वेद, महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान-35

भारतीय संविधान में मूल कर्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन 

वेद मानवजाति के लिए सृष्टि के आदि में ईश्वरप्रदत्त संविधान हैं। अत: ऐसा नही हो सकता कि हमारा आज का मानव कृत संविधान तो नागरिकों के मूल कत्र्तव्यों का निरूपण करे और वेद इस विषय पर चुप रहे। वेदों में मानव और मानव समाज के आचार विचार और लोक व्यवहार से संबंधित ऋचाएं अनेकों हैं। वेद हमारे लिए राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व आर्थिक सभी क्षेत्रों में सुव्यवस्था के प्रतिपादक हैं। प्रत्येक पग पर वहां हमारे लिए कर्तव्यवाद एक धर्म बनकर खड़ा है। सत्यम वद धर्मम् चर कहकर वेद ने हमारी मर्यादा और मार्यादा पथ दोनों का ही निरूपण कर दिया है। अब हम यहां वेद के राष्ट्र संगठन पर विचार करेंगे। वेद से हम मात्र दस मंत्रों का चयन कर रहे हैं, जो हमारे मूल कत्र्तव्यों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। ये मंत्र इस प्रकार हैं :-

समानो मंत्र: समिति समानी समानं व्रतं सहचित्तमेषाम।
समानेन वो हविषा जुहोमि समानं चेतो अभिसंविश्ध्वम् ।।
वेद की यह ऋचा हमारे लिए बहुत ही सुंदर कर्तव्य का मार्ग दर्शन कर रही है। इसका कहना है कि हे मनुष्यों! तुम्हारे विचार समान हों। तुम्हारी सभा सबके लिए समान हो। तुम सबका संकल्प एक समान हो। तुम सबाक चित्त एक समान भाव से भरा हो। एक विचार होकर किसी भी कार्य में एक मन से लगो। इसीलिए तुम सबको समान छवि या मौलिक शक्ति मिली है।
वेद की यह ऋचा हम सभी राष्ट्रवासियों से अपील कर रही है कि हमारा एक लक्ष्य हो, एक विचार हो, एक भाव हो क्योंकि लक्ष्य, विचार और भाव की भिन्नता व्यक्ति को भटकाती है, राष्ट्र में नये नये विवाद उत्पन्न करती है। इसलिए राष्ट्रीय एकता के लिए इन तीनों बिंदुओं पर हमारी एकता स्थापित होनी अति आवश्यक है। हमारी सभायें अर्थात हमारी विधानसभाएं और संसद सभी नागरिकों के लिए समानता का व्यवहार करने वाली हों। इनमें जातीय आरक्षण का लफड़ा ना हो। हां, इनमें आर्थिक आधार पर पिछड़े लोगों के उत्थानार्थ विधि विधानों का प्रतिपादन होता हो।
2. दूसरा वेदमंत्र है :-
सं जानी ध्वं सं प्रच्य घ्वं सं वो मनोसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाने उपासते।
अर्थात हे मनुष्यो! (यह तुम्हारा कर्तव्य है कि) तुम समान ज्ञान प्राप्त करो। समानता से एक दूसरे के साथ संबंध जोड़ो, समता भाव से मिल जाओ। तुम्हारे मन समान संस्कारों से युक्त हों। कभी एक दूसरे के साथ हीनता का भाव न रखो। जैसे अपने प्राचीन श्रेष्ठ लोक के समय ज्ञानी लोग अपना कर्तव्य पालन करते रहे, वैसे तुम भी अपना कर्तव्य पूरा करो।
उच्च और संस्कारित जीवन के लिए यह वैदिक ऋचा कर्तव्य पालन को मानव समाज के लिए अनिवार्य बनाती है। यह स्पष्ट करती है कि जैसे प्राचीन काल में श्रेष्ठ लोग अपने कर्तव्य पालन में रत रहे वैसे ही हम भी उनका अनुकरण करते हुए कर्तव्य पालन में रत रहें। लोक व्यवस्था के लिए यक कर्तव्य कर्म परमावश्यक है। यदि पहले मंत्र का प्रतिपाद्य विषय भावात्मक एकता स्थापित करना है तो इस मंत्र का प्रतिपाद्य विषय हमारी कर्तव्य परायणता है। दोनों ही बातें राष्ट्रीय एकता और अखण्डता और शांति व्यवस्था के लिए बहुत ही आवश्यक हैं।
3. तीसरा वेदमंत्र है :-
समानी व आकूती: समाना हृदयानि व:। समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति।। (अथर्व 6-64-3)
अर्थ-हे मनुष्यो! तुम सबका संकल्प एक जैसा हो। तुम्हारा हृदय समान हो, तुम्हारा मन समान हो। तुमसे परस्पर मतभेद न हो। तुम्हारे मन के विचार भी समता युक्त हों। यदि तुमने इस प्रकार अपनी एकता और संगठन स्थापित की तो तुम यहां उत्तम रीति से आनंदपूर्वक रह सकते हो और कोई शत्रु तुम्हारे राष्ट्र को हानि नही पहुंचा सकता है।
इस वेद मंत्र कार प्रतिपाद्य विषय समान संकल्प है। सारे राष्ट्रवासियों का एक संकल्प हो जाना बहुत बड़ी बात है। जिस परिवार का भी एक संकल्प हो जाता है उसके विषय में भी देखा जाता है कि वह दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करता है। इसलिए एक शिव संकल्प से भर जाना सारे राष्ट्रवासियों का परम कर्तव्य है, जब देश पराधीन हो रहा था तो उस समय सारे राष्ट्र में एक संकल्प का ही तो अभाव था। जब वह एक संकल्प इस बात को लेकर बनने लगा कि अब अंग्रेजों को भारत से भगाना ही है तो अंग्रेजों को भारत छोडऩा ही पड़ गया। इसलिए एक शिव संकल्प से बंध जाना भी सभी राष्ट्रवासियों का परम कर्तव्य है।
4. चौथा वेद मंत्र है।
समानी प्रथा सहवोउन्नभाग समाने योक्तें सहवो युनज्मि।
समयञ्चो अग्निं समर्यतारा नाभिमिवा मित:।।
हे मनुष्यो! तुम्हारे जल पीने का स्थान एक हो और तुम्हारे अन्न का भाग भी साथ साथ हो। मैं तुम सबको एक ही जुए में साथ साथ जोड़ता हूं। तुम सब मिलकर ईश्वर की पूजा करो, जैसे पहिए के आरे केन्द्र स्थान में जुड़े रहते हैं, वैसे ही तुम भी अपने समाज में एक दूसरे के साथ मिलकर रहो।
इस वेद मंत्र का प्रतिपाद्य विषय हमारे द्वारा देश में सामाजिक समरसता की स्थापना करना है। वेद का सभी राष्ट्रवासियों से आग्रह है कि वो देश में सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए अपने अपने स्थान पर सक्रिय हों। बिना सामाजिक समरसता के कोई भी राष्ट्र उन्नति नही कर सकता। आज हमारी अवन्नति का कारण सामाजिक विषमताएं हैं। सामाजिक समरसता का देश में नितांत अभाव है। लोग अपने अपने स्तर के अनुसार अलग अलग कालोनियां बसाते जा रहे हैं। उनमें एक ही स्तर के लोग रहेंगे। दूसरों के लिए वहां प्रवेश तक निषिद्घ है। खाने पीने और रहने सहने के स्थान अलग अलग हैं। इसलिए सामाजिक समरसता हमारे लिए मृग मारीचिका बन गयी है। वेद कहता है कि सामाजिक समरसता की स्थापना कर समाज में आत्मीय भाव का विकास करो। इसे अपना जीवन व्रत बना लो।
5. पांचवां वेद मंत्र है :-
सहृदयं सामनस्यम् विद्वेषं कणोमि व:।
अन्यो अन्यभाभिहर्यत वत्सं जातमिवाघ्या।।
हे मनुष्यो! तुम लोग हृदय के भाव प्रेमपूर्ण, मन में शुभ विचार और परस्पर निवैरता अपने मन में स्थिर करो। तुममें से हर एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से प्रेमपूर्ण बर्ताव करे जिस प्रकार कि नवजात बछड़े से उसकी गौमाता प्यार करती है।
नि:स्वार्थ प्रेमपूर्ण व्यवहार इस वेद मंत्र का प्रतिपाद्य विषय है। वेद का आदेश है कि उत्तम राष्ट्र सृजन के लिए परस्पर प्रेमपूर्ण व्यवहार को अपने राष्ट्रीय चरित्र कए एक आवश्यक अंग बना लो। इस प्रकार के व्यवहार से समस्त राष्ट्रवासी आपस में निर्वरता और अहिंसा भाव से भर जाएंगे। गांधीजी देश में लोकप्रिय इसलिए हुए कि उन्होंने नि:स्वार्थ प्रेम, अहिंसा और बंधुत्व की बातें कीं। यह अलग बात है कि गांधीजी की इन बातों को देश के एक वर्ग ने नही माना और गांधीजी लोकप्रिय होकर अपने उद्देश्य में भी असफल सिद्घ हुए। क्योंकि एक वर्ग का संकल्प घृणा के आधार पर राष्ट्र का विभाजन कराना बन गया। गांधीजी किसी एक वर्ग की इस घृणा को प्रेम में परिवर्तित नही कर पाए। इसलिए राष्ट्र का विभाजन हो गया। ये मंत्र हमें यह बताता है कि सभी राष्ट्रवासियों को परस्पर प्रेमपूर्ण बर्ताव करना चाहिए अन्यथा घृझाा पांव पसार लेगी और उसका परिणाम होगा विभाजन और केवल विभाजन।
6. छठा वेद मंत्र है:-
सध्रीची नान्व: संमन सस्कृणोम्येक श्रनुष्टीन्त्सं वनेन सर्वान्।
देवा इवामृतं रक्षमाणा: सामं प्रात: सौमनसौ वो अस्तु।।
हे मनुष्यो! तुम परस्पर सेवा भाव से सबके साथ मिलकर पुरूषार्थ करो। उत्तम ज्ञान प्राप्त करो। समान नेता की आज्ञा में कार्य करने वाले बनो। दृढ़ संकल्प से कार्य में दत्त चित्त हो तथा जिस प्रकार देव अमृत की रक्षा करते हैं। इसी प्रकार तुम भी सायं प्रात: अपने मन में शुभ संकल्पों की रक्षा करो। यहां हम वेद की अनूठी बात देखते हैं। यहां वेद कह रहा है कि तुम सब राष्ट्रवासियों का परम पुरूषार्थी हो जाना राष्ट्र का भाग्य (विधान) बदलने के लिए, उसके भाग्य की रेखाओं को अपने ढंग से लिखने के लिए सचेष्ट हो उठना है। वेद मंत्र का अगला भाग एक प्रधान (एक नेता) की बात कह रहा है। जबकि मंत्र का अंतिम भाग अपने मन के शुभ संकल्पों को जीवन की पताका बना लेना है। शिव संकल्प व्यक्ति की ऊंची उड़ान उड़ाते हैं। इसलिए शुभ संकल्प पताका के ही समान हैं। राष्ट्रवासियों के लिए आवश्यक इस कर्तव्य को हमारे वर्तमान संविधान ने पूर्ण नही किया है। आज देश में एक नेता का अभाव है। एक पार्टी का नेता (नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी तक यह परंपरा रही) कभी इस देश का नेता माना जाता था। कुछ सीमा तक अटल जी ने भी इसे निभाया। पर अब तो जाति, सम्प्रदाय और क्षेत्र के नाम पर नेता बनकर लोग देश का नेता बनने का सपना संजो ही नही रहे हैं अपितु उसे हम साकार होता भी देख रहे हैं। परिणाम स्वरूप राष्ट्र में सर्वत्र कोलाहाल और अशांति है।
7. वेद का सातवां निर्दिष्ट कर्तव्य है:-
सं वो मनांसि सं व्रता समाकूती न मामसि।
अभी ये विव्रता स्थान तान्व: सं नयमामसि।।
अथर्व 3/8/5
अर्थात हे मनुष्यो! ”तुम अपने मन एक करो। तुम्हारे कर्म एकता के लिए हों, तुम्हारे संकल्प एक हों, जिससे तुम संघ शक्ति से युक्त हो जाओ। जो ये आपस में विरोध करने वाले हैं, उन सबको हम एक विचार से एकत्र हो झुका देते हैं। संघ शक्ति के प्रति समर्पण इस वेद मंत्र का प्रतिपाद्य विषय है। संघ शक्ति में विश्वास रखने वाला व्यक्ति कभी भी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का शत्रु नही हो सकता।
8. आठवां मंत्र है :-
अदार सृद भवतु सोमा स्मिन्यज्ञे मसतो मृअतान:।
मा नो विददभिमा मो अशस्तिमां नो विदद् वृजिना द्वेष्या या।।
”हे सोमदेव! हम सबमें से परस्पर की फूट हटाने वाला कार्य होता रहे। हे मरूतो! इस यज्ञ में हमें सुखी करो। पराभव या पराजय हमारे पास न आवे। कलंक हमारे पास न आवे और जो द्वेष भाव बढ़ाने वाले कुटिल कृत्य है, वे भी हमारे पास न आयें।”
इस मंत्र का प्रतिपाद्य विषय हमारे मध्य पारस्परिक फूट का नितांत अभाव हो जाना है। पारस्परिक फूट का नितांत अभाव मनो की एकता से आता है। मानसिक धरातल पर उपजने और विकसित होने वाले विचार जब सर्वमंगल कामना से अभिभूत हो उठें तो उस समय यह मानना चाहिए कि वास्तव में पारस्परिक फूट को विदा करने के लिए हम तत्पर हैं। यही वह अवस्था है जब दूसरे की पीड़ा को हम अपनी पीड़ा मानकर उसे दूर करने के लिए सक्रिय हो उठते हैं। जब मानसिक धरातल पर हम एक होने के विचारों से अभिभूत होंगे तो हमारे कर्म तो स्वयं की एकता के लिए समर्पित हो जाएंगे। इसका अभिप्राय होगा कि हम राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की शत्रु शक्तियों को भी पहचानने लगेंगे और उनके हाथ की कठपुतली बनकर यहां पुन: राष्ट्रघाती खेलों की परंपरा को चालू नही करेंगे।
9.वेद का नवां मंत्र है-
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षमा स्वसारमुत स्वसा।
सम्यञ्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।।
”भाई भाई से द्वेष न करें, बहन बहन से द्वेष न करें। एक विचार वाले होकर और एक कर्म वाले होकर हम सब आपस में बातचीत एवं व्यवहार करें।
इस वेद मंत्र की शिक्षा है कि यदि राष्ट्र में वास्तव में शांति स्थापित करना चाहते हो तो परस्पर द्वेषभाव की नीति को त्याग दो। परस्पर द्वेषभाव का सर्वथा अभाव कर लेना हमारा एक परम पावन कर्तव्य बन जाए, धर्म बन जाए। प्राचीन काल में रावण ने अहंकारवश अपने भाई विभीषण से द्वेष किया और उसे अपने राज्य से निकालकर बाहर कर दिया। विभीषण श्रीराम से जाकर मिला और परिणाम हुआ कि रावण का साम्राज्य ही समाप्त हो गया। इसी प्रकार दुर्योधन ने द्वेष भाव के कारण ही अपने भाईयों युधिष्ठर आदि को अपना भाई कभी नही माना। फल क्या हुआ सभी जानते हैं। इसलिए वेद ने सभी राष्टïवासियों के लिए मूल कर्तव्य प्रतिपादित किया कि परस्पर द्वेष भाव नही रखना है। ऐसी किसी भी संभावना के अपने पास फटकने तक नही देना है जिससे कि परस्पर द्वेष भाव बढ़े।
10. वेद का दसवां मंत्र जो हमें अपने किसी मूल कर्तव्य का स्मरण कराता है, वो ये है :-
दत्ते दहं मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य समीक्षामहे।
सब व्यक्ति मुझे मित्र की दृष्टि से देखें। मैं भी सभी व्यक्तियों को मित्र की दृष्टि से देखूं। सभी परस्पर मित्र की दृष्टि से देखा करें। हे दृढ़ता के देव प्रभो! इस प्रसंग में आप हमें दृढ़ता दीजिये।
यह वेद मंत्र परस्पर मित्रतापूर्ण व्यवहार को लोक व्यवहार की मान्यता दिलाने के लिए प्रयत्नशील समाज का चित्रण कर रहा है। हमारी प्रार्थना भी ऐसी होनी चाहिए कि जिससे व्यक्ति के मध्य ही नही अपितु प्राणिमात्र के मध्य भी ऐसा ही लोकव्यवहार निष्पादित है। इससे सभी प्राणियों के जीवन का सम्मान करना हमारा स्वभाव बन जाएगा। जिससे पर्यावरण संतुलन नही बिगड़ेगा। क्योंकि आज हमारे हृदयों में जीवों के प्रति दयाभाव का समाप्त होना ही पर्यावरण और प्राकृतिक संतुलन को बिगाडऩे में सबसे अधिक भूमिका निभा रहा है।
संविधान और वेद के ये मंत्र
हमारे संविधान के द्वारा जो मूल कर्तव्य हमारे लिए रखे गये हैं उनमें इतनी गंभीरम नही झलकती जितनी इन वेद मंत्रों में निष्पादित मूल कत्र्तव्यों की भाषा में है। महर्षि दयानंद की आस्था तो वेदों में अथाह थी, परंतु संविधान निर्माताओं या बाद में अभी तक आयी सरकारों की उतनी आस्था वेदों में नही रही जितनी आस्था की अपेक्षा की जाती थी। यही कारण रहा कि देश के स्वातंत्रय आंदोलन पर अपने व्यक्तित्व और कृतित्व की अमिट छाप छोडऩे वाले महर्षि दयानंद के चिंतन से प्रभावित लोग संविधान सभा में रहकर भी वेदों के गंभीर विद्यार्थी ना होने के कारण उतनी गहराई से चीजों को खोजकर लाने में असफल रहे, जितनी उनसे अपेक्षा की जाती थी। इसलिए बहुत से अनुच्छेद संविधान में या तो शो पीस बनकर रह गये या उन संवैधानिक अनुच्छेदों की मूल भावना के अनुकूल यहां कार्य नही किया गया।
वेद की भाषा की अपेक्षा कम गंभीर होकर भी संविधान में डाले गये मूल कत्र्तव्यों का बहुत महत्व है। ये हमारे धर्म का और राष्ट्रीय चरित्र का निर्धारण करते हैं। इसलिए होना ये चाहिए कि वेद जिस प्रकार अपने मंत्रों को प्रार्थना के साथ जोड़ता है, कर्तव्य कर्म की प्रर्ति के लिए सर्व समाज को स्फूर्तिमान बनाने का प्रयास करता है, वह प्रयास संविधान का यह अनुच्छेद भी करे। परंतु दुर्भाग्यवश यह अनुच्छेद 51 (क) ऐसा नही करता। इसलिए ये मूल कर्तव्य संविधान के शो पीस बनकर रह गये हैं। इसके अतिरिक्त वेद ने अपने कत्र्तव्यों को एक ईकाई से अर्थात व्यक्ति से आरंभा किया है और उसे वह राष्ट्र तक ले गया है। वेद पहले व्यष्टि को सुधारना चाहता है, फिर समाष्टि की ओर चलता है। संविधान का यह अनुच्छेद व्यष्टि से समष्टि की बात तो करता है, परंतु व्यष्टि के द्वारा खड़े किये गये कृत्रिम विभाजनों (भाषा, सम्प्रदाय, क्षेत्र, जाति आदि) को समाप्त करने का ठोस उपाय नही दे पाया है, इसलिए इस संवैधानिक अनुच्छेद के माध्यम से देश में समष्टिवादी मानस के निर्माण की ओर विशेष कदम नही उठाये जा सके हैं। मूल रूप से भारतीय संस्कृति समष्टिवादी है, परंतु यहां हम देख रहे हैं कि अब देश में व्यष्टिवाद बढ़ता जा रहा है।
वेद हमारे कर्म को धर्म के साथ जोड़ देना चाहता है। जबकि यह संवैधानिक अनुच्छेद कर्म से धर्म को अलग करके चलता है। हमने वेद और महर्षि के चिंतन को इन कत्र्तव्यों में यथावत स्थान नही दिया और ना ही अपने वेदों के अनुकूल इनमें कर्म और धर्म का उचित समन्वय स्थापित किया।
वैदिक कालीन भारत की राजनीतिक व्यवस्था और उसमें नागरिकों के कर्तव्य कर्म की चर्चा करते हुए लाला लाजपतराय अपनी पुस्तक ‘युग प्रवर्तक: स्वामी दयानंद’ में लिखते हैं:-
”सचमुच उस समय का भारत स्वर्गोपम था। यह धरा कर्म भूमि के साथ साथ धर्मभूमि भी थी। प्रत्येक मनुष्य माता पिता पुत्र या पुत्री, पति या पत्नी, राजा और प्रजा, गुरू और शिष्य सभीअपने कत्र्तव्यों को जानते थे और उन पर आचरण भी करते थे। सारे देश में आर्यों का राज्य था सभी वर्णों के लोग स्व स्व कत्र्तव्यों के पालन में लगे थे।
वेद कत्र्तव्यों की जानकारी और उनको आचरण में लाने का प्रबल पक्षधर है। आचरणहीन व्यक्ति को वैदिक समाज हेय दृष्टि से देखता था। जबकि हमारे आज के संविधान ने मूल कत्र्तव्यों को किसी के द्वारा आचरण में न लाने पर उसे हेय दृष्टि से देखने या ऐसे ही किसी अन्य उपाय की चर्चा नही की है। जिससे इन कत्र्तव्यों को लोगों ने अपने लिए अनिवार्य नही माना है।

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