प्रकार के शरीर छोड़कर अपने कर्मों का फल पाता है ।

कारण शरीर ”प्रकृति” का नाम है। सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, इन तीनों के समुदाय का नाम प्रकृति है। ये सूक्ष्मतम कण हैं। उसी का नाम ‘कारण-शरीर’ है। स अब उस प्रकृति रूपी कारण शरीर से दूसरा जो शरीर उत्पन्न हुआ, उसका नाम ‘सूक्ष्म शरीर’ है। आपने शरीर पर सूती कुर्ता कपड़ा पहन रखा है। इसका कारण है धागा। और धागे का कारण है- रूई। रूई, धागा और कॉटन-कुर्ता ये तीन वस्तु हो गयीं। कुर्ता, धागा और रूई, तो ऐसे तीन शरीर हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। स्थूल शरीर है कुर्ता, सूक्ष्म शरीर है धागा, और कारण शरीर है- रूई। स जो संबंध कुर्ते, धागे और रूई में है, वो ही संबंध इन तीनों शरीर में है। क्या रूई के बिना धागा बन जायेगा, और क्या धागे के बिना कुर्ता बनेगा? कारण शरीर के बिना सूक्ष्म शरीर नहीं बनेगा। सूक्ष्म शरीर के बिना स्थूल शरीर नहीं बनेगा। कहा हैः- कारण शरीर प्रकृति सत्त्वरजसतमः। सत्त्व, रज और तम से अठारह चीजें बनी। उसका नाम है- सूक्ष्म शरीर।
यहाँ बोना ब्राह्मण का अभिप्राय ये है की कितना भी बलशाली कोई क्यों ना हो फिर भी उसको छोटा आदमी भी मात दे सकता है , अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जिससे हमेशा सावधान रहना जरुरी है ,केवल यज्ञ करना काफी नहीं है।
अंत में सारांश ये है की यदि मनुष्य अपनी गलती स्वीकार कर ले तो ईश्वर दयालु है इसलिए पुनर्जन्म देकर पूर्व के कर्मों को सुधारने के अवसर देता है जिसे इस कथानक में कहा है की “ जब उसने भगवान की आराधना की, तब उन्होंने उसे सपरिवार पाताल लोक में वास करने की आज़ादी दे दी।”

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