सोनिया को पीएम बनने से रोकने की कहानी, लालकृष्ण आडवाणी की जुबानी

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प्रेम शंकर मिश्र

राजनीति में अपने विरोधियों को ‘चरखा दांव’ से चित्त करने वाले समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के सियासी कौशल के बहुत से किस्से हैं। इसमें एक अहम वाकया यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री न बनने देने का भी है। इस घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सोनिया गांधी को समर्थन देने पर ‘ना’ कहने से पहले मुलायम ने अपने प्रखर विरोधी लालकृष्ण आडवाणी से ‘हां’ करवाई थी। आडवाणी ने बाद में खुद ही इसका खुलासा किया।

बात 1999 की है। अटल सरकार ने 13 महीने ही पूरे किए थे कि 14 अप्रैल को एआईएडीएमके ने अपना समर्थन वापस ले लिया। राष्ट्रपति केआर नारायण ने अटल को 3 दिन में बहुमत साबित करने को कहा। एक वोट से अटल सरकार गिर गई। सोनिया गांधी ने दावा किया कि उनको 272 सांसदों का समर्थन हासिल है और यूपीए सरकार बनाएगी। इसी बीच एनडीए के संयोजक जॉर्ज फर्नांडीस ने आडवाणी को फोन कर कहा कि आप से एक खास व्यक्ति मिलना चाहता है। उसके मिलने से तय हो जाएगा कि सोनिया सरकार नहीं बना पाएंगी। लेकिन, यह मुलाकात मेरे या आपके नहीं बल्कि जया जेटली के घर पर होगी।

आडवाणी उस खास शख्स से मिलने अपना सुरक्षा दस्ता छोड़कर जया जेटली की गाड़ी में बैठ उनके घर गए, जिससे किसी को पता न चले। आडवाणी पहुंचे तो देखा वहां समाजवादी पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव बैठे हैं। मुलायम ने आडवाणी से कहा कि यह उनका वादा है कि एसपी के 20 सांसद सोनिया गांधी को पीएम बनाने का समर्थन नहीं करेंगे। मुलायम ने इसके लिए शर्त रखी। उन्होंने कहा कि वह सोनिया का विरोध इसी शर्त पर करेंगे कि एनडीए फिर सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करेगी और लोकसभा भंग करने की सिफारिश करेगी। आडवाणी ने दोबारा चुनाव का वादा निभाया और मुलायम ने सोनिया के विरोध करने का।

अटल नहीं चाहते थे जल्द चुनाव
2004 के लोकसभा चुनाव में ‘इंडिया शाइनिंग’ और ‘फीलगुड’ के नारों के शोर के बीच भी बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सत्ता से बाहर हो गई थी, जबकि पार्टी के रणनीतिकार माहौल को लेकर इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही चुनाव करा दिया था। हालांकि, तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी नहीं चाहते थे कि समय से पहले चुनाव हो। दरअसल हुआ यूं कि अक्टूबर 2003 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तीनों ही राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर शानदार जीत हासिल की। इसके चलते पार्टी का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुंच गया। मीडिया के ओपिनियन पोल भी जीत की संभावनाओं का हवा देने लगे। आंध्र प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल भी 2004 में पूरा हो रहा था। वहां के सीएम व एनडीए में शामिल चंद्रबाबू नायडू भी जल्द चुनाव कराए जाने के पक्ष में थे। हालांकि, इकलौते अटल थे जो इस विचार से सहमत नहीं थे। लेकिन, पार्टी व सहयोगियों की मांग को स्वीकार करते हुए उन्होंने इसे आगे बढ़ा दिया। 6 फरवरी 2004 को ही लोकसभा सभा भंग कर दी गई। इसके चलते अक्टूबर-नवंबर 2004 में होने वाले चुनाव अप्रैल-मई में करा दिए गए। हालांकि, चुनाव के पहले ही बीजेपी के कुछ सहयोगी दलों ने कांग्रेस के पक्ष में पाला बदलकर संकेत देने शुरू कर दिए थे। यूपी जैसे राज्य में बीजेपी 80 में महज 11 सीट जीत पाई और सत्ता से बाहर हो गई। बाद में लालकृष्ण आडवाणी ने माना कि हार की एक बड़ी वजह पार्टी नेताओं का अति आत्मविश्वास था। लोकप्रियता को लेकर वे इतने आश्वस्त हो गए कि जमीनी सच पर ध्यान ही नहीं गया। प्रत्याशी चयन में गलतियां भारी पड़ीं और पार्टी के 50% मौजूदा सांसद हार गए।

अफसर से लड़ाई में बदल गया मंत्री का विभाग
यूपी में आजकल मंत्रियों की अफसरों से शिकायतों वाली चिट्ठियां वायरल हो रही हैं। हालांकि, ब्यूरोक्रेसी व सियासी चेहरों के बीच यह खींचतान यूपी में नई नहीं हैं। 1999 में तो अफसर से लड़ाई में मंत्री का विभाग तक बदल गया था। हुआ यूं कि रामप्रकाश गुप्ता सरकार में प्रेम प्रकाश सिंह पशुपालन व मत्स्य विभाग के राज्यमंत्री थे। उनके विभाग के कैबिनेट मंत्री फागू चौहान थे, जो इस समय बिहार के राज्यपाल हैं। प्रोमिला शंकर विभाग में सेक्रेटरी बनकर आईं। विभागीय मंत्री से काम-काज के बंटवारे को लेकर उनके रिश्ते सहज नहीं थे। प्रेमप्रकाश सिंह की एक टेंडर को लेकर सचिव से ठन गई। मामला यहीं नहीं रुका। आगे भी फिशरी फॉर्म के एक पट्टे को लेकर मंत्री और अफसर आमने-सामने हो गए। दरअसल हमीरपुर का यहयह फॉर्म महज 30 हजार के पट्टे पर उठा था और मंत्री इसे जारी रखना चाहते थे। लेकिन, अफसर ने इसकी फिर से बोली लगवा दी और उसके बाद इसकी नीलामी करीब 15 लाख रुपये में हुई। इसके बाद मंत्री और अफसर के बीच लड़ाई सतह पर आ गई। मंत्री ने सीएम को चिट्ठी लिखकर अफसर का ट्रांसफर करने को कहा, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। इससे नाराज प्रेम प्रकाश सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रोमिला शंकर के खिलाफ भ्रष्टाचार व मनमानी के आरोप लगाए। दबाव नहीं बना तो मंत्री ने फिर मीडिया में अफसर पर गंभीर आरोप लगाए। इसके बाद प्रोमिला शंकर ने सीएम को चिट्ठी लिखकर मंत्री के आरोपों को बेबुनियाद बताया और उनके खिलाफ मानहानि का दावा करने की अनुमति मांगी। यह चिट्ठी मीडिया में लीक हो गई। बाद में सीएम ने मीडिया से बातचीत में कह दिया कि प्रोमिला शंकर एक ईमानदार और कर्मठ अधिकारी हैं। बाद में मंत्री का विभाग बदलकर उनको सहकारिता का राज्यमंत्री बना दिया गया।

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