रिश्ते खून के नहीं, इनकी जड़ जज्बात

बिखरे मोती-भाग 177

रिश्ते खून से नही अपितु भावनाओं से जुड़े होते हैं :-
 
रिश्ते खून के नहीं,
इनकी जड़ जज्बात।
घायल हो जज्बात जब,
लगै हृदय को आघात ।। 1104 ।।
 
व्याख्या :-
कैसी विडंबना है कि यह संसार रिश्तों की प्रगाढ़ता का मापदण्ड रक्त संबंध को मानता है? ऐसे लोगों की बुद्घि पर हंसी भी आती है और तरस भी। वस्तुत: रिश्तों का आधार हृदय में प्रस्फुटित होने वाली सुकोमल भावनाएं हैं। रक्त संबंध तो पिता-पुत्र का होता है, भाई-भाई का होता है, किंतु एक दूसरे के हृदय में यदि करूणा , स्नेह, श्रद्घा की सुकोमल भावना नहीं तो करूणा स्नेह, श्रद्घा को क्रूरता में बदलते देर नही लगती है। ऐसा साधारण परिवारों में ही नहीं अपितु बड़े-बड़े घरानों और राजपरिवारों में कुकृत्यों के वीभत्स ताण्डव होते देखे गये हैं-जब खून ही खून का प्यासा हो गया। इससे स्पष्ट होता है कि रिश्ते एक अहसास हैं, जिनका प्रवास हमारे हृदय की सुकोमल भावनाओं में हैं। अत: रिश्ते खून से नहीं अपितु भावनाओं से जुड़े हैं। भावना शून्य होने पर रिश्ते प्राणविहीन हो जाते हैं, अर्थात मृतप्राय हो जाते हैं। ऐसा उस समय होता है जब भावनाएं घायल पक्षी की तरह तड़पती हैं, विश्वास का खून होता है, अपेक्षाएं पददलित होती हैं, उन्हें क्रूरता के साथ कुचला जाता है। यह पीड़ा इतनी दर्दनाक और असहनीय होती है कि मनुष्य को हार्ट-अटैक (हृदयाघात) होता है और क्षणभर में मनुष्य मृत्यु का ग्रास बन जाता है। अत: रिश्तों को जिंदा रखना है तो एक दूसरे के प्रति हृदय में सुकोमल भावनाओं को सर्वदा जिंदा रखिये।
भक्ति कब परवान चढ़ती है?
 
ध्यान धरै निर्बैर हो,
कर भूलै सत्काम।
सफल होय साधक वही,
भक्ति करै निष्काम ।। 1105।।
 
व्याख्या :-
भक्ति का मार्ग कोई सरल मार्ग नहीं है, यह साधना का मार्ग है। अंत:करण की पवित्रता इसमें नितांत आवश्यक है, जो साधना अथवा भक्ति की प्रथम सीढ़ी है। इसलिए जो साधक अथवा भक्त परमात्मा के ध्यान में उतरना चाहता है-उसके लिए सबसे पहले आवश्यक है कि उसके मन में किसी के प्रति बैर न हो अन्यथा उसका ध्यान अपने शत्रु अथवा दुश्मन को नीचा दिखाने अथवा बदला लेने के षडय़ंत्रों में लगा रहेगा। इस सतही साधना को भक्ति समझना आत्म प्रवंचना है।
जिस प्रकार समुद्र के किनारे छिल छिले जल में गोता लगाने से गोताखोर को मोती नहीं मिलता है, ठीक इसी प्रकार प्रभु के ध्यान की गहराई में उतरे बिना भक्ति रूपी मोती नहीं मिलता है। इसके लिए भक्त का हृदय अर्थात आर्जव हो अर्थात कुटिलता रहित हो। इसके अतिरिक्त यदि उसके हाथों कोई दान पुण्य का कार्य होता है तो उसे सर्वदा ऐसे भूल जाए जैसे हवन में आहुति डालकर भूल जाते हैं। इसका कारण यह है कि यदि अपने हाथों किये गये किसी दान पुण्य को अथवा सत्कर्म को सर्वदा याद रखोगे तो कत्र्ता होने का अहंकार उत्पन्न होगा और फिर भक्ति के मार्ग से पदस्खलन हो जाएगा। गीता में कर्मयोगी के लक्षण भी आए हैं (दूसरे अध्याय के पचपनवें से बहत्तरवें श्लोक तक और छठे अध्याय के सातवें से नवें श्लोक तक ) ज्ञानयोगी के लक्षण भी आए हैं। चौदहवें अध्याय के बाइसवें से पच्चीसवें श्लोक तक, और भक्त के लक्षण भी आए हैं (बारहवें अध्याय के तेरहवें से उन्नीसवें श्लोक तक)  परंतु केवल भक्त के लक्षणों में ही भगवान कृष्ण कहते हैं-‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् मैत्र: करूण एव च।’
(बारहवां अध्याय तेरहवां श्लोक)
क्रमश:

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