भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक अध्याय – 14, व्याकरण के महान आचार्य पाणिनि

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व्याकरण के महान आचार्य पाणिनि

  व्याकरण के महान आचार्य के रूप में महर्षि पाणिनि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। व्याकरण के क्षेत्र में उन्होंने जो कीर्तिमान स्थापित किया है उसे आज तक कोई लांघ नहीं पाया है। उनकी वैज्ञानिक वैयाकरण क्षमता के चलते यह बात भी पूर्णतया सिद्ध हो जाती है कि संसार की एकमात्र वैज्ञानिक भाषा संस्कृत है। जैसे सृष्टि का निर्माता एक है, वैसे ही इस सृष्टि में मानव मात्र के लिए भाषा भी एक है और वह वैज्ञानिक भाषा संस्कृत ही है। अपनी इस वैज्ञानिक क्षमता के कारण महर्षि पाणिनि भारतीय वांग्मय के आकाश में एक दैदीप्यमान नक्षत्र की भांति सदा अपनी छटा बिखेरते रहेंगे। 

छटा अनोखी दीखती , अद्भुत बुद्धि रूप।
देख तेज का सूर्य, शीश नवाते भूप।।

वाणी के वैखरी रूप को संजोने और संवारने का महत्वपूर्ण कार्य करके उन्होंने मानव की भाषा की वैज्ञानिकता को स्पष्ट करने में अपना महान योगदान दिया है। यही कारण है कि वर्तमान विश्व के सभी भाषाविदों को व्याकरण का ककहरा सीखने के लिए आज भी भारत के इस महान भाषा वैज्ञानिक ऋषि की शरण में जाना पड़ता है। जो व्यक्ति अपने आपको भाषाविद तो मानता है पर महर्षि पाणिनि के विषय में कुछ नहीं जानता, समझो कि वह भाषा के साथ खिलवाड़ तो कर सकता है पर उसके वैज्ञानिक स्वरूप के बारे में कोई ज्ञान नहीं रखता।
महर्षि पाणिनि के जन्म के बारे में मैक्समूलर जैसे पश्चिमी विद्वानों की मान्यता है कि वह इस धरती पर 350 ईसा पूर्व के लगभग विचरते थे। इसके अतिरिक्त सत्यव्रत सामश्रमी जी जैसे विद्वानों की मान्यता है कि वह ईसा से लगभग 2400 वर्ष पहले अवतरित हुए थे। विद्वानों की मान्यता है कि वह भारत भूमि के गांधार नामक प्रदेश के रहने वाले थे। यह वही क्षेत्र है जहां कौरव वंशी धृतराष्ट्र की ससुराल थी। इस प्रदेश के शालातुर गांव में उनका जन्म होने के कारण उन्हें शालातुरीय के नाम से भी पुकारा जाता है।

शालातुरीय नाम से इतिहास करे वंदन जिनका,
मानवता का पोषक सौम्य सुन्दर चिंतन जिनका।
जिनके मानस की वीणा से भाषा को नवसंगीत मिला,
शब्द सागर गंभीर बहुत है और कठिन मंथन जिसका।।

कथासरित्सागर से उनके बारे में जानकारी मिलती है कि वह कात्यायन और इंद्रदत्त जैसे व्याकरण आचार्यों के समकालीन और सहपाठी थे। यह भी कहा जाता है कि उनकी बुद्धि व्याकरण के क्षेत्र में प्रारंभ में बहुत ही मंद थी, परंतु अपने परिश्रम और पुरुषार्थ के बल पर वह आगे बढ़ते रहे और उत्कृष्ट साधना के द्वारा महानता को प्राप्त किया। प्रारंभ में उन्हें शास्त्रार्थ में अपने कात्यायन और व्याडि जैसे जिन सहपाठियों से पराजित होना पड़ा, बाद में उन्होंने उन्हीं पर विजय प्राप्त की। ‘पंचतंत्र’ की एक कहानी के अनुसार पाणिनी की मृत्यु वन में एक शेर के द्वारा किए गए आक्रमण से हुई थी। यद्यपि आधुनिक शोधों से यह स्पष्ट हो चुका है कि कात्यायन और व्याडि पाणिनि के समकालीन नहीं ठहरते। विद्वानों की मान्यता है कि ये दोनों विद्वान ही उनके बाद हुए हैं। अतः जहां जहां पर कात्यायन और व्याडि जैसे व्याकरण आचार्यों को ऋषि पाणिनि का समकालीन लिखा गया है, वह निराधार ही सिद्ध होता है।
महर्षि पाणिनि ने भाषा के क्षेत्र में विज्ञान की उपस्थिति को दर्ज कराते हुए जिस ‘अष्टाध्यायी’ ग्रंथ की रचना की वह युग – युगों तक संसार के भाषाविदों का मार्गदर्शन करता रहेगा। इस महान ग्रंथ में 8 अध्याय हैं, इसीलिए इसका नाम ‘अष्टाध्यायी’ रखा गया है।
व्याकरण के क्षेत्र में संसार का कोई भी भाषा वैज्ञानिक इस ग्रंथ की बराबरी नहीं कर पाया है। अपनी महानता को चोरी-छिपे संसार पर थोपने का प्रयास करने वाले पश्चिम के भाषा वैज्ञानिकों ने भी गाहे-बगाहे कहीं ना कहीं इसी ग्रंथ से ऊर्जा प्राप्त की है।
हमारे प्रत्येक वैदिक विद्वान अथवा ऋषि की यह विशेषता रही है कि उन्होंने संसार के लिए महानता का कोई भी काम करने से पहले उस क्षेत्र में अपने आपसे पहले काम करने वाले ऐसे ही महापुरुषो का उल्लेख करने में कंजूसी नहीं की है। उन्होंने इस बात को बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वीकार किया है कि मुझ से पूर्व भी इस क्षेत्र में अमुक – अमुक महान व्यक्तित्वों ने अपना प्रेरणास्पद कार्य किया है। मैं तो उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने मात्र का कार्य कर रहा हूं।
महर्षि पाणिनि ने भी व्याकरण के क्षेत्र में अपने से पूर्व काम करने वाले ऐसे ही ऋषि पूर्वजों को नमन किया है । जिनमें शाकटायन, आपिशालि, गार्ग्य, काश्यप , गालव आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वैसे भी यह कैसे संभव हो सकता है कि जिस देश के पास वेदों की पवित्र भाषा सृष्टि के प्रारंभ से रही हो , उसके पास व्याकरण के आचार्य ना हों ? यह संभव है कि उन ऋषियों का वह परिश्रम और पुरुषार्थ कहीं संकलित न किया गया हो। या किसी भी कारण से केवल श्रुति परंपरा के रूप में उपलब्ध हो। फिर भी उस सारे परिश्रम और पुरुषार्थ को संकलित कर एक स्थान पर लाना और अपनी पूर्ण बौद्धिक क्षमताओं के आधार पर व्याकरण का ग्रंथ तैयार करना, महर्षि पाणिनि को महानता के उच्चतम शिखर पर स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सृष्टि प्रारंभ में ऋषियों की संतान के रूप में सृष्टि की प्रथम पीढ़ी के लोग महान विद्वान रहे होंगे। उसके पश्चात निरंतर क्षरण की प्रक्रिया आरंभ होने लगी। धीरे-धीरे बहुत काल पश्चात वह समय भी आया होगा जब लोगों को वेदों के अर्थ करने में असुविधा अनुभव होने लगी होगी। तब उन्हें वेदों के वैज्ञानिक अर्थ करने वाले ऋषि निश्चय ही रहे होंगे।
तभी तो भाषा की वैज्ञानिक परंपरा करोड़ों वर्ष तक यथावत बनी रही। महर्षि पाणिनि की महानता और सफलता का इससे अधिक स्पष्ट प्रमाण कोई नहीं हो सकता कि उनके पश्चात भी व्याकरण के क्षेत्र में सैकड़ों आचार्य आए और उन्होंने अपने अपने ग्रंथ भी लिखे, परंतु वे सभी “अष्टाध्यायी” के अधीन ही रहे। कोई भी आचार्य व्याकरण की वैज्ञानिकता के क्षेत्र में महर्षि पाणिनि के इस ग्रंथ से आगे नहीं निकल पाया। महर्षि पाणिनि के बाद जन्मे व्याकरण आचार्यों ने उन्हीं के कार्य को उलटफेर करके उसमें थोड़ा बहुत परिवर्धन या संशोधन करने का कार्य किया।
महर्षि पाणिनि की “अष्टाध्यायी” में समकालीन भारत के भौगोलिक विस्तार, राजनीतिक परिस्थितियों, सामाजिक धार्मिक व्यवहार, लोगों के आर्थिक जीवन, कला उद्योग आदि के संबंध में भी हमें बहुत कुछ जानकारी मिलती है। इस प्रकार यह ग्रंथ इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी बन जाता है। जिससे तत्कालीन भारत के विषय में हमें बड़ी महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हो जाती है। हमारे ऋषियों की यह विशेषता रही है कि वह जिस विषय पर लिख रहे होते हैं उसमें भी समकालीन समाज और राष्ट्र के विषय में कुछ न कुछ ऐसा डाल देते हैं जो बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।
शैलेंद्र सिंह इस संबंध में अपने एक शोध पूर्ण लेख में स्पष्ट करते हैं कि पाणिनि सूत्रों में पठित निश्चित स्थान नामों की सहायता से पाणिनि कालीन भौगोलिक विस्तार का परिचय मिलता है। उत्तर पश्चिम में कापिषी(4/2/69) का उल्लेख मिलता है। यह नगरी प्राचीन काल में अतिप्रसिद्ध राजधानी थी। काबुल से लगभग 50 मील उत्तर इसके प्राचीन अवशेष मिलते हैं। यहाँ से प्राप्त एक शिलालेख में इसे कपिषा कहा गया है। आजकल इसका नाम बेग्राम है। कापिषि से भी और उत्तर में कम्बोज (4/1/175 पा ०सूत्र) जनपद था । जहाँ इस समय मध्य एशिया का पामीर पठार है। कम्बोज के पूर्व में तारिम नदी के समीप कूचा प्रदेश था, जो सम्भवतः वहीँ है। जिसे पाणिनि ने कुच वार (4/3/94) में कहा है । तक्षशिला के दक्षिण पूर्व में मद्र जनपद (4/2/131) था, जिसकी राजधानी शाकल (बर्तमान) स्यालकोट थी। मद्र के दक्षिण में उशीनर (4/2/118) और शिबि जनपद थे। वर्तमान पंजाब का उत्तर पूर्वी भाग जो चंबा से कांगड़ा तक फैला हुआ है प्राचीन त्रिगर्त देश था। सतलुज,व्यास,और रावी,इन तीन नदियों की घाटियों के कारण इसका नाम त्रिगर्त पड़ा (पा०सूत्र 5/3/116)।
दक्षिण पूर्व पंजाब में थानेश्वर कैथल करनाल पानीपत का भूभाग भरत जनपद था। इसी का दूसरा नाम प्राच्य भरत (पा०सूत्र 4/2/112) भी था । क्योंकि यहीं से देश के उदीच्य और प्राच्य इन दो खण्डों की सीमाएं बंट जाती थीं। दिल्ली मेरठ का प्रदेश कुरु जनपद (4/1/172) कहलाता था। उसकी राजधानी हस्तिनापुर था।”
प्रकार भारत के प्राचीन गौरव पूर्ण इतिहास पर ऐतिहासिक स्थलों का बोध हमें ‘अष्टाध्यायी’ से भली प्रकार होता है। जिन इतिहास लेखकों की दृष्टि केवल मुगल, तुर्क या विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण तक सीमित होकर रह जाती है, उनकी आंखें खोलने के लिए महर्षि पाणिनि का यह ग्रंथ बहुत महत्वपूर्ण है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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