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महर्षि दयानंद की 200 वी जयंती पर लेख की तृतीय किस्त ,

 ” स्वामीजी महाराज पहले महापुरूष थे जो पश्चिमी देशों के मनुष्यों के गुरू कहलाये।… जिस युग में स्वामी जी हुए उससे कई वर्ष पहले से आज तक ऐसा एक ही पुरूष हुआ है जो विदेशी भाषा नहीं जानता था, जिसने स्वदेश से बाहर एक पैर भी नहीं रखा था, जो स्वदेश के ही अन्नजल से पला था, जो विचारों में स्वदेशी था, आचारों में स्वदेशी था, भाषा और वेश में स्वदेशी था, परंतु वीतराग और परम विद्वान होने से सबका भक्तिभाजन बना हुआ था। महाराज निरपेक्षभाव से समालोचना किया करते थे। सब मतों पर टीका टिप्पणी चढ़ाते। परंतु इतना करने पर भी उनमें कोई ऐसी अलौकिक शक्ति और कई ऐसे गुण थे जिनके कारण वे अपने समय के बुद्घिमानों के सम्मानपात्र बने हुए थे। महाराज के उच्चतम जीवन की घटनाओं का पाठ करते समय हमें तो ऐसा प्रतीत होने लगता है कि आज तक जितने भी महात्मा हुए हैं उनके जीवन के सभी समुज्ज्वल अंश दयानन्द में पाये जाते थे। वह कोई गुण ही न होगा जो उनके सर्वसम्पन्न रूप में विकसित न हुआ हो। महाराज का हिमालय की चोटियों पर चक्कर लगाना, विन्ध्याचल की यात्रा करना, नर्मदा के तट पर घूमना, स्थान-स्थान पर साधु-संतों के दर्शन और सत्संग प्राप्त करना-मंगलमय श्रीराम का स्मरण कराता है। कर्णवास में कर्णसिंह के बिजली के समान चमकते खडग को देखकर भी महाराज नहीं कांपे, तलवार की अति तीक्ष्ण धार को अपनी ओर झुका हुआ अवलोकन करके भी निर्भय बने रहे और साथ ही गम्भीर भाव से कहने लगे कि आत्मा अमर है, अविनाशी है-इसे कोई हनन नहीं कर सकता। यह घटना और ऐसी ही अनेक अन्य घटनाएं ज्ञान के सागर श्रीकृष्ण को मानस नेत्रों के आगे मूर्तिमान बना देती है। अपनी प्यारी भगिनी और पूज्य चाचा की मृत्यु से वैराग्यवान होकर वन-वन में कौपीनमात्रावशेष दिगम्बरी दिशा में फिरना, घोरतम तपस्या करना और अंत में मृत्युंजय महौषध को ब्रह्मसमाधि में लाभ कर लेना महर्षि के जीवन का अंश बुद्घदेव के समान दिखाई देता है। ”दीन-दुखियों ,अपाहिजों और अनाथों को देखकर श्रीमद् दयानन्द जी क्राइस्ट बन जाते हैं। धुरंधर वादियों के सम्मुख श्रीशंकराचार्य का रूप दिखा देते हैं। एक ईश्वर का प्रचार करते और विस्तृत भ्रातृभाव की शिक्षा देते हुए भगवान दयानंद जी श्रीमान मुहम्मद जी प्रतीत होने लगते हैं। ईश्वर का यशोगान करते हुए स्तुति प्रार्थना में जब प्रभु में इतने निमग्न हो जाते हैं कि उनकी आंखों से परमात्म प्रेम की अविरल अश्रुधारा निकल आती है, गदगद कण्ठ और पुलकित गात हो जाते हैं तो सन्तवर रामदास, कबीर, नानक, दादू, चेतन और तुकाराम का समां बंध जाता है। वे संत शिरोमणि जान पड़ते हैं। आर्यत्व की रक्षा के समय वे प्रात:स्मरणीय प्रताप और शिवाजी तथा गुरू गोविन्दसिंह जी का रूप धारण कर लेते हैं।

”महाराज के जीवन को जिस पक्ष में देखें वह सर्वांग सुंदर प्रतीत होता है। त्याग और वैराग्य की उसमें न्यूनता नहीं है। श्रद्घा और भक्ति उसमें अपार पाई जाती है। उसमें ज्ञान अगाध है। तर्क अथाह है। वह समयोचित मति का मंदिर है। प्रेम और उपकार का पुंज है। कृपा और सहानुभूति उसमें कूट-कूटकर भरी है। वह ओज है,वह तेज है, परम प्रताप है, लोकहित है और सकल कला-सम्पूर्ण है।”

इस भक्तिभावाप्लावित कथन के बाद ऋषि के बारे में कुछ कहने को शेष नहीं रहता । फिर भी श्रीमद्भगवद् गीता के शब्दों में-

दिवि सूर्यसहस्रास्य भवेद्युगपदुत्थिता।

यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन:।।

”यदि आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदित हों तो उनकी जैसी आभा और दीप्ति होगी, कुछ-कुछ वैसी ही दीप्ति उस आप्त महापुरूष की होगी।”
राजनीतिक परतंत्रता तथा पराधीनता के कारण पथ -भ्रष्ट होते हुए भारतीय समाज को महर्षि दयानंद सरस्वती ने स्वाधीनता का मंत्र ही प्रदान नहीं किया बल्कि आत्मबोध आत्म गौरव और स्वाभिमान से जिंदा रहना भी सिखाया। वे भारतीय जनमानस के नक्षत्र वह देदीप्यमान सूर्य थे।
जिन्होंने अंधकार को दूर करके भारत में वेदों का पुनः प्रचार प्रसार किया।
महर्षि दयानंद का प्रादुर्भाव भारतवर्ष में ऐसे समय में हुआ जब संस्कृतिक, नैतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक दृष्टि से काफी कमजोर और मृतप्राय हो चुका था। भारत की धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति बहुत ही जर्जर हो गई थी। ऐसे समय में आपका प्रकट होना और भारत के आत्म गौरव को पुनरुत्थान करने का आपके द्वारा भूतपूर्व कार्य किया गया। आपका प्राकट्य ऐसे समय में हुआ जो भारतवर्ष में अंधविश्वास का ज्ञान का भाव और अन्याय सर्वत्र फैला हुआ था उसी को दूर करने में आपने अपने प्राणों की आहुति दी। आपकी तर्कशक्ति आपका बुद्धि विवेक कसौटी पर कसा हुआ प्रत्येक सिद्धांत प्रत्येक जनमानस के हृदय में पृष्ठ करके आंदोलित करता था। जिसके कारण मनुष्य अपनी स्वयं की बुद्धि विवेक और विचार से कार्य करने में प्रयासरत हुआ। महर्षि दयानंद विदेशी राजा की तुलना करते हुए स्वदेशी राजा को बेहतर बताया। अपने धर्म को सर्वोत्कृष्ट ,सर्वोत्तम सिद्ध करने में आप हमेशा अग्रणी रहे। अपने तर्क तराजू पर सारे धर्म ग्रंथों को तोलकर खोखला साबित कर दिया था। स्वयं गुजराती होते हुए भी हिंदी के प्रचार-प्रसार पर अधिक बल दिया। संस्कृत के प्रकांड पंडित और विद्वान होते हुए भी आपकी भाषा सरल हिंदी होती थी।वे प्रखर राष्ट्रवाद के अनन्य उपासक थे।
अपने लेखों भाषणों एवं कार्यों से तथा उपदेशों से राष्ट्रवादी विचारों को प्रचार-प्रसार करने के कारण आप भारतवर्ष में राष्ट्रवाद के प्रथम जनक के रूप में स्थापित है।
घोर राष्ट्रवादी बाल गंगाधर तिलक ने जिस स्वराज का नारा दिया था वह सन 1870 में सर्वप्रथम स्वामी दयानंद ने ही भारतवर्ष में गुंजाया था।
वीर सावरकर ने स्वामी जी के विषय में लिखा था कि स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम युद्ध में निर्भीक सन्यासियों में स्वामी दयानंद ही थे।
स्वामी दयानंद जैसा ओजस्वी वक्ता ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला परम योगी और कोई नहीं था। लॉर्ड मेकॉले की अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा की तुलना में महर्षि दयानंद ने गुरुकुल पद्धति का उपदेश दिया था तथा गुरुकुल शिक्षा पद्धति की स्थापना की थी, ताकि भारत के युवा को गुरुकुल की शिक्षा पद्धति से उसके प्राचीन गौरव से वेद के उपदेशों से ज्ञान देकर एक अच्छा मानव बनाया जा सके।
बाल विवाह, पर्दा प्रथा, जाति प्रथा, छुआछूत जैसी अनेक बुराइयों के निवारण के लिए महर्षि दयानंद ने जीवन भर संघर्ष किया। दलित और शोषित को तथा नारियों को समानता ,समरसता और सद्भावना का दर्जा दिया।
महर्षि दयानंद ने वेदों की शिक्षा को मानव मात्र के कल्याण के लिए प्रस्तुत किया। जिन्होंने अपने अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका , संस्कार विधि में वेदों के स्वर्णिम चिंतन को बखूबी प्रस्तुत किया।
वर्ष 1873 की एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना है जब ऋषि दयानंद कोलकाता में थे तो एक अंग्रेज अधिकारी नॉर्थब्रुक ने स्वामी दयानंद से कहा कि अंग्रेजी राज्य सदैव रहे इसके लिए भी ईश्वर से प्रार्थना कीजिएगा। जिस पर महर्षि दयानंद ने निर्भीकता के साथ उत्तर दिया था कि स्वाधीनता स्वराज्य मेरी आत्मा और भारतवर्ष की आवाज है और यही मुझे प्रिय है। मैं विदेशी स्वराज के लिए प्रार्थना नहीं कर सकता। इस पर उन्होंने वेदों के प्रमाण देकर अंग्रेज को निरुत्तर कर दिया।
महर्षि अरविंद घोष ने कहा है कि महर्षि दयानंद ने वैदिक ग्रंथों के उद्धार का कार्य किया ।वेदों के उपदेशों के माध्यम से ही मनुष्य की व्यक्तिगत ,पारिवारिक, सामाजिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होना उन्होंने बताया तथा भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होने का भी एक मात्र साधन बताया। अविद्या का नाश और विद्या की सर्वदा वृद्धि करने पर उन्होंने बल दिया। महर्षि दयानंद ने पूरे विश्व को “कृण्वंतो विश्वमार्यम् “का संदेश दिया। जीवन पर्यंत महर्षि दयानंद वैदिक संस्कृति के लिए समर्पित रहे। उनके जैसा वेदों का और संस्कृत का प्रकांड पंडित नहीं हुआ। वे देववाणी और वेदवाणी के ध्वजा वाहक थे।
भारतवर्ष में अनेकों ऋषि और मुनि हुए हैं इसलिए भारत की धरा बहुत ही पावन धरा है ।
वर्ष 1859 में गुरु विरजानंद जी से व्याकरण , योग दर्शन की शिक्षा प्राप्त की। 1867 हरिद्वार में महाकुंभ के अवसर पर वेद वाणी का डंका बजाया।
1875 में स्वामी दयानंद ने मुंबई में प्रथम आर्य समाज की स्थापना की ।उन्होंने वेदों को समस्त ज्ञान एवं धर्म के मूल स्रोत और प्रमाण ग्रंथ के रूप में स्थापित किया।
उन्होंने अनेकों मिथ्या धारणाओं को तोड़कर अनुचित परंपराओं का खंडन मंडन किया।
हे भारत के (और संपूर्ण ब्रह्मांड की मानवजाति के) भावी भाग्यविधाता, अछुत्तोधारक, नारीउद्धारक ,समाज सुधारक, पूर्ण आप्त राष्ट्रपुरूष ऋषि दयानन्द!
तेरी जय हो ! जय हो ! जय हो ।
संकलनकर्ता ,प्रस्तोता
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट चेयरमैन उगता भारत समाचार पत्र

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