अभिव्यक्ति की आजादी की हत्या में भागीदारी!

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बीते दिनों एक तमिल पत्रकार और ब्लॉगर बद्री शेषाद्रि के एक इंटरव्यू में भारत के मु न्या (मुख्य न्यायधीश) पर कहे गए अपने कथन के कारण तमिल सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153 (दंगे भड़काने के इरादे से उकसाना), 153 ए (1) (ए) (समूहों के बीच शब्दों के जरिये शत्रुता को बढ़ावा देना) और 505 (1) (बी) (जनता में भय पैदा करना) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
लेकिन क्या वास्तव में उनके कथन से ऐसा कुछ होता हुआ भी प्रतीत होता है? उन्होंने तमिल यूट्यूब चैनल आधान को दिए अपने इंटरव्यू में मणिपुर को लेकर कहा था, ”सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार कुछ नहीं करती है तो हम करेंगे। ऐसे में सीजेआई चंद्रचूड़ को गन दे दीजिए और उन्हें मणिपुर भेज दीजिए। देखते हैं क्या वो फिर से राज्य में शांति बहाल कर पाएंगे।”
जिस प्रकार भारत के मु न्या का लोकतंत्र में हस्तक्षेप वाला, पक्षपाती रवैया लोगों को दिखाई दिया है, जनता ने महसूस किया है। उसे देख कर हर आम आदमी के मन में ऐसी बात आनी स्वाभाविक है। क्योंकि इस देश की अदालतों में जहां आम आदमी को न्याय पाने में वर्षों लग जाते हैं, जहां छोटे छोटे मामलों को लेकर उन्हें उनका केस न्यायालय में सुन लिया जाए, इस आस में भी वर्षों इंतजार करना पड़ता है। जहां हजारों विचाराधीन महिलाएं पुरुष जेलों में सिर्फ इसलिए सड़ रहे हैं कि उनकी सुनवाई तक न्यायालयों में नहीं हो रही है। जबकि वहीं आतंकवादियों के लिए न्यायालय रात भर खुलते हैं, तुरंत सुनवाई शुरू हो जाती है, सोशल एक्टिविज्म के नाम पर राज्य में दंगा करवाने वाली महिला के लिए न्यायालय खुलवा कर उन्हे राहत देने वाले ऐसे कुछ न्यायाधीश (जिसे लोगों द्वारा “घोरतम तरीके से पक्षपाती रवैया का बेशर्मीभरा प्रदर्शन” कहते सुना गया) व्यवहार करेंगे तो क्या जनता सभ्य तरीके से प्रतिक्रिया भी नहीं दे सकती?
आखिर इस कथन में क्या भड़काऊ है? या इससे किन दो समूहों में शत्रुता बढ़ेगी? क्या माननीय चंद्रचूड़ यह सुन कर भड़क गए है और उन्होंने हिंसा का रास्ता अख्तियार कर लिया है? या कोई एक समूह शत्रु भाव से उन्हें मारने दौड़ पड़ा है? आखिर क्या कारण है जो इन दंडनीय धाराओं के तहत बद्री शेषादि को गिरफ्तार किया गया? जो पत्रकार, कथित सभ्य और न्यायिक लोग बात- बात पर लोकतंत्र खतरे में है, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हिंदुओं का मानसिक उत्पीड़न करने से गुरेज नहीं करते। वे एक सामान्य सी बात पर ऐसे घबरा जायेंगे यह देख कर हंसी भी आती है और क्षोभ भी होता है। कि किस प्रकार देश में नए किस्म की न्यायिक व्यवस्था लोकतंत्र के रक्षक होने के स्वांग के रूप में चल पड़ी है।
यदि यह सभ्य व्यवस्था है, तो न्यायिक तानाशाही किसे कहेंगे? फिर यदि इस सब में भारत में मु न्या का कोई समर्थन नहीं है। तो वे अब तक मौन कैसे हैं? जो हर छोटी बात पर स्वतः संज्ञान लेते दिखते हैं, और अभिव्यक्ति की आजादी के झंडेबरदार बनते हैं। इस मामले पर चुप है? यह कोई पहला मामला नहीं है। शासन, न्यायालय का ऐसा गठजोड़ लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। ऐसे गठजोड़ का यदि विरोध नहीं किया जाएगा तो भविष्य में ऐसी सभी संस्थानों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जिसे सभ्य समाज ने वर्षों के अपने अनुभवों के पश्चात आत्मसात किया है।
लोकतंत्र के सभी जागरूक प्रहरियों को विचार करना चाहिए कि क्या ऐसे लोग लोकतंत्र में एक तानाशाह के अभिमानी स्वभाव को मजबूत तो नहीं कर रहे? जो स्वयं को हर प्रकार की आलोचना से ऊपर सातवें आसमान पर बैठा खुदा से बड़ा खुदा मान रहा है! भारत के मु न्या को समझना चाहिए कि उनके इस प्रकार मौन रहने से जनता उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी की इस हत्या में भागीदार मानने लगी है। उन्हें बाबा साहेब आंबेडकर की संवैधानिक संस्था में बैठे लोगों को लेकर की गई इस चिंता पर गौर करना चाहिए, उन्होंने कहा था कि “संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर इसे अमल में लाने वाले लोग खराब निकले तो संविधान निश्चित रूप से खराब साबित होगा। वहीं, अगर इसे अमल में लाने वाले अच्छे निकले तो संविधान अच्छा साबित होगा। जिस प्रकार बद्री शेषाद्रि को अपनी बात रखने मात्र के लिए गिरफ्तार किया गया है और न्यायालय ने अभी तक स्वत संज्ञान ले कर उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी का मूल अधिकार देकर सम्मान सहित लौटाया नहीं है। इस प्रक्रिया को खराब की श्रेणी में रखा जाए जा अच्छी? इस पर गंभीरता से माननीय न्यायालय को विचार करने की आवश्यकता है।

युवराज पल्लव
धामपुर, बिजनौर।

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