‘पराली’ बन सकती है हमारे प्राण हरने वाली

दिल्ली में हर साल की तरह इस बार भी स्मॉग ने अपना कहर बरपा किया है। इसकी गिरफ्त में आकर बहुत से लोगों को हृदय की बीमारियों ने घेर लिया है, तो कईयों को ऐसी ही दूसरी घातक बीमारियों के उभरने की शिकायत रही है। यह सब इसलिए हुआ है कि हमारे किसानों ने अपने खेतों में पराली को यूं ही जला दिया है और उसके धुएं ने पूरे एनसीआर सहित पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बड़े क्षेत्र को अपनी गिरफ्त में ले लिया। यदि इसके कारणों पर विचार करें तो पराली जलाने के लिए किसान इसलिए मजबूर हुआ है कि मनुष्य ने गाय और भैंस आदि उन पशुओं को मार-मारकर खाते हुए कम कर दिया है, जिन्हें पराली खिलाने में प्रयोग हो सकती थी।  
पशु ‘पराली’ खाते थे और ‘पराली’ से गोबर की खाद बनती थी, फिर वह गोबर की खाद खेत में जाती थी तो अच्छी उपज बनाने में सहायता करती थी। ‘पराली’ के समापन का यह प्राकृतिक चक्र था, जिसे मनुष्य ने अपने और ‘पराली’ के बीच खड़े पशुओं को मारकर उन्हें कम करके बिगाड़ दिया है। अब उसका परिणाम आदमी खुद भोग रहा है। प्रकृति से लड़ोगे और प्रकृति के खिलाफ जाओगे तो यही परिणाम आएंगे। हमें आने वाले समय के लिए या तो सावधान होकर समय रहते समस्या का सही समाधान खोज लेना चाहिए, अन्यथा दम घुटकर मरने को तैयार रहना चाहिए।
‘पराली’ के खात्मे का सही तरीका है कि पशु बढ़ाये जाएं और देश में पशु हत्या निषेध पूर्णत: लागू हो। जो लोग पशु हत्या निषेध में भी किसी प्रकार की साम्प्रदायिकता देखते हैं या अपनी किसी धर्मनिरपेक्षता जैसी अवधारणा को खतरे में पड़ा अनुभव करते हैं-उनकी इस प्रकार की छाती पीटने की प्रवृत्ति को लोकतंत्र की प्रक्रिया को अवरूद्घ करने वाली मानकर नजरन्दाज किया जाए। लोकतंत्र सबके जीने की गारंटी देने वाली शासन प्रणाली है-यह मानकर लोकतंत्र का यह संस्कार देश में सर्वत्र लागू किया जाए कि ईश्वर ने जो भी प्राणधारी धरती पर भेजा है उसे जीने का अधिकार है। किसी भी प्राणधारी का वध मनुष्य तभी कर सकता है जब वह पशु हिंसक हो गया हो या किसी भी प्रकार से शेष प्राणी समाज के लिए अनुपयोगी और खतरनाक हो गया हो।
इसके पश्चात ‘पराली’ को समाप्त करने के लिए हमें किसानों को प्रोत्साहित करते हुए यह समझाना चाहिए कि वे ‘पराली’ को अपने ही खेत में एक कोने में गहरा गड्ढा खोदकर उसमें इसकी भुस्सी बनाकर डाल दें, जिसमें कुछ मिट्टी और कुछ गोबर की खाद भी मिला दी जाए। इस प्रकार यह भुस्सी गोबर और मिट्टी के साथ मिलकर कुछ समय बाद खाद बन जाएगी जिसे किसान लोग अपने खेतों में डालें और यूरिया जैसी घातक खादों से अपने आपको और अपनी खेती को बचायें।
कुछ लोगों के पेट में दर्द होता है जब पर्यावरण प्रदूषण को समाप्त करने के लिए भारत की वैदिक यज्ञ परम्परा को व्यवहार में लाने की बात कही जाती है। ये वही लोग हैं जो भारत और भारतीयता से नफरत करते हैं और भारतीयता की बात को सुनने को तैयार नहीं होते। इन्हें यदि भारतीयता की बात सुनाई भी जाती हैं तो ये ऐसे सुनाने वाले लोगों को असहिष्णु और हिन्दू आतंकवादी या हिन्दू तालीबानी आदि के विशेषण देकर उन्हें लांछित और आरोपित करते हैं। जबकि वास्तव में ये स्वयं असहिष्णु होते हैं। इन्हें अपनी धारणाओं में जीने की लत पड़ चुकी होती है, जिनके सामने इन्हें भारत के वैज्ञानिक धर्म की वैज्ञानिक बातें भी मूर्खतापूर्ण लगती हैं। हमारा मानना है कि यज्ञादि की परम्परा को बढ़ाकर भी पर्यावरण प्रदूषण को शुद्घ रखने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास होने चाहिएं।
कुछ लोगों ने मांसाहार के समर्थन में टी.वी. चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में बड़-चढक़र भाग लिया था और यह तर्क किया था कि कोई मनुष्य क्या खाता है?-यह उसका अपना अधिकार है। इस अधिकार में विघ्न डालने का अतिक्रमण किसी को भी नहीं करना चाहिए। ऐसे लोगों के तर्क को सभी मांसाहारियों ने बल्लियों उछलकर स्वीकार किया था।
अब समय आ गया है कि ऐसे लोगों को स्मॉग की समस्या के दृष्टिगत अपनी धारणा पर विचार करना चाहिए। इनकी मूर्खता के चलते गाय, भैंस आदि पशु कम हुए तो काश्तकार ने ‘पराली’ जलानी आरम्भ कर दी और उस ‘पराली’ ने हमारी नाक में दम करना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार मूल कारण पशुओं की लाशों की कब्र बनी इन मांसाहारियों की तोंद है। इस तोंद पर आक्रमण होना चाहिए और इसे कम करने की दिशा में गम्भीर प्रयास होने चाहिए। मनुष्य को पशुओं की चलती फिरती कब्रगाह बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि फिर भी मनुष्य ऐसा करता है तो समझना होगा कि वह अपनी मनुष्यता से और अपने धर्म से पतित हो गया है। यही धर्मनिरपेक्षता है और हमें भारतीय संदर्भों में इसे कतई स्वीकार नहीं करना चाहिए।
भारतीय संस्कृति में पशु, प्रकृति और मनुष्य के बीच किसी प्रकार की प्रतियोगिता देखने की मूर्खता नहीं की जाती, अपितु इन तीनों के बीच एक सुंदर समन्वय देखा जाता है और माना जाता है कि ये सभी एक दूसरे के पूरक हैं। यदि कोई से भी पूरक को छेडऩे का प्रयास किया गया तो दूसरा प्राण त्यागने की स्थिति में आ जाएगा। क्या ही अच्छा हो कि इन तीनों के समन्वय को बनाये रखने के दृष्टिकोण से देश में मानव श्रंखलाओं का निर्माण हो, मोमबत्ती जलाई जाए और जनजागरण करने हेतु विशेष कार्यक्रमों का आयोजन हो। यदि समय रहते इन सब उपायों पर विचार नहीं किया गया तो आने वाली पीढिय़ां हमारे बारे में यही सोचेंगी कि उस समय के लोग अपने ज्ञान के दम्भ में जीने वाले लोग थे, जो निरे पाखण्डी और अपने बारे में अपने ही द्वारा बनाई गयी इस धारणा में जीने वाले लोग थे कि हम बहुत बड़े आधुनिक, वैज्ञानिक और सभ्य हैं। यह अलग बात है कि इन आधुनिक, वैज्ञानिक और सभ्य लोगों को नहीं पता कि आधुनिकता क्या होती है? वैज्ञानिकता क्या होती है? और सभ्यता क्या होती है?

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