भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक, अध्याय – 18 , ऋषि चिकित्सक: वाग्भट

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राजीव दीक्षित जी अपने वचनों में जिस ऋषि चिकित्सक का सबसे अधिक नाम लेते रहे हैं वे वाग्भट्ट (वाग्भट)  रहे हैं। ऋषि वाग्भट्ट का मानना था कि मनुष्य शरीर में जितने भी रोग होते हैं उनमें से 85% ऐसे होते हैं जो बिना चिकित्सक के ही नष्ट हो सकते हैं। केवल 15% रोग ही ऐसे होते हैं जिनमें हमें किसी योग्य चिकित्सक के पास जाना पड़ सकता है। कहने का अभिप्राय है कि व्यक्ति को अपना चिकित्सक अपने आप होना चाहिए। यह तभी संभव है जब व्यक्ति अपने आहार-विहार और आचार विचार पर एक चिकित्सक की भांति अपने आप ध्यान रखना आरंभ करे। आज के भौतिकवादी युग में लोग इसलिए अधिक बीमार हैं कि उन्होंने अपने शरीर को रोगों का घर मान लिया है । लोग स्वयं अपने आहार-विहार और आचार विचार पर ध्यान नहीं रखते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि शरीर में रोग हैं और उनको दूर करने के लिए हमारे पास डॉक्टर है।

आहार विहार यदि अच्छा है ,आचार विचार भी अच्छे हैं।
ना रोग कोई लग पाएगा, मन में भरे अमृत के लच्छे हैं।।

 ऋषि वाग्भट्ट आयुर्वेद के सबसे प्रभावशाली लेखकों और वैज्ञानिकों में से एक हैं। मानव स्वास्थ्य को लेकर उन्होंने भी अपने काल में बहुत ही उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों में अष्टांगसग्रह(अष्टाङ्गसंग्रह)और अष्टांगहृदयसंहिता (अष्टाङ्गहृदयसंहिता) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 

ऋषि वाग्भट का जन्म कब और कहां पर हुआ ? इस पर अभी तक भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। विद्वानों का मानना है कि उनका जन्म सिंधु नदी के तटवर्ती किसी जनपद में हुआ था। उनके पिता का नाम सिंहगुप्त था,जो कि एक वैदिक ब्राह्मण थे। जबकि उनके गुरु का नाम अवलोकिता था, जो कि बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। यही कारण है कि उनके विचारों पर बौद्ध धर्म के सिद्धांतों की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। बौद्ध धर्म के प्रति अपने विशेष आकर्षण को प्रकट करते हुए उन्होंने अपनी पुस्तक ‘अष्टांग हृदय संहिता’ के प्रारंभ में बौद्ध प्रार्थना को स्थान दिया है।
चिकित्सा संबंधी अपने इस ग्रंथ में वाग्भट ने आयुर्वैदिक औषधियों, चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए विशेष निर्देश, दैनिक व मौसमी निरीक्षण, रोगों की उत्पत्ति, विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों के गुण-दोष, विषैले खाद्य पदार्थों की पहचान व उपचार, व्यक्तिगत स्वच्छता, औषधियाँ, उनके विभाग, उनके लाभों का वर्णन इस ग्रंथ के पहले भाग में किया है। जबकि दूसरे भाग में मानव शरीर की रचना, विभिन्न अंगों, मनुष्य की प्रकृति, मनुष्य के विभिन्न रूप व आचरण आदि का वर्णन है।
तीसरे भाग में ज्वर, मिरगी, उलटी, दमा, चर्म-रोग जैसी बीमारियों व उपचार का वर्णन किया है। ग्रंथ के चौथे भाग में उन्होंने वमन व स्वच्छता, पाँचवाँ, जोकि अंतिम भाग है, में बच्चों व उनके रोगों, पागलपन, आँख, कान, नाक, मुख आदि के रोगों व घावों के उपचार, विभिन्न जानवरों व कीड़ों के काटने के उपचार का वर्णन किया गया है। वाग्भट्ट ने अपने पूर्ववर्ती चिकित्सकों के विषय में भी आदरपूर्वक वर्णन किया है। उनके जन्म की तरह मृत्यु के बारे में भी जानकारी नहीं है।
विद्वानों की यह भी मान्यता है कि वाग्भट आचार्य चरक के शिष्य थे। उनकी इन दोनों पुस्तकों में लगभग 8000 ऐसे सूत्र दिए गए हैं जिनसे मानव शरीर स्वस्थ रह सकता है।
ऋषि वाग्भट ने अष्टांग आयुर्वेद के माध्यम से आयुर्वेद के आठ अंग स्पष्ट किए हैं। इनमें से पहला कायचिकित्सा का है। जिसमें ज्वर, अतिसार, रक्तपित्त, सूखापन, कोढ़, पागलपन और मिर्गी जैसे रोगों का उपचार करने के सूत्र बताए गए हैं। उनके अनुसार आयुर्वेद का दूसरा अंग बालरोग है। जिसमें उन्होंने बालकों के रोग और उनके उपचार को स्पष्ट किया है। बालरोगों में उन्होंने बालकों के विकास, उनके पोषण व उनके रोगों की चिकित्सा की पूरी विधि बताई है।

किसी बालक के विकास में रह न पावे खोट।
सुकोमल मन आगे बढ़े, अनुभव ना हो चोट।।

अष्टांग आयुर्वेद का तीसरा अंग भूतविद्या है। ऋषि वागभट्ट के अनुसार भूत विद्या में शरीर की ऊर्जा बिगड़ जाती है। इसे सही अर्थ में न लेकर लोगों ने गलत ढंग से लिया है। परिणाम स्वरूप कई ठगों ने लोगों को भूतों के नाम पर ठगने का काम भी आरंभ कर दिया। भूत विद्या संबंधी ऋषि वागभट्ट के सूत्रों को बहुत समझदारी के साथ पढ़ने की आवश्यकता है। अष्टांग आयुर्वेद का चौथा शालाक्य तंत्र है। इस अंग में मस्तिष्क आदि की चिकित्सा का उल्लेख किया गया है। इसे ऊर्ध्व अंग चिकित्सा भी कहते हैं।
अष्टांग आयुर्वेद का पांचवा अंग शल्य तंत्र माना गया है। इसमें किसी दुर्घटना आदि में चोट लगने, किसी तेज हथियार से लगी चोट, आग से जलने आदि के उपचार किए जाते हैं। कुछ ऐसे रोग भी होते हैं जिनमें अंगों को निकालना पड़ता है। यह शरीर को किसी स्थान विशेष पर काटकर या खोलकर उस विकृति को शल्य चिकित्सा के माध्यम से दूर किया जाता है। आयुर्वेद का छठा अंग अगद तंत्र है। किसी विषधर जीव के डसने या काटने पर फैलने वाले विष को प्रभावहीन करने की इस प्रक्रिया का भी ऋषि वागभट्ट ने विशेष उल्लेख किया है और इसके विशेष सूत्र हमें दिए हैं।
आयुर्वेद का सातवां अंग ऋषि वागभट्ट ने जरा तंत्र को माना है। बुढापे के आने या आयु के बढ़ने से आने वाली बीमारियों को जरा तंत्र में दिए गए सूत्रों के माध्यम से ठीक किया जा सकता है। इसे रसायन तंत्र भी कहते हैं। रसायन अर्थात बिना रोग के भी जो चिकित्सा की जा सके या जो औषधि बिना रोग के भी ली जा सके। इस प्रकार की औषधि केवल इसलिए दी जाती है कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहे और शरीर में जवानी का आभास देर तक होता रहे। अष्टांग आयुर्वेद का आठवां अंग वाजीकरण तंत्र माना गया है। वाजीकरण तंत्र अर्थात जिनका वीर्य कमजोर है और जिनको वीर्य संबंधी किसी भी प्रकार की बीमारी आ घेरती है, उनके ऐसे सभी रोगों की चिकित्सा को वाजीकरण तंत्र कहा जाता है।
इस प्रकार इन 8 अंगों के माध्यम से ऋषि वाग्भट्ट ने मानव शरीर की प्रत्येक बीमारी को समाप्त करने के सूत्र दिए हैं। ऋषि वाग्भट द्वारा रचित वाग्भट्ट निघंटु का वर्णन यद्यपि कई ग्रंथों में मिलता है, परंतु अब यह ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। इसी प्रकार उनके द्वारा रचित वाग्भट्ट संग्रह नामक ग्रंथ भी अब अनुपलब्ध है। विद्वानों का अनुमान है कि जब हूणों के आक्रमण तक्षशिला विश्वविद्यालय पर हुए तो उस समय ऋषि वाग्भट के इन ग्रंथों को भी जला दिया गया था।
वाग्भट के द्वारा किए गए महान कार्य को अरुण दत्त द्वारा ‘सर्वांगसुंदरा’ में संग्रहित किया गया है। वाग्भट्ट के संबंध में इस पुस्तक को सबसे अधिक प्रमाणित माना जाता है। इसमें दिए गए सूत्रों के अनुसार यदि व्यक्ति अपनी दिनचर्या को बना लेता है तो वह कभी भी रोगी नहीं हो सकता। जैझट्ट और इंदु वाग्भट्ट के शिष्य थे। उन्होंने अपने गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाया। वाग्भट के पुत्र का नाम तसीटाचार्य था। उन्होंने भी ‘चिकित्सा कलिका’ नामक एक ग्रंथ की रचना की थी। दुर्भाग्य से यह ग्रंथ भी अब उपलब्ध नहीं है। इस ग्रंथ में फूलों से चिकित्सा करने के बारे में बताया गया है। स्पष्ट किया गया है कि किस फूल की क्या विशेषता होती है और उसका क्या उपयोग किया जा सकता है ?
होम्योपैथी में बहुत उपयोग किया गया है। वाग्भट के ग्रंथों का अरबी भाषा में अलबरूनी ने अनुवाद किया था।
ऋषि वाग्भट ने ‘अष्टांग हृदयम’ की रचना अपने समकालीन धन्वंतरि जी के आशीर्वाद से की थी। ‘अष्टांग हृदयम’ की रचना वाग्भट्ट जी ने उसी चिंतन शैली में की है जो हमारे अन्य आयुर्वेदाचार्यों की चिंतन शैली मानी जाती रही है। एलोपैथी में हम देखते हैं कि बहुत सी दवाओं का प्रयोग पशुओं पर किया जाता है और फिर वह मनुष्य मात्र के लिए उपयोगी मान ली जाती हैं। इस प्रकार की मान्यता प्रारंभ से ही मूर्खतापूर्ण है। पशुओं की और मनुष्यों की कोई तुलना नहीं की जा सकती। परमपिता परमेश्वर ने जितने भी मनुष्य बनाए हैं उन सबकी प्रकृति अलग-अलग है। किसी के शरीर में कफ की प्रवृत्ति अधिक है तो किसी के शरीर में वायु या पित्त की अधिकता है। जैसी- जैसी जिसकी प्रकृति होती है उसे वैसे-वैसे ही उपचार की आवश्यकता होती है। आयुर्वेद वनस्पतियों में औषधीय तत्व खोजता है। कोई भी आयुर्वेदाचार्य एक ही औषधि को सब मनुष्यों पर लागू नहीं कर सकता विराम उसे पता है कि सबके शरीरों की प्रकृति अलग-अलग है। अतः जैसी-जैसी जिसकी प्रकृति होती है उसे वैसी-वैसी औषधि दी जाती है। यही कारण है कि आयुर्वेदाचार्यों के द्वारा दी जाने वाली कोई भी औषधि शरीर में कोई नई व्याधि उत्पन्न नहीं करती। जबकि हम देखते हैं कि एलोपैथी में जितनी भी दवाइयां हैं वे सब लोगों पर समान रूप से लागू कर दी जाती हैं। एलोपैथिक दवाइयों को लेने के पश्चात अक्सर यह देखा गया है कि शरीर में कोई नई व्याधि उत्पन्न हो जाती है।
यह अच्छी बात है कि वाग्भट और उन जैसे अन्य आयुर्वेदाचार्यों के द्वारा डाली गई चिकित्सा प्रणाली को दक्षिण भारत के कई विद्यालयों में आज भी पढ़ाया जाता है। इसके अतिरिक्त आयुर्वेद से संबंधित कई ग्रंथों को आर्य समाज के गुरुकुलों में भी विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है। जिससे आयुर्वेद की विद्या को सुरक्षित रखने में सफलता प्राप्त हो रही है। आजकल जिस प्रकार लोग भारत की वैदिक परंपराओं की ओर लौट रहे हैं और अपने खानपान, आचार – विचार ,आहार-विहार पर ध्यान देने की का प्रयास कर रहे हैं, उससे यह कहा जा सकता है कि आने वाला समय भारत का होगा। जिसमें ऋषि वाग्भट और उन जैसे सभी आयुर्वेदाचार्यों के पीछे पीछे सारा विश्व समाज चलेगा। निश्चित रूप से वह समय भारत के विश्व गुरु बनने का समय होगा।
विद्वानों की इस मान्यता को हमें स्वीकार करना ही चाहिए कि “आयुर्वेद सनातन नित्यनूतन शास्त्र है। ऋषियों ने सभी प्रकृति के मानवों, पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं में अनेकानेक औषधों के प्रयोग-ज्ञान को जाना है और उसे सभी जीवों के हित के लिए संकलित किया है। आयु व आरोग्य के लिए केवल आयुर्वेद ही पूर्ण उपाय है।”

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

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