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भारत जटिलताओं में जकड़ा हुआ देश है। इसकी जटिलताओं को और भी अधिक जटिल बनाने में राजनीति का विशेष योगदान रहा है। राजनीतिक दल और उनके नेता इन जटिलताओं को खोलने और सुलझाने के स्थान पर उलझाने का काम करते आए हैं।
1947 में मिली स्वाधीनता के पश्चात होना तो यह चाहिए था कि इसकी जटिलताओं को चुन चुनकर समाप्त किया जाता , पर राजनीतिक दल उन्हें और अधिक उलझाते चले गए। जैसे कहा जाता है कि भारत विभिन्नताओं का देश है, इसमें विभिन्न संप्रदायों, समुदायों और वर्गों के लोग रहते हैं। राजनीतिक दलों ने इन सभी संप्रदायों, समुदायों और वर्गों के लोगों को सामाजिक समरसता के एकता के भाव में पिरोने के स्थान पर उनकी विभिन्नताओं को और भी अधिक हवा देकर एक दूसरे का शत्रु बनाने में योगदान दिया है।
अक्सर लोग यह कहते मिल जाते हैं कि भारत एक विशाल देश है, यहां विभिन्न समुदायों के लोग रहते हैं। उनकी विभिन्न संस्कृतियां हैं। ऐसे लेख संपादकीय कॉलम में या संपादकीय पृष्ठ पर स्तंभ लेखक भी देते रहते हैं। राजनीतिक दलों के द्वारा ऐसा कहकर या किसी लेखक या स्तंभकार या पत्रकार या संपादक के द्वारा ऐसे लेख लिखकर किन्ही विशेष समुदायों, संप्रदायों या वर्गों के लोगों की सहानुभूति तो अर्जित की जा सकती है परंतु इससे देश का कोई भला नहीं होता। मूल रूप में हम सबका धर्म एक ही है, जिसे वैदिक धर्म कहते हैं। हमारी संस्कृति भी एक है जिसे वैदिक संस्कृति कहते हैं। इससे अलग कोई संस्कृति या धर्म भारत में नहीं हो सकता। संपूर्ण भूमंडल पर मानव जाति का एक ही धर्म है और वह मानवता है, उसी धर्म को वैदिक धर्म कहा जाता है।
उदाहरण के रूप में किसी संप्रदाय की अपनी भाषा और उसकी धार्मिक मान्यताओं को उस समय भी राजनीति के द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है जब वे सीधे-सीधे भारत की सांस्कृतिक विरासत को या तो चोटिल कर रही हों या फिर राष्ट्रीय एकता और अखंडता को किसी प्रकार का खतरा पैदा कर रही हों या समाज में किसी भी प्रकार का उपद्रव फैलाने में सहायता कर रही हों या फिर किसी त्योहार विशेष की आड़ में बेइंतहा पशुओं को मरवाने में सहायता कर रही हों। ऐसी सांप्रदायिक मान्यताओं ,धारणाओं, विचारों या मतों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर या वोटों की राजनीति के सामने घुटने टेकते हुए राजनीतिक लोग यह कहकर स्वीकार करते हैं कि भारत बहुत सी संस्कृतियों का देश है , जिसमें किसी की संस्कृति को आप चोट नहीं पहुंचा सकते ।
वास्तव में ऐसी शब्दावली अपनी असफलता को छुपाने का एक माध्यम होती है। जब कोई नेता या कोई लेखक या कोई स्तंभकार सच को सच नहीं कह पाता है तो वह संकल्पों के स्थान पर विकल्पों को खोजता है। जो लोग भारत में बहुत सी संस्कृतियों के होने का बहाना बनाकर भारत की मूल संस्कृति को विकृत कर रहे हैं या विलुप्त करने में सहायता पहुंचा रहे हैं वे देश के शत्रु हैं। उनसे उचित रूप से यह भी पूछा जा सकता है कि यदि भारत बहुत सी संस्कृतियों का देश है तो इसकी वह संस्कृति कौन सी है जो अन्य संस्कृतियों पर शासन करने में सक्षम हो ?
जब इनसे ऐसा प्रश्न पूछा जाता है तो उस प्रश्न का इनके पास कोई उत्तर नहीं होता ,और यदि उत्तर होता भी है तो अपनी अंतरात्मा की आवाज को ये दबाकर या छुपाकर मुंह बचाने का प्रयास करते देखे जाते हैं। ये कभी नहीं कह सकते कि भारत की वैदिक संस्कृति इस देश की मूल वैधानिक और सब पर शासन करने वाली सर्वमान्य संस्कृति है। उसी के शाश्वत सनातन मूल्यों को भारतीय संविधान अपनी मान्यता देता है और भारत विश्व गुरु भी उसी संस्कृति के मूल्यों को अपनाकर बन सकता है। भारत के संविधान में प्रदर्शित किए गए मौलिक अधिकार भी उसी संस्कृति के जीवित रहते हुए प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त हो सकते हैं और इसी संस्कृति के मानवीय मूल्यों को भारत के संविधान के भीतर नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के रूप में स्थापित किया गया है। प्राणिमात्र के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील भी वैदिक संस्कृति है। इसलिए ऐसी कोई संस्कृति इस देश की संस्कृति की सहानुगामी नहीं हो सकती जो अन्य प्राणियों के जीवन का हनन करती हो या उन्हें चोट पहुंचाती हो। नेताओं से अपेक्षा की तो जा सकती है कि वे भारत की वैदिक संस्कृति को श्रेष्ठ बनाने के लिए प्रयास करें, परंतु वे कभी ऐसे प्रयास करते देखे नहीं जाते।
यह कहा जाता है कि देश के सभी समुदाय मिलकर उन्नति करें। पर जब सबकी सोच ,सबका चिन्तन और सबकी दिशा अलग-अलग होगी तो सब मिलकर उन्नति कभी नहीं कर सकते। सब उन्नति तभी करेंगे जब सबकी सोच, सब की दिशा , सबका चिंतन ,सबकी मान्यताएं और सबकी धारणाएं एक हो जाएंगी। देश में सबकी सोच, दिशा ,चिंतन, मान्यताएं और धारणाएं अलग-अलग होने के कारण ही देश में जातिवाद और संप्रदायवाद भयंकर रूप में फैल चुका है। सबको अपने अपने वर्ग, समुदाय, संप्रदाय के हितों की चिंता है राष्ट्र के हित क्या हो सकते हैं ? इसकी ओर सोचने का किसी के पास समय नहीं है। एक समय ऐसा आएगा जब वर्ग, समुदाय और संप्रदाय के हित ही राष्ट्रीय माने जाने लगेंगे, तब क्या हमारे देश के एक से अधिक पकड़े हो जाएंगे ? जब सब वर्गों, संप्रदायों और समुदायों के राष्ट्रीय नेता अलग-अलग होंगे, उनकी पूजा पद्धति अलग-अलग होगी और उनकी सामाजिक मान्यताएं अलग-अलग होंगी तो फिर कोई ऐसा जिन्ना पैदा होगा जो कहेगा कि जब सब कुछ अलग अलग है तो हमें राष्ट्र भी अलग चाहिए। यही जिन्नाह के द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत का मूल स्रोत था। हमने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस प्रकार के किसी भी स्रोत की जड़ों को सुखा देना चाहिए था । जिसके लिए आवश्यकता थी कि सभी वर्ग, समुदाय और संप्रदाय एक बिंदु पर सोचें और एक घाट पर पानी पीने वाले बनें।
देश में अल्पसंख्यक शब्द को संविधान की मूल भावना के विरुद्ध जाकर भी रचा गया है। अल्पसंख्यक का अभिप्राय हमारे देश में केवल मुस्लिम समुदाय से ही लगाया जाता है। यद्यपि अब इसके लाभ लेने के लिए ईसाई और दूसरे समुदाय के लोग भी अपने आपको प्रस्तुत करने लगे हैं। देश के संविधान में अल्पसंख्यक शब्द की परिकल्पना धार्मिक, भाषाई एवं सांस्कृतिक रूप से भिन्न-भिन्न वर्गों के लिए समाविष्ट की गई है। कांग्रेस सहित सभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल अल्पसंख्यकों को अपने साथ लगाए रखने के लिए वोट बैंक की राजनीति देश में करते रहे हैं। वोट बैंक की इस राष्ट्रघाती नीति ने देश में संप्रदायवाद को प्रबलता प्रदान की है।
कांग्रेस द्वारा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 देश में लाया गया। उस समय लोगों ने कांग्रेस के इस प्रकार के राजनीतिक हथकंडे का भरपूर विरोध किया था, परंतु सत्ता मद में उसने राष्ट्र हितों के विपरीत जाकर भी इस अधिनियम को लागू करवाया। अल्पसंख्यक वाद के जिस भूत को 1947 में देश के बंटवारे की दुखद नियति को देखकर हमें उसी समय दफन कर देना चाहिए था उसे 1992 में कांग्रेस ने पुनर्जीवित कर लिया। यद्यपि भूतों की कहानी से डराने के लिए हमारे समाज में अनेक प्रकार की कहानियां गढ़ी गई हैं , पर जब कोई मृत घटना या अतीत का दुखद अध्याय फिर से जीवित होकर हमारे सामने आ जाता है तो उस समय यही लगता है कि भूत होते हैं और वह देर तक हमारा पीछा करते हैं। कहा जाता है कि गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ने चाहिए । क्योंकि यदि इनको उखाड़ा जाएगा तो वह दुर्गंध फैलाएंगे पर कांग्रेस ने इस तथ्य की उपेक्षा कर गड़े मुर्दों को उखाड़ लिया। इस अधिनियम के माध्यम से कांग्रेस ने देश की मुख्यधारा से पृथक वंचित धार्मिक समुदायों की स्थिति के कारणों के मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल दिया। मई 1993 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन कांग्रेस की तत्कालीन केंद्र सरकार ने कर दिया।
यदि हमारे देश में अल्पसंख्यकवाद बनाम बहुसंख्यकवाद को जीवित रखने को देश के नेता उचित मानते तो देश की संविधान सभा में तत्संबंधी प्रस्ताव लाया जा सकता था, परंतु ऐसा नहीं किया गया। क्योंकि देश की संविधान सभा के सभी सम्मानित सदस्य यह भली प्रकार जानते थे कि अल्पसंख्यकवाद बनाम और बहुसंख्यक वाद ने देश को बर्बाद करके रख दिया है। उनकी मान्यता थी कि इस प्रकार की बर्बादी के ऐसे भूत को अब बोतल के अंदर बंद कर देना ही उचित है। इस प्रकार कांग्रेस के द्वारा देश में अल्पसंख्यकों के लिए लाया गया अधिनियम संविधान निर्माताओं की भावनाओं के भी विपरीत था। कॉन्ग्रेस अधिनियम बनाकर ही नहीं रुक गई थी बल्कि उसने अक्टूबर 1993 में 5 धार्मिक समुदायों को अल्पसंख्यकों के रूप में अधिसूचित भी कर दिया।
इन अल्पसंख्यक समुदायों में मुसलमान, ईसाई, सिख ,बौद्ध एवं पारसी सम्मिलित किए गए। जिन मुगलों को उनके तथाकथित खानदानी या उनसे किसी भी प्रकार की सहानुभूति रखने वाले लोग यह कहकर भारतीय कहते या बताते हैं कि वे भारत में ही जन्मे और भारत में ही मरे, इसलिए वह और उनके वंशज भारतीय हो गए । जब वे भारतीय हो गए तो फिर सांप्रदायिक आधार पर उन्हें विशेष सुविधाएं देकर उनके अलग अस्तित्व को क्यों स्वीकार किया जाता है ? भारतीयता पर वरीयता देकर उन्हें अधिक अधिकार देने का मूर्खतापूर्ण कार्य किया जाता है। भारतीय भारतीय के बीच में अंतर करना किसी भी दृष्टिकोण से संवैधानिक और वैधानिक नहीं है ? किसी भी व्यक्ति को भारतीय न कहकर अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक मानना या कहना या संबोधित करना भारतीयता की पहचान को मिटाने के समान है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जब उपरोक्त पांच वर्गों या संप्रदायों को अल्पसंख्यक मान लिया गया तो जैन संप्रदाय के लोगों ने भी अपने आपको अल्पसंख्यक कहकर इसी सूची में सम्मिलित कराने की मांग की। जिसे 2014 में कांग्रेस की सरकार ने मान लिया। इस प्रकार देश में अल्पसंख्यक समुदायों की संख्या 5 से बढ़कर 6 हो गई।
भाजपा प्रारंभ से ही अल्पसंख्यक आयोग की विरोधी रही है। इस पार्टी ने 1998 में सत्ता में आने से पहले ही यह स्पष्ट किया था कि वह अल्पसंख्यक आयोग को समाप्त करेगी और इसके स्थान पर मानव अधिकार आयोग स्थापित किया जाएगा। पार्टी की स्पष्ट मान्यता थी कि भारतवर्ष में अल्पसंख्यक आयोग उन्हीं जटिलताओं को पैदा करने में सहायता कर रहा है जो इस देश के विभाजन का एक प्रमुख कारण बनी थी।
1998 में जब भाजपा की सरकार केंद्र में बनी तो उस समय माना जा सकता था कि उसके पास अपना स्पष्ट जनादेश नहीं था, परंतु अब जबकि केंद्र में भाजपा की स्पष्ट जनादेश वाली सरकार है तो इस दिशा में उसका ठोस कार्य करने का स्वर्णिम अवसर है। देश में किसी भी प्रकार का अल्पसंख्यक वाद कहीं पर दिखना नहीं चाहिए , क्योंकि यह संविधान विरोधी मानसिकता को पुनर्जीवित करने वाला एक भूत है। भाजपा और आरएसएस को मिलकर इस भूत से देश को मुक्ति दिलाने का काम करना चाहिए।
इस सामाजिक जटिलता का एक और विद्रूपित चेहरा यह है कि जिन प्रदेशों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गया है वहां उसे अल्पसंख्यक के अधिकार प्राप्त नहीं है। यह कैसी विडंबना पूर्ण स्थिति है कि किसी भी तथाकथित अल्पसंख्यक संप्रदाय को किसी भी राज्य में उसकी जनसंख्या के आधार पर अल्पसंख्यक होने का अधिकार प्राप्त हो जाता है और उसके जितने भी लाभ लिए जा सकते हैं उन्हें वह निसंकोच लेता है । यद्यपि हिंदू उन्हीं आधारों पर अपने आप को किसी भी राज्य में अल्पसंख्यक घोषित नहीं करा सकता। उसे वहां भी दोहरे मानदंडों का शिकार होना पड़ता है। इस सच्चाई की जानकारी देश के सभी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को है पर वह अपने वोटों की राजनीति में इतने व्यस्त हैं कि हिंदू की इस समस्या की ओर ध्यान देने या उस पर सोचने का समय उनके पास नहीं है। हमारे देश के बारे में यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि जब चीजें सड़ जाती हैं तब उनकी ओर ध्यान दिया जाता है। उससे पहले व्यवस्था को सुंदर और उत्कृष्ट बनाए रखने की दिशा में सोचना यहां पर उचित नहीं माना जाता। ऐसे में व्यवस्था में बैठे लोगों को व्यवस्था में आए दोषों, दुर्गुणों, अवरोधों और बाधाओं पर समय रहते सोचना चाहिए और राष्ट्रहित में समयोचित सुधार करना चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

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