स्वार्थभाव मिटे हमारा प्रेमपथ विस्तार हो

महात्मा बुद्घ ने आगे कहा-”विश्व के समस्त प्राणियों केे प्रति हिंसाभाव को अपने आपसे दूर कर देने के कारण ही मैं ‘स्व’ में स्थित हूं, स्वस्थ हूं। पर तुम प्राणियों के प्रति हिंसाभाव रखने के कारण अस्थिर हो। अस्वस्थ हो, एक स्थान पर ठहरते नहीं हो, तुम्हारे भीतर अशांति है, जो तुम्हें व्याकुल किये रखती है। तुम्हारे हिंसा के भाव तुम्हें कहीं पर भी तुम्हें ठहरने नहीं देते हैं।” 
अंगुलिमाल भीतर तक हिल गया था। उसे इस प्रकार का उपदेश करने वाला कोई महात्मा अब से पूर्व नहीं मिला था। उसने समझ लिया कि जीवन में परिवर्तन के क्षण आ चुके हैं, इसलिए अंगुलिमाल ने अपने शस्त्र फेंक दिये। उसने बुद्घ से भिक्षु बनने की दीक्षा ली। उसकी हिंसा अब अहिंसा में परिवर्तित हो चुकी थी।
कहते हैं एक दिन महात्मा बुद्घ अंगुलिमाल को जेतवन में लेकर भ्रमण कर रहे थे। तभी कौशल नरेश प्रसेनजित उनके पास आ पधारे। कुशलक्षेम की प्रक्रियापूर्ण कर प्रसेनजित ने वन में अपने आने का प्रयोजन बताते हुए कहा कि अंगुलिमाल के आतंक से प्रजा को मुक्त करने के लिए उसे पकडऩे के प्रयोजन से वन में आया हूं। महात्मा बुद्घ ने पास बैठे अंगुलिमाल की ओर संकेत कर कहा कि यही अंगुलिमाल है।
प्रसेनजित महात्मा बुद्घ के आत्मबल से प्रसन्नचित हो अपनी राजधानी लौट आया। सचमुच प्रेम में हिला देने की शक्ति है। क्योंकि वास्तविक प्रेम नि:स्वार्थ होता है, उसमें किसी प्रकार का कोई स्वार्थ भाव नहीं होता। वह कल्याण से उपजता है, कल्याण में विकसित होता है और कल्याण में ही समाप्त होता है। इसी को ‘प्रेमपथ’ कहा जा सकता है।
अब आते हैं ‘स्वार्थभाव’ पर कि ये मिटेगा कैसे? इसके विषय में यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि यह तभी मिट सकता है जब व्यक्ति देने की प्रवृत्ति रखेगा। इस संसार में लोग आपको मूर्ख बनाकर लेने वाले भी आएंगे और आपसे प्रेम से मांगने वाले भी आएंगे। हमारे पास यदि कुछ है तो हमें देने की प्रवृत्ति रखनी चाहिए। हां, पात्रता और व्यक्ति की मांगने की प्रवृत्ति और मानसिकता का ध्यान भी रखना चाहिए। जो लोग आपको मूर्ख बनाकर आपको ठगने के उद्देश्य से आपसे मांगने के लिए आ रहे हैं-उनसे सावधान रहना चाहिए। ऐसे लोगों से तो दूरी बनाकर चलना ही उचित है। तुलसीदास जी कहते हैं-
कवि कोविद गावहिं अस नीति।
खल सन कलह न भल नहिं प्रीति।।
उदासीन नित रहिय गुसाईं।
खल परिहरिय स्वान की नाईं।।
अर्थात कवि और बुद्घिमान लोगों की नीति है कि दुष्ट व्यक्ति के साथ न लड़ाई रखनी चाहिए न प्रीति। ऐसे व्यक्ति के प्रति हमें उदासीन रहना चाहिए। दुष्ट व्यक्ति को कुत्ते की भांति छोड़ देना चाहिए।
इसके अतिरिक्त जो लोग भले हैं, सत्पुरूष हैं, जिन्हें हमारे सहयोग की आवश्यकता है और जिन्हें सहयोग देने से उनका कल्याण हो सकता है, उनका हमें सहयोग अवश्य करना चाहिए। ऐसे पात्र लोगों को दिया गया दान ही वास्तव में दान कहलाता है। इस प्रकार के दान से हमारा स्वार्थभाव समाप्त होता है और लोगों में परस्पर सहयोग पूर्ण प्रेम में वृद्घि होती है।
तैत्तिरीयोपनिषद में महर्षि ने स्नातकों के दीक्षांत समारोह के अवसर पर बतायी जाने वाली कुछ ऐसी बातों का उल्लेख किया है जिनसे हमारा जीवन व्यवहार सुधर सकता है और साथ-साथ ही संसार में प्रेमपथ का विस्तार हो सकता है। वह स्नातक से कहते हैं :-
श्रद्घया देयम्। अश्रद्वया देयम्। श्रियादेयम।
हिृया देयम्। भियादेयम्। संविदा देयम्। (तैत्तिरी. 1/11)
मनुष्य को श्रद्घापूर्वक देना चाहिए यदि श्रद्घा न हो तब भी देना चाहिए, प्रसन्नता से देना चाहिए। लज्जा से देना चाहिए, भय से देना चाहिए और प्रेम से देना चाहिए। जहां धर्मार्थ का कार्य हो रहा है, लोक कल्याण का कार्य हो रहा है-वहां श्रद्घा से कुछ न कुछ देना ही चाहिए। देते समय किसी से अपनी तुलना मत करो, आपको जो देना है-उसे दे दो। ऐसे स्थानों पर यदि श्रद्घा कम भी हो तो भी दे देना चाहिए। क्योंकि ऐसे स्थानों पर देने से लाभ ही लाभ है।
प्रसन्नता से तो सभी देते हैं, अर्थात जब आप प्रसन्न हों, घर में कोई प्रसन्नता की बात हुई हो, पुत्र पौत्रादि का जन्म हुआ हो या कोई विवाहादि का शुभ संस्कार हुआ हो तो तब तो सभी देते हैं-पर कभी-कभी ऐसे अवसर भी आते हैं कि जब आप लोक लज्जा से देते हैं, और जब आपको लोकलज्जा के कारण दे भी देना चाहिए। आप देना तो नहीं चाहते पर आपके मित्र साथी बंधु बांधव उसे दे रहे हैं-तो आप पर लोकलज्जा का एक मनोवैज्ञानिक दबाव बना कि मुझे भी कुछ देना चाहिए। तब उस मनोवैज्ञानिक दबाव को अपने लिए शुभ संकेत मानकर दे दो।
बाद में पश्चात्ताप न करो कि मैंने कुछ देकर भूल कर दी। दे दिया तो उचित कर दिया-इसी में आनंद मनाओ। इसी को उपनिषत्कार ऋषि हमारे जीवन व्यवहार की नींव बनाकर हमें स्नातक दीक्षांत के समय समझाता है और बताता है कि चाहे जिस भाव से देना हो, पर दे दो और फिर देकर पश्चात्ताप मत करो। हां, इतना ध्यान करो कि दिया हुआ कहीं न कहीं अच्छे स्थान पर व्यय होना चाहिए। इसी भाव से देने वाले को विदुरजी कहते हैं कि दरिद्र होते हुए भी दान देने वाला स्वर्ग में रहता है।
क्रमश:

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