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दुनिया के सभी प्राणि अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार हजारों युक्तियों उपायों द्वारा परमात्मा को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। मनुष्य भी ईश्वर प्राप्ति के लिए पूजा-पाठ, त्याग, तीर्थ , दान ,चौरासी आसन, होम -हवन करते हैं। लोग परमात्मा के लिए घर-बार छोड़कर जंगलों पहाड़ों में जाकर छुपकर बैठ जाते हैं । जटाऐं रखते हैं, धूनियां तापते हैं ,मौन धारण करते हैं ,मंदिरों -मस्जिदों, गिरजाघर -गुरुद्वारों में जाकर माथा टेकते हैं, देव पूजा तथा मूर्ति पूजा में लगे रहते हैं, वेद शास्त्रों , ग्रंथों -पोथियों का पाठ करते हैं । यह सब संतों व गुरु वाणी के अनुसार मनमत कर्म है । मन को मत द्वारा बनाए गये साधनों द्वारा वश में नहीं किया जा सकता I इसलिए उक्त साधनों द्वारा न मन शांत होता है और न उसकी मैल ही उतरती है, बल्कि अंहकार बढ़ जाता है ।
गुरु वाणी का शब्द है कि –
पढ़िये जेते बरस – बरस पढिये जैते मास
पढ़िये जेते आरजा पढिये जेते सास

नानक लेखे एक गल है मैं जाखण झाख

हजूर स्वामी जी महाराज की वाणी है कि –
काल ने जगत अजब भरमाया, मैं क्या क्या करूं बखान॥
जो साधन थे पिछले जुग के, सो कलयुग में किए प्रमान॥
मूरख प्रानी मन सैलानी सो अटके जल और पाषान ॥
जप तप व्रत संयम बहू धोखे, पंच अग्नि में जले निदान॥

पूर्ण सन्त महात्मा चाहे वे किसी भी धर्म,देश या समय में क्यों ना आए हों, वे मनुष्य को शराब और नशे के हानिकारक नतीजों से सावधान करते हैं और इनके प्रयोग की सख्त मनाही करते हैं।
स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है । प्रत्येक मनुष्य की कार्य क्षमता उसके स्वास्थ्य पर निर्भर होती है और उस को अपना स्वास्थ्य बेहतर रखने के लिए जीवन की कार्यशैली व जीवनशैली भी बेहतर एवं अनुकूल रखनी चाहिए । जैसे समय पर सात्विक, पौष्टिक व ताजा भोजन लेना चाहिए, समय पर सोना एवं समय पर सुबह सूरज निकलने से पूर्व प्रभु परमात्मा का ध्यान करके उठना चाहिए । अच्छी दिनचर्या से अच्छे जीवन का निर्माण होता है। प्रातः काल में जल्दी उठने से बुद्धि शुद्ध होती है और मन में सात्विकता के भाव सारे दिन बने रहते हैं। इससे दिनभर हम शांत चित्त होकर अपने कार्यों में लगे रहते हैं। जो भी लोग हमारे संपर्क में आते हैं वे भी हमारे साथ सात्विक ऊर्जा से भर जाते हैं। इसलिए सुबह जल्दी उठने के अनेक लाभ हैं।
महान एवं सफल मनुष्य का कथन है कि “जैसा खाए अन्न वैसा होगा मन और जैसा पीवे पानी वैसी होवै वाणी।”
कहने का अभिप्राय है कि हमें संतो की जीवन शैली से अपने खानपान में भी सुधार करना चाहिए। संत जीवन यापन के लिए अन्न जल ग्रहण करते हैं। वे शरीर की पुष्टि के लिए और विषय भोग में फंसने के लिए अन्न जल ग्रहण नहीं करते। सात्विक भाव के साथ अन्न ग्रहण करना चाहिए। अन्न ग्रहण करते समय जैसे भाग होते हैं वैसा ही हमारा मन हो जाता है।

ऋषिराज नागर एडवोकेट

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