‘क्रोनोलॉज़ी’ (कालानुक्रम) और भारतीय इतिहास की परम्परागत समयरेखा

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लेखक :- गुंजन अग्रवाल

यूनानी-शब्द ‘chrónos’ (समय) और ‘logia’ से मिलकर लैटिन का ‘chronologia’ बना है। इसी ‘chronologia’ से अंग्रेज़ी का ‘chronology’ (‘क्रोनोलॉज़ी’) शब्द बना है, इसका अर्थ संक्षेप में, प्रारम्भ से अन्त तक घटनाओं का अनुक्रम है। विस्तार से कहें, तो ‘क्रोनोलॉज़ी’ (कालानुक्रम-विज्ञान) का मतलब किसी व्यक्ति, संस्था या राष्ट्र के जीवन की प्रमुख तिथियों और घटनाओं को कालक्रमागत तरीक़े से सारिणीबद्ध करना, सूचीबद्ध करना, जिससे इतिहास का अध्ययन सरलता से किया जा सके। विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं के बीच क्या तारतम्य है, यह जानने में ‘क्रोनोलॉज़ी बहुत मदद करता है। आजकल विभिन्न प्रकार की घटनाओं, खेलों, दुर्घटनाओं, वैज्ञानिक उपलब्धियों, महत्त्वपूर्ण लोगों, सिनेमा, संस्थाओं, राष्ट्रों, आदि के इतिहास को सिलसिलेवार तालिका में लगाया जा रहा है। इससे इतिहास को समझने में बड़ी मदद मिलती है। क्रोनोलॉज़ी-निर्माण की बहुत-सी पद्धति, वंशावली-लेखन की ही तरह, प्रचलित है। इसमें मुख्यतः ईसवी सन् और ईसापूर्व का आधार लिया जाता है।

पश्चिमी देशों में विश्व इतिहास के कालानुक्रम पर कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। सर्वप्रथम चर्च ऑफ़ आयरलैण्ड के 11वें आर्कबिशप (1625-1656) James Ussher (1581-1656) ने बायबल के ओल्ड टेस्टामेंट का विश्लेषण करने के पश्चात् ‘Annales Veteris Testamenti, a prima mundi origine dedvcti’ नामक ग्रंथ लिखकर विश्व इतिहास का पहली बार तिथ्यांकन किया और 4004 ई.पू. में सृष्टि-रचना वाला मत प्रतिपादित किया। सन् 1650 में लन्दन से प्रकाशित ‘The whole works of the most Rev. James Ussher… with a life of the author’ नामक ग्रंथावली के खण्ड 8 में यह पुस्तक लैटिन-भाषा में प्रकाशित है। इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘Annals of the Old Testament, deduced from the first origins of the world’ के नाम से हुआ।

यह कालानुक्रम साधारणतः ‘उशर-लाइटफुट क्रोनोलॉजी’ के नाम से प्रचलित है; क्योंकि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के उपकुलपति Dr. John Lightfoot (1602-1675) जो अपने समय के प्रसिद्ध हिब्रू विद्वान् थे, ने ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ के विशेषाध्ययन के पश्चात् जेम्स उशर से भी पूर्व सन् 1644 में ‘The Harmony of the Four Evangelists, among themselves, and with the Old Testament’ नामक पुस्तक प्रकाशित लिखी, जिसके अनुसार ‘पृथिवी का जन्म निस्सन्देह 1 मार्च अथवा 12 सितम्बर, 3929 ई.पू. को हुआ था।’ यह पुस्तक ‘The Whole Works of the Rev. John Lightfoot, D.D.’, Vol. V के अंतर्गत भी प्रकाशित है।

इन दो पुस्तकों ने यूरोप में तहलका मचा दिया और यूरोपीय विद्वानों के मन-मस्तिष्क को इस क़दर झकझोर डाला कि आनेवाली तीन शताब्दियों तक इतिहास में शोध के सभी द्वार बन्द हो गए। यूरोपीय विद्वानों ने इस तिथि को ‘बाबा वाक्य प्रमाण’ माना और दुनिया के सभी देशों के इतिहास को खींच-खांचकर इस तिथि के अन्दर ठूँस डाला। यहाँ तक कि सुविख्यात भारतविद् Sir William Jones (1746-1794) ने भी अपनी पुस्तक ‘The Complete Works of Sir William Jones’, Vol. IV, p.47 (edited by Lord Teinmouth, Printed for John Stockdale, Piccadelly and John Walker, Paternoster Row, 1807 edition) में आदम का समय 4004 ई.पू. माना है। इसी क्रोनोलॉजी में श्रीराम का समय 2029 ई.पू. और बुद्ध का समय 1027 ई.पू. माना गया है।

सन् 1859 में मॉन्ट्रियाल से प्रकाशित एक स्कूली पुस्तक ‘Outlines of Chronology’ में 4000 ई.पू. में आदम और ईव को स्वर्गस्थ बताया गया है। George P. Puntam की पुस्तक ‘Cyclopedia of Chronology or the World Progress, A Dictionary of Dates’ 1860 में न्यूयॉर्क से प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में भी विश्व का निर्माण प्राचीन हिब्रू-मान्यताओं से 4004 ई.पू. माना गया है। Alexander J. MacKay की पुस्तक ‘Facts and Dates; or, The Leading Events in Sacred and Profane History, and the Principal Facts in the various Physical Sciences’, 1879 में लन्दन से प्रकाशित हुई, जिसमें विश्व का निर्माण 5478 ई.पू. में माना गया है। उसी के आगे जेम्स उशर का 4004 ई.पू. वाला मत भी दिया गया है। अगले वर्ष (1880) पोर्टलैण्ड से Dr. George Bayne की पुस्तक ‘The A.B.C. of Chronology: Psychological, Mathematical and Philosophical’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में 7056 ई.पू. में सृष्टि का आरम्भ और 6984 ई.पू. आदम की तिथि मानी गई है। 1883 में Henry Clinton Brown ने न्यूयॉर्क से प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘Handbook of Dates’ में 4004 ई.पू. में सृष्टि-रचना माना है। इस पुस्तक में 327 ई.पू. से पहले भारत का नाम भी नहीं आया है। 1892 में Lousi Heilprin ने न्यूयॉर्क से प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘Chronological Table of Universal History’ में 4400 ई.पू. में मिस्र में प्रथम राजवंश की स्थापना से इतिहास का प्रारम्भ माना है। इस पुस्तक में भी 326 ई.पू. से पहले भारत का नाम नहीं आया है। 1895 में Rev. H.T. Besse ने न्यूयॉर्क से प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘Chronological Index’ में 5553 ई.पू. में सृष्टि-रचना माना है।

वर्ष 2003 से ही भारतीय इतिहास का कालानुक्रम— यह मेरे अध्ययन के सर्वाधिक प्रिय विषयों में से एक रहा है। वर्ष 2006 में मेरी पहली पुस्तक ‘हिंदू इतिहास की स्मरणीय तिथियाँ’ पटना से प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक फिलाडेल्फिया के Francis Shallus (1797-1821) की 1817 में प्रकाशित पुस्तक ‘Chronological Tables for Every day in the Year’ पर आधारित थी। इसमें हिंदू इतिहास में घटित महत्त्वपूर्ण घटनाओं को 1 जनवरी से 31 दिसम्बर तक तक चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र कृष्ण अमावस्या में बाँटा गया है। इस तरह इसमें लगभग अढाई हज़ार तिथियों का संग्रह है। इस पुस्तक के परिशिष्ट में मैंने भारतीय इतिहास की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश डाला था।

भारतीय इतिहास का कालानुक्रम विभिन्न दृष्टिकोणों से अनेक ग्रन्थों में प्राप्त होता है। अनेक लेखकों (इतिहासकारों) ने इस विषय पर विभिन्न विचारधारा से प्रेरित होकर, भारतीय कालानुक्रम को व्यवस्थित करने का प्रयास किया है। आधुनिक युग में बहुत-सी वेबसाइटों में भी क्रोनोलॉज़िकल टेबल्स और राजवंशों की सूची प्राप्त होती है। मैंने इनका पता लगाने के लिए शताधिक पुस्तकों और सहस्राधिक वेबसाइटों में गोता लगाया और बहुत-सी तालिकाएँ इकट्ठी कीं। परन्तु प्रत्येक जगह लेखकों ने पौराणिक कालगणना को अतिशयोक्तिपूर्ण बतलाकर काल का अत्यधिक संकुचन किया है और दिव्य वर्ष को ही मानव-वर्ष बतलाकर गणनाएँ की हैं।

Frederick Eden Pargiter (1852-1927) ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथों— ‘The Purana text of the dynasties of the Kali age’ (Oxford University Press, London, 1913) तथा ‘Ancient Indian Historical Tradition’ (OUP, London 1922) में पौराणिक साहित्य में प्राप्त राजवंश एवं पीढ़ियों के आधार पर महाभारत-युद्ध की तिथि 950 ई.पू. निर्धारित की है। इन दो पुस्तकों ने भारत के भावी इतिहासकारों को पौराणिक कालगणना के संकुचन के लिए प्रेरित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। सन् 1927 में डॉ. सीतानाथ प्रधान ने ‘Chronology of Ancient India’ नामक ग्रन्थ लिखा, जिसे कलकत्ता विश्वविद्यालय ने प्रकाशित किया। इसमें ऋग्वेदकालीन राजा दिवोदास के समय से चन्द्रगुप्त मौर्य तक का इतिहास दिया गया है, बीच-बीच में आवश्यकतानुसार युग के राजनीतिक इतिहास की झाँकियाँ भी हैं। इस ग्रन्थ में दिवोदास का समय 1514 ई.पू. माना गया है। सन् 1941 में महामहोपाध्याय डॉ. पाण्डुरंग वामन काणे (1880-1972) ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘History of Dharmashstra : Ancient and Mediaeval Religions and Civil Law in India’ (5 Vols., 1930-1962) के द्वितीय खण्ड (1941) में ऋग्वेदादि वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण-ग्रन्थों एवं उपनिषदों का रचनाकाल 4000-1000 ई.पू. निर्धारित किया है। 1964 में महामहोपाध्याय सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव ने ‘भारतवर्षीय प्राचीन चरित्र कोश’ नामक विश्वकोशात्मक ग्रन्थ लिखकर पार्जीटर, जयचन्द्र विद्यालंकर (1898-19..) तथा काणे के कार्यों का समर्थन किया है। सन् 1966 में श्री सुमन शर्मा ने ‘प्राचीन भारतीय आर्य राजवंश’ नामक ग्रन्थ लिखकर पौराणिक राजवंशावलियों को तिथिक्रम में व्यवस्थित करने का गम्भीर प्रयास किया है। किन्तु इसमें भी पौराणिक कालगणना की उपेक्षा हुई है और मनमाना तिथि-निर्धारण किया गया है। इसमें स्वायम्भुव मनु का काल 4022 ई.पू. और महाभारत-युद्ध की काल 1050 ई.पू. माना गया है। डॉ. Vedveer Arya ने ‘The Chronology of Ancient India’ (हैदराबाद, 2015) में 8000 से 7000 ई.पू. के मध्य ऋग्वेद तथा यजुर्वेद की रचना तथा सूर्यवंशीय शासक महाराज इक्ष्वाकु का राज्यारोहण 6776 ई.पू. बताया है।

इस तरह हम देखते हैं कि कालानुक्रम पर आधारित अधिकांश पुस्तकों में दिव्य वर्ष को ही मानव-वर्ष बतलाकर समस्त गणनाएँ की हुई हैं। परन्तु मैंने पौराणिक कालगणनानुसार भारतीय कालानुक्रम तैयार करने का निश्चय कर रखा था। इस विषय पर मैंने व्यापक छानबीन की। सैकड़ों पुस्तकों को उलटा-पलटा, किन्तु सिवाय एक पुस्तक के, किसी ने मुझे रास्ता नहीं दिखाया। अधिकांश पुस्तकों ने मुझे भ्रमित करने का प्रयास किया। जिन पुस्तकों में पौराणिक 43,20,000 वर्षवाली चतुर्युगी को सत्य मानकर गणना की गई थी, उनमें भी बृहद्रथ-राजवंश से पूर्व का इतिहास नहीं दिया गया था और महाभारत-युद्ध की ध्रुव-तिथि 3139-38 ई.पू. निश्चित की गई थी। उदाहरण के लिए सर्वश्री एम. कृष्णमाचार्य (1884-19..), पं. कोटावेंकटचलम् (1885-1959), पुरुषोत्तम नागेश ओक (1917-2007), श्रीराम साठे, डॉ. देवसहाय त्रिवेद (प्राङ्मौर्य बिहार, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना), आदि की पुस्तकों में। फिर भी मुझे उन पुस्तकों से कुछ सहायता अवश्य मिली। भारतीय कालानुक्रम विषयक अन्वेषकों में विजयवाड़ा, आंध्रप्रदेश के प्रसिद्ध इतिहासकार पं. कोटा वेंकटचलम् का नाम अग्रगण्य है। पं. कोटा वेंकटचलम् ने कालानुक्रम-विषयक अनेक पुस्तकें लिखकर भारतीय इतिहास में आच्छादित भ्रान्तियों का निराकरण किया है।

जिस पुस्तक ने मेरा मार्गदर्शन किया और जिसे मैं कह सकता हूँ कि जो अत्यन्त गहन अध्ययन और विशुद्ध भारतीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर लिखी गई है और जिसे मैं ‘मास्टरपीस’ की श्रेणी में मानता हूँ, वह महान् पुस्तक है धर्म-चक्रवर्ती स्वामी प्रकाशानन्द सरस्वती (1929-..) की पुस्तक ‘The True History and the Religion of India : A Concise Encyclopedia of Authentic Hinduism’. यह पुस्तक 1999 में इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ़ डिवाइन लाइफ द्वारा प्रकाशित हुई थी। हिंदू-धर्म और भारत के इतिहास पर आधारित, 800 पृष्ठों की इस पुस्तक को 2001 में मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स ने पुनर्प्रकाशित किया, बाद में इस पुस्तक को कई अन्य प्रकाशकों ने भी प्रकाशित किया है।

इंटरनेट पर इस पुस्तक के कुछ पृष्ठ पढ़कर मेरे मन पर आच्छादित समस्त जाले हट गए और ज्ञान के एक नये आलोक की अनुभूति हुई। यद्यपि स्वामी प्रकाशानन्द सरस्वती ने अपनी पुस्तक में भारतीय इतिहास का जो कालानुक्रम प्रस्तुत किया था, उसमें उन्होंने कुछ गणनात्मक भूलें की थीं, तथापि उससे मुझे कालानुक्रम तैयार करने का जो आधार प्राप्त हुआ, उसे मैं कभी विस्मृत नहीं कर सकता। इसी पुस्तक में सर्वप्रथम मुझे जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित द्वारका शारदा मठ एवं कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्यों की सूची प्राप्त हुई। अन्त में मैंने स्वयं क्रोनोलॉज़ी बनाने का निर्णय लिया।

वर्ष 2009 में मेरी पुस्तक ‘भगवान् बुद्ध और उनकी इतिहाससम्मत तिथि’, विभा प्रकाशन, इलाहाबाद से प्रकाशित हुई थी, जिसमें मैंने अनेक साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक साक्ष्यों से भगवान् बुद्ध का समय 1887-1807 ई.पू. निश्चित किया था। इस पुस्तक के परिशिष्ट में मैंने पौराणिक कालगणनानुसार भारतीय इतिहास की प्रमुख घटनाओं की समयावली प्रस्तुत की थी। बाद में इसे विस्तार देते हुए मैंने एक विस्तृत शोध-पत्र लिखा, जिसका एक बड़ा अंश ‘भारतीय इतिहास का परम्परागत कालक्रम’ शीर्षक से अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना की अर्धवार्षिक शोध-पत्रिका ‘इतिहास दर्पण’ के अंक 16-2, विजयदशमी, 2011 ई. में ‘प्रकाशित हुआ था।

भारतीय इतिहास के स्पष्ट संकेत पुराणों में प्राप्त होते हैं। पुराणों का अनुशीलन करने पर तिथियों के कई सूत्र निकल आते हैं। उन्हें आपस में पिरोना और टूटी कड़ियों को जोड़ना विद्वानों का काम है। मैंने अपने लेख में एक प्रयासभर किया है।

इस सन्दर्भ में प्रख्यात लेखक, इतिहासकार और दार्शनिक आचार्य उदयवीर शास्त्री (1894-1991) ने ठीक ही लिखा है— ‘यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्राच्यविद्याविषयक भारतीय साहित्य एवं विज्ञान की जो व्याख्या 18वीं-19वीं शती में अर्धभारतीय और यूरोपीय भाषा के माध्यम से की गई— जो उनके अनेक लेखों में निर्दिष्ट है— अधिकतर वे लेख भारतीय एवं विदेशी विद्वानों द्वारा प्रामाणिक माने जाते रहे हैं। किन्तु इस समस्त समय में एक ऐसी विचारधारा बराबर बनी रही है, जिसने इन प्राच्यविद्या के व्याख्याभूत लेखों को पूर्णरूप से स्वीकार नहीं किया। इस विचारधारा के समर्थकों का यह विश्वास रहा है, जो पर्याप्त सीमा तक सही है कि इन शताब्दियों में भारतीय साहित्य के अनुवादक, व्याख्याकार एवं विवेचक प्रायः पाश्चात्य विद्वान् थे। इन्हें उन भारतीय पण्डितों के चरणों में बैठकर भारतीय भाषाएँ सीखनी पड़ीं, जो उनके अधीनस्थ होने के कारण सच्चे अध्यापक की स्थिति में न थे। सीखनेवाले भी अपनी मानसिक तथा राजनीतिक स्थिति के कारण सीखनेवाले की उचित मर्यादा में न थे। यदि उनके उद्देश्य को सच्चा मान लिया जाए, जैसा कि उनमें से अनेक का था भी— तो वे भारतीय साहित्य को अपने ही मानसिक ढाँचे में समझ सकते थे— यह एक सन्देहरहित नैसर्गिक सच्चाई है। वे शासक-समाज के अंग थे, अथवा उनके मित्र थे। उनकी बातें सुनी जाती थीं और प्रामाणिक मानी जाती थीं, चाहे वे कैसी भी रही हों। इन सब प्रतिकूल परिस्थितियों के वातावरण में एवं विश्वविद्यालय-स्तर पर मान्यता प्राप्त करने के लिए उत्सुक भारतीय विद्वानों ने यह अधिक उपयुक्त समझा कि ‘अधिकारी पुरुष’ जो कहें, उसे किसी ‘ननु नच’ के नतमस्तक हो स्वीकार कर लेना चाहिये, तथा साहित्य के मूलभूत अर्थ एवं विवरण देने का ख़तरा नहीं उठाना चाहिये। परन्तु अब वह वातावरण विलीन हो चुका है। उस लक़ीर का फ़कीर बने रहना अब अज्ञानान्धकार को फैलाने में सहयोग देना है। यह उपयुक्त अवसर है, उस साहित्य की परीक्षा व समीक्षा किसी भी पक्षपात से ऊपर उठकर उदारतापूर्वक की जानी चाहिये।” (वेदांतदर्शन का इतिहास, पृ. 94-95)।
✍🏻गुंजन अग्रवाल

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