नामांकन के समय इसलिए सफेद साड़ी पहनी थी द्रौपदी मुर्मू ने

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गाजियाबाद। भारत के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू इस समय सबके आकर्षण का केंद्र बन गई हैं। जिस समय उन्होंने जब अपना नामांकन प्रस्तुत किया तो उस समय उनकी सफेद साड़ी ने सबको आकर्षित किया। लोगों ने कई प्रकार के कयास लगाए, परंतु उस दिन उनके द्वारा सफेद साड़ी का पहना जाना उनके आध्यात्मिक चिंतन को प्रकट करता है।ओडिशा के संथाल आदिवासी समुदाय से आने वाली द्रौपदी मुरमू अपनी सादगी के लिए जानी जाती हैं।
राजनीति से अलग द्रौपदी मुर्मू को आदिवासियों के बीच महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए भी जाना जाता है। मुर्मू ने अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। नामांकन दाखिल करने के दौरान उनके साथ पीएम मोदी सहित पूरा एनडीए मौजूद था। इस दौरान सबकी नजरें थीं द्रौपदी मुर्मू की सादगी पर। उन्होंने एकदम सफेद साड़ी पहनी हुई थी और बहुत ही साधारण ढंग से उन्होंने अपना नामांकन दाखिल किया।
ओडिशा के मयूरगंज जिले के बैदपोसी गांव में 20 जून 1958 को जन्मी द्रौपदी मुर्मू आदिवासी जातीय समूह संथाल से संबंध रखती हैं। उनके पिता का नाम बिरांची नारायण टुडू है। उनका विवाह श्यामाचरण मुर्मू से हुआ था। द्रौपदी अपने पति और दो बेटों को खो चुकी हैं। उनकी एक बेटी है जिसका नाम इतिश्री मुर्मू है। साल 2009 उनके सबसे छोटे बेटे की मौत ने उनको अंदर तक झकझोर कर रख दिया। वो हताश हो चुकीं थीं। जीवन की कठिनाइयों ने उनसे सबकुछ छीन लिया मगर उनकी हिम्मत ही थी जो आज वो यहां तक पहुंची हैं। मुर्मू का सबसे छोटा बेटा इंजीनियरिंग की बढ़ाई कर रहा था और उसी वक्त रहस्यमय परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई।
इसके बाद द्रौपदी मुर्मू ने मयूरभंज जिले के रायरंगपुर में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में ध्यान और आध्यात्म की तरफ गईं। आश्रम के मुख्य प्रभारी बीके सुप्रिया ने फोन पर हमारे सहयोगी न्यूज पेपर टीओआई को बताया कि आश्रम में ध्यान और आध्यात्मिक उपचार से वो अपने दुःख और अवसाद से बाहर निकल पाईं। उन्होंने कहा कि तीन (दो बेटे और एक बेटी) की मां वह भावनात्मक रूप से थक गई थी। उनके पास कोई मानसिक शक्ति नहीं थी। चूंकि वह साल 2000 से ब्रह्माकुमारियों के आश्रम को जानती थीं, वह हमारे पास आईं और आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद ध्यान, आध्यात्म ने उनको बहुत शांति दी और उनका नेचर एकदम शांत हो गया।
उन्होंने आगे बताया कि जल्द ही हमने योग और ध्यान शुरू किया जिसके बाद उसके मानसिक स्वास्थ्य में कुछ सुधार हुआ। चूंकि वह भीतर से भी मजबूत थी इसलिए उनके लिए ये करना मुमकिन हो पाया। अपने आप को ठीक करने के लिए द्रोपदी मुर्मू ने कड़ी मेहनत की। वह तीन महीने तक हमारे साथ रही और एक बंधन विकसित किया। वह आश्रम से प्यार करती हैं और जब भी उन्हें समय मिलता है वह आती हैं। उन्होंने आश्रम की बहनों, भाइयों साथ एक अनोखा रिश्ता बनाया।
सुप्रिया ने कहा कि अपने बड़े बेटे की मौत के एक साल से थोड़ा अधिक समय बाद ही उनके छोटे बेटे की एक दुर्घटना में मौत हो गई। उनके लिए ये बहुत बड़ा आघात था। अभी तक वो अपने पहले बेटे की मौत के गम से उबरी भी नहीं थीं कि भगवान ने उनसे दूसरा बेटा भी छीन लिया था। एक साल बाद, उनके पति की भी हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई। अब उनकी बेटी और दो पोतियां हैं, जिनसे वो बहुत प्यार करती हैं।
उनका बचपन बेहद अभावों और गरीबी में बीता था। लेकिन अपनी स्थिति को उन्होंने अपनी मेहनत के आड़े नहीं आने दिया और भुवनेश्वर के रमादेवी विमेंस कॉलेज से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी की। द्रौपदी मुर्मू ने अपनी बेटी के लिए एक शिक्षक के रूप में कार्य शुरू किया था। राजनीति में आने से पहले मुर्मू ने एक शिक्षक के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। उन्होंने 1979 से 1983 तक सिंचाई और बिजली विभाग में जूनियर असिस्‍टेंट के रूप में भी कार्य किया था। इसके बाद 1994 से 1997 तक उन्होंने ऑनरेरी असिस्‍टेंट टीचर के रूप में भी कार्य किया था।
द्रौपदी बीजेडी और बीजेपी की गठबंधन के सरकार में भी मंत्री रह चुकी हैं और 2002 से 2004 तक उन्होंने राज्य में कई पद संभाले। द्रौपदी झारखंड की ऐसी पहली राज्यपाल थीं जिन्होंने 2000 में झारखंड के गठन के बाद 5 वर्षों का कार्यकाल पूरा किया। इसके साथ ही उन्होंने 2015 से 2021 तक राज्य के गवर्नर के रूप में भी अपनी सेवाएं दी।यदि वह इस बार राष्ट्रपति का चुनाव जीत जाती हैं तो वह देश की पहली ट्राइबल राष्ट्रपति और साथ ही देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति बनने का खिताब अपने नाम करेंगी। उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत तब हुई जब वह 2000 और 2004 में वह बीजेपी के टिकट पर रायरंगपुर सीट से विधायक चुनी गई थीं। इसके साथ ही द्रौपदी ओडिशा से देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वाली पहली शख्सियत भी होंगी।

    

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