अंग्रेजी : राष्ट्रीय शर्म का मामला

भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मुझे पता नहीं कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को इस बात का कुछ पता है या नहीं? यदि उन्हें पता होता तो मुझे पूरा विश्वास है कि वे राजभाषा विभाग को वह जवाब नहीं देने देते, जो उसने देश के सर्वोच्च न्यायालय को दिया है। राजभाषा विभाग ने शिवसागर तिवारी नामक वकील की एक याचिका का जवाब देते हुए सर्वोच्च न्यायालय से कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय का कामकाज हिंदी में नहीं किया जा सकता, क्योंकि ‘किसी पर भी कोई भाषा थोपी नहीं जानी चाहिए।’ तिवारी की मांग थी कि संविधान में संशोधन किया जाए ताकि सर्वोच्च न्यायालय और 24 उच्च न्यायालयों की आधिकारिक भाषा हिंदी हो जाए। संविधान की धारा 348 के अनुसार अंग्रेजी ही इन अदालतों की भाषा रहेगी।

अंग्रेजी की यह गुलामी पिछले 67 साल से ज्यों की त्यों चली आ रही है। यह राष्ट्रीय शर्म का मामला है। लेकिन हमारा कानून हमारा बनाया हुआ नहीं था। अंग्रेज का था। इसलिए उसको आनन−फानन हिंदी में नहीं किया जा सकता था लेकिन 67 साल तक देश की निकम्मी सरकारें क्या करती रहीं? जो सरकारें अपने कानून ही संसद में बैठकर अंग्रेजी में बनाती रहीं, उनकी हिम्मत कैसे पड़ती कि वे अदालतों से अंग्रेजी को हटातीं? अब जब अंग्रेजी को हटाने की मांग की गई तो राजभाषा विभाग कहता है कि हिंदी मत थोपो! अंग्रेजी को थुपा रहने दो। तो मैं पूछता हूं कि हमने भारत को आजाद क्यों किया? इस देश पर अंग्रेज मालिकों को ही थुपा रहने देते? मोदी सरकार को चाहिए कि वह राजभाषा विभाग के इस अधिकारी को निकाल बाहर करे। यदि वह इस मुद्दे पर चुप रहती है तो मानना पड़ेगा कि वह अपनी कब्र खुद खोदने पर उतारु है। उसका राष्ट्रवाद शुद्ध ढोंग है। यह सरकार अपने घोषणा−पत्र का उल्लंघन कर रही है। यह कांग्रेस की ही गुलाम मानसिकता से ग्रस्त है। इसका नेतृत्व भी कांग्रेस की तरह लूला−लंगड़ा है।

मोदी सरकार को चाहिए कि हमारे समस्त उच्च न्यायालयों को वह हिंदी और उनकी प्रादेशिक भाषाओं में सारे काम−काज की सुविधा दे और सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य भाषा हिंदी को बनाया जाए और यहां भी बहुत हद तक भारतीय भाषाओं को अनुमति रहे। इस परिवर्तन के लिए पांच साल की अवधि रहे। इस बीच जो भी न्यायाधीश और वकील अंग्रेजी में काम करने के लिए मजबूर हैं, उन्हें छूट दी जाए लेकिन उनके प्रामाणिक हिंदी अनुवाद उपलब्ध करवाएं जाएं। इसके बाद भारत की किसी भी अदालत में कोई अंग्रेजी का प्रयोग करे तो जैसा 300 साल पहले खुद ब्रिटेन में होता था, अदालत में अंग्रेजी बोलनेवालों पर जुर्माना होना चाहिए। धारा 348 में संशोधन का प्रस्ताव सरकार को स्वयं रखना चाहिए। देखें कौनसा दल इसका विरोध करता है?

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