बिखरे मोती : इस संसार में आनन्द कहाँ ?

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राग-द्वेष की कीच जग,
मत ढूँढों आनंन्द ।
रमण करो हरि-नाम में,
पावै परमानन्द ॥2327॥

ये कैसे लोग हैं? आन्तरिक सौन्दर्य को खोकर, बाहरी सजावट में लगे हैं:-

बाहरी सजावट में लगे,
ये संसारी लोग ।
अन्तःकरण पावित्र कर,
कटेंगें सारे रोग॥2328॥

मन की प्रतिकृति कौन है –

आचरण वैसा ही बने,
जैसे मन में भाव ।
चेहरा ज़ाहिर करत है,
श्रद्धा, प्रेम, तनाव॥2329॥

तत्त्वार्थ :- मन की प्रतिकृति चेहरा होता है। मन में जैसे भाव उठते है,उनका प्रभाव चेहरे पर पड़‌ता हैं, जैसे कोध का भाव है भौहें तन जाती है, यदि भय का भाव है तो चेहरा पीला पड़ जाता है, अपराध बोध का भाव है, तो चेहरा उतर जाता है और तनाव है तो माथे पर चिन्ता की रेखाएँ उभर आती हैं और स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो जाता है किन्तु जब श्रद्धा, स्नेह, प्रेम उमड़‌ते हैं तो चोहरा खिल उठता है, आँखों में अनोखी चमक आ जाती है। एक शेरनी को देखिए, जब वह अपने शिकार पर
टूटती है, तो उसका चेहरा रौद्र रूप में होता है किन्तु जब वह अपने शावकों को अपने सीने से दुग्धपान कराती है, तो उसके चेहरे पर ममता, वात्सल्य और प्रेम की त्रिवेणी दृष्टिगोचर होती है। अत: जैसे मन में भाव होते हैं, मनुष्य का चेहरा भी उसे अभिव्यक्त करता रहता है।

भक्ति कैसे करें:-

इन्द्रियों से भक्ति नहीं,
भक्ति मन से होय।
अभ्यंतर के मैल को,
भक्ति-जल ही धोय॥2330॥

भक्ति तो मन से करो,
इन्द्रियों से व्यवहार।
मूल में भूल कर रहा,
देखो ये संसार॥2331॥

प्रभु कैसे शरणागत कैसे रहें :-

शरणागत प्रभु के रहो,
ज्यों बिल्ली के बाल।
खतरे में बंदरी पड़े,
शिशु छोड़े तत्काल॥2332॥

तत्त्वार्थ : भक्त को भगवान के शरणागत ऐसे होना चाहिए जैसे बिल्ली के बच्चे शिशु व्यवस्था में रहते हैं।ध्यान रहे बिल्ली अपने शिशुओं को जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है तो उनको बड़े प्यार और ममता से अपने जबड़े में उठाती है, बच्चो को अपने दाँत चुभने नही देती है और उनके रक्षण व पोषण का विशेष ध्यान रखती है। ऐसे ही जो भक्त भगवान के शरणागत होते हैं, संकट के समय परमपिता परमात्मा उनका रक्षा पोषण ठीक इसी प्रकार करते है। जबकि बंदरिया का बच्चा अपनी माँ के सीने से लिपटा रहता है,बंदरिया उसको पकड़ती नहीं है और संकट के समय अपने प्राण बचाने के लिए बच्चे को सीने से हटा देती है और छोड़कर चली जाती है, जबकि परमपिता परमात्मा संकट के समय अपने भक्त का रक्षण, पोषण करते हैं ।इसलिए भक्त को चाहिए कि वह भगवान की शरण में बिल्ली के बच्चे की तरह रहें, बंदरिया के बच्चे की तरह नही।
क्रमशः

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