छद्म धर्मनिरपेक्षता के साये में चलते इतिहास के कुछ झूठ, भाग-2

विदेशी शासक
सन् 1206 ई. में जब यहां कुतुबुद्दीन ऐबक ने सत्ता संभाली तो वह एक ‘गुलाम’ शासक था। जिसकी हैसियत ‘गुलाम’ शासक जैसी ही थी। ‘गुलाम वंश’ केे शासनकाल को उल्लिखित कर स्पष्ट करने वाले अभिलेखों के अवलोकन से उसकी यह स्थिति आज भी स्पष्ट हो जाएगी। किंतु दुर्भाग्य इस देश का यह रहा कि इस शासक सहित यहां जो भी विदेशी शासक सुल्तान और बादशाह हुए उनको इस प्रकार महिमामंडित किया गया कि मानो वे ‘अप्रतिम’ शासक थे और संपूर्ण भारत उन्हें नमन कर रहा था, अर्थात उनका अभिनंदन और वंदन कर रहा था, और उनकी गुलामी को अपने लिए सौभाग्य समझ रहा था।
मानो वह सूर्य थे और शेष भारतीय नरेश या राजा महाराजा उसके ‘सौर परिवार’ के ग्रह थे, जो उसके चारों ओर चक्कर काट रहे थे। वस्तुत: ऐसा नहीं था। भारत में कोई भी विदेशी शासक ऐसा नहीं हुआ जिसका संपूर्ण भारत पर कभी एकच्छत्र साम्राज्य रहा हो यहां तक कि (कथित महान) अकबर तक का साम्राज्य भी इतना विस्तृत नहीं था कि जिसके साम्राज्य के आधीन सारा भारत रहा हो। उसका प्रभाव क्षेत्र मध्य भारत से आगे नहीं बढ़ पाया था। आधे भारत की स्वतंत्रता इस प्रकार उसके काल तक भी बनी रही। जिसके लिए महाराणा प्रताप जैसे वीर हिंदू शिरोमणि शासकों को श्रेय दिया जाना चाहिए। क्योंकि यदि महाराणा की चुनौती का शूल अकबर के ताज में न चुभ रहा होता तो वह भारत में दक्षिण की ओर भी आगे तक जा सकता था। तब भारत सचमुच इस तथाकथित महान शासक के आधीन होता। यदि संपूर्ण भारत पर अकबर का साम्राज्य स्थापित नहीं हो सका तो इसके लिए महाराणा के पराक्रमी पुरूषार्थ को हमें नमन करना ही होगा।
अकबर के पश्चात औरंगजेब यद्यपि दक्षिण में बहुत आगे तक बढ़ा। किंतु उसका दक्षिण में आगे बढऩा उत्तर भारत की राजनीतिक कुव्यवस्था और अंग्रेजों के यहां पैर फैलाने का कारण बना, जिससे उसकी मृत्यु के उपरांत ही उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा। अत: मानना पड़ेगा कि उसका साम्राज्य भी संपूर्ण भारत पर नहीं था, छत्रपति शिवाजी महाराज ने उसके विशाल साम्राज्य की जड़ों में चूना डाल दिया था।
जिस व्यक्ति को औरंगजेब ‘चूहा’ कहता था-वह उसके साम्राज्य के लिए ‘चूना’ निकला। यही स्थिति अंग्रेजों की ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के शासनकाल की थी। उसका साम्राज्य भी धीरे-धीरे भारत में फैला और वह भी संपूर्ण भारत पर कभी नहीं फैल पाया। इस प्रकार अंग्रेजों को भी सारे भारत में कभी भी एक साथ मिलकर नमस्कार नहीं किया। 
इसी प्रकार ब्रिटिश सम्राट के शासनकाल में भी उसे  1856 ई. से 1947 ई. तक निरंतर अनेक राजाओं से संघर्ष करते रहना पड़ा।  1206 ई. से 1947 ई. तक कभी अंशत: तो कभी अधिकांशत: भारत विदेशी सत्ता के चंगुल से अछूता बना रहा। इसकी जिजीविषा और कर्मशीलता, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रवाद, देश धर्म पर बलिदान होने की भावना और जाति के लिए सर्वस्व होम करने की उत्कट अभिलाषा अनुकरणीय रूप से जीवित रही। इन्हीं गुणों के कारण हमारी हस्ती नही मिटी, यद्यपि ‘सदियों रहा दुश्मन दौरे जहां हमारा।’
इस अनुकरणीय उत्कट अभिलाषा को हमें स्वतंत्र भारत में और भी सुंदर ढंग से प्रस्तुत करना चाहिए था। हमें अपने इतिहास का गौरवपूर्ण ढंग से पुनर्लेखन करने की दिशा में ठोस कार्य करना चाहिए था, जिससे हमारी आने वाली पीढिय़ों को हमारे पूर्वजों के द्वारा किये गये पराक्रमी पुरूषार्थ का यथार्थ बोध हो पाता, किंतु हमारे राजनैतिक नेतृत्व की ‘हिंदू विरोध’ की नीति के कारण हम ऐसा नहीं कर सके। जिसका परिणाम यह हुआ है कि इस देश में अपने हिंदू जाति के इतिहास के प्रति यहां के युवा वर्ग का अनुत्साह दिनों दिन बढ़ता जा रहा है जो कि एक चिंता का विषय है। पता नहीं-
”नीरो कब तक बांसुरी बजाता रहेगा?”

(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

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