कौशल विकास कार्यक्रम की असली परीक्षा तो होगी कृषि क्षेत्र में

अशोक प्रवृद्धim4change_40im4change_53Food_Security_Image

भारतीय मौसम परम्परानुसार वसन्त के आनन्द, उल्लास और ग्रीष्म की मस्ती भरी धूप के पश्चात जून के अन्तिम सप्ताह अथवा जुलाई के प्रथम सप्ताह तक भारतवर्ष के कृषि प्रधान क्षेत्र में हाल के वर्षों तक वर्षा होने लगती थी और खरीफ की बुआई प्रारम्भ हो जाती थी। इसके बाद नवम्बर एवं दिसम्बर की बारिश से रबी की फसल का कार्यारम्भ हो जाता था । परन्तु अब वसन्त ऋतु में ही ज्येष्ठ मास के समान गर्मी की तपिश तन और मन दोनों को ही अकुलाने लगी है और बैशाख व ज्येष्ठ मास में पडऩे वाली गर्मी की तकलीफदेह बेचैनी की क्या स्थिति होती है यह सब जानते ही हैं? प्रकृति की परिवर्तित होती स्वरुप में भारतवर्ष सहित सम्पूर्ण एशियाई देशों और संसार के कई अन्य क्षेत्रों की यही स्थिति बनती जा रही है । भारतीय समाजशास्त्र के अनुसार वसन्त ऋतु पश्चात काल में मौसम व पर्यावरण की स्थिति न तो अधिक ठण्डा और न ही अधिक गर्म वाली अर्थात सामान्य स्थिति में होना चाहिए, जिससे तन व मन दोनों को आनन्द, उल्लास और प्रसन्नता से प्रफ्फुल्लित होना चाहिए। परन्तु विगत कुछ वर्षों से जल, जंगल, जमीन, जान, जीव-जन्तु अर्थात समस्त पर्यावरण से मानव की अत्यधिक छेड़-छाड़, अन्धाधुन्ध दोहन और प्रकृति विरोधी कृत्य किए जाने से भारतवर्ष सहित सम्पूर्ण विश्व का पर्यावरण गड़बड़ाने लगा है और गर्मी जल्दी आने, गर्मी में अत्यधिक तपिश व चिपचिपाहट का अनुभव, बेमौसम व असमय वारिश और मनुष्येतर जीव-जन्तुओं यथा, कुते, मैना आदि पशु-पक्षियों में भी असमय प्राकृतिक क्रियाएँ जैसे रतिक्रिया, प्रजनन आदि देखने को मिल रहे हैं। अगर पर्यावरण से साहचर्य व सामंजस्य न बनाकर प्रकृति विरोधी कृत्यों को मानव द्वारा निष्पादित किए जाने की यही गति अनवरत जारी रहती है तो निकट भविष्य में हमारे पर्यावरण की क्या दुर्गति हमें दृष्टिगोचर होगी इसकी सहज कल्पना नहीं की जा सकती है उल्लेखनीय है कि वर्तमान वर्ष में वसन्त ऋतु के आगमन के समय से ही रह-रहकर वर्षा होती रही है इसके बाद भी मौसम की यह चिपचिपाती गर्मी लोगों को परेशान कर रही है ।

भारतीय परम्परा के अनुसार हमारे देश में जून-जुलाई में वर्षागमन होने की परम्परा रही है, परन्तु प्रकृति की लीला तो देखिये गत वर्ष का जुलाई-अगस्त महीना सूखा निकला और इस वर्ष के मार्च-अप्रैल महीने में खूब पानी बरसा और फिर अप्रैल के अन्तिम सप्ताह में भारतवर्ष और समीपस्थ देशों में धरती के हिलने से भूमि में हुई कम्पण में हम मानवों द्वारा निर्मित रहवास के टिक नहीं पाने के कारण जान-माल की अपार क्षति हुई। इसे सिर्फ दैवी प्रकोप मानकर हँसी में टालना ठीक नहीं हो सकता। यह संकेत है उस मौसम चक्र में बदलाव का जिसके बूते सम्पूर्ण  भारतवर्ष अपना कृषि उद्योग चलाता रहा है और सुख-चैन से निवास करता रहा है। भारतवर्ष के अधिकांश क्षेत्रों में मार्च-अप्रैल के महीने में भ्रमण के समय मार्ग में गेहूँ की पकी फसल और अन्य फसलों को देखकर ऐसा लगा करता था मानो जमीन पर सडक़ के समानान्तर दो फीट की ऊंचाई पर सुनहले रंग की एक और सडक़ प्रकृति ने बिछा अर्थात बना दी हो । पूरे यौवन के साथ लहलहाती हुई गेहूँ की ये बालियाँ किसान की समृद्घि और उसके विस्तार का प्रतीक हुआ करती थीं। हरियाणा, पंजाब व पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड सहित भारतवर्ष के अधिकांश भागों में ऐसा ही नजारा अभी पिछले वर्ष तक दिखा करता था। परन्तु इस वर्ष  सब कुछ चौपट हो गया। गेहूँ की वे बालियाँ मुरझा गई हैं, खड़ी हैं तो उनमे दाने नहीं हैं और किसान के माथे पर चिन्ता की लकीरें लम्बी और लम्बी होती जा रही हैं । कुछ कृषकों को तो बरबादी का यह दृश्य अर्थात मंजर देखते ही दिल का दौरा पड़ गया। कुछ ने इस चिन्ता से बचने के लिए आत्महत्या कर ली। उनकी हिम्मत नहीं हुई कि कैसे वे अपनी इस बरबादी के मंजर को देखें? किसान करे भी तो आखिर क्या करे? उसके पास न तो खरीफ का पैसा आया न रबी से ही कुछ उम्मीद बची। फसल क्षति के अनुपात में मुआवजा अत्यन्त अल्प मिलने की सम्भावना के मध्य कर्ज और भविष्य के खर्चे से भयभीत किसान के पास अपने बचाव का कोई साधन नहीं है। आखिर उसका इस साल का पूरा का पूरा चक्र ही गड़बड़ा जो गया।

विगत वर्षों की मौसम का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि भारतीय मौसम परम्परा का यह चक्र अब बदलने लगा है ।ऐसी परिस्थिति में कृषि वैज्ञानिकों और मौसम के जानकारों को इस विषय पर विचार करना चाहिए कि मौसम के परिवर्तित होते स्वरुप के साथ फसलों की बुआई और कटाई का चक्र भी बदला जाए।परन्तु खेद की बात है कि हमारे देश में कृषि फसलोपजों के वृद्धि किये जाने के सम्बन्ध में चर्चा और विचार तो होता है लेकिन इस पर कभी विचार नहीं किया जाता कि कैसे परम्परागत खेती की बजाय ऐसी फसलों को विकसित किया जाए जिससे प्राकृतिक आपदा से फसलों को बचाया जा सके और वांछित फसलोपज भी पाई जा सके । हमारे देश की सरकार और शहरी मध्यवर्ग कृषि को लेकर कभी गम्भीर नहीं हुआ और वह यह मान और सोच कर चलता है कि कृषि पिछड़े हुए समाज की द्योतक है। उनकी इसी सोच का परिणाम है कि कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि वैज्ञानिकों ने आज तक कभी मौसम की मार से फसलों को बचाने का कोई उपाय तक खोजने की आवश्यकता महसूस नहीं की । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रस्तावित कौशल विकास कार्यक्रम को सिर्फ उद्योग तक सीमित कर रख दिया गया है और कभी यह नहीं सोचा गया (जाता) कि ग्रामीण भारतवर्ष के विकास के बिना भारतवर्ष का सर्वांगीण विकास सम्भव नहीं और देश में कौशल विकास की असली परीक्षा तो कृषि क्षेत्र में, ग्रामीण क्षेत्र में ऐसे समग्र विकास से ही होगी। कृषि क्षेत्र व ग्रामीण क्षेत्रों के परम्परागत उद्योगों में भी कौशल विकास विकसित करने के लिए सरकार को विचार करना चाहिए कि इस क्षेत्र में ऐसा कौशल विकसित किया जाए जिससे कि अगर कृषि उद्योग में कौशल विकास की कुशलता को बढ़ावा दिया अर्थात तरजीह दिया जाये तो निश्चित रूप से एक दिन किसान इस बेमौसमी बारिश और प्राकृतिक आपदाओं की मार से बच सकेंगे ।

आखिर यह हमारे देश के लिए कितनी वीभत्स स्थिति है कि फागुन-चैत-बैशाख अर्थात मार्च-अप्रैल की इस बेमौसमी बारिश ने किस प्रकार और कैसे किसानों के चेहरे सुखा दिए हैं? मौसम विज्ञान विभाग प्रत्येक वर्ष मई में एक विज्ञप्ति जारी करता है और देशवासियों को बतलाता है कि इस वर्ष मानसून समय पर आएगा और इस सूचना से किसानों के मुरझाए चेहरे खुशी से भर जाते हैं, परन्तु जैसे-जैसे आषाढ़-सावन अर्थात जुलाई-अगस्त निकलने लगता है और मानसून जब पश्चिमी घाट की पहाडिय़ों पर या सहयाद्रि की चोटियों पर अटका होता है तो तत्काल मौसम विज्ञान विभाग कहता है कि दरअसल पश्चिम विक्षोभ के कारण वर्षा थम गई और अभी मानसून के आने में विलम्ब है । अर्थात मौसम विभाग का सम्पूर्ण कौशल एक तरह से अफवाह तक ही सीमित है। आखिर यह पश्चिमी बाधा अर्थात वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से निजात कैसे पाई जाए? इस पर कभी भी न तो केन्द्र व राज्यों में सत्तारूढ़ रही राजनीतिक दलों ने विचार-विर्मश किया और न मौसम विभाग ने और न ही कृषि वैज्ञानिकों ने भारतीय कृषि को मानसून पर निर्भर न रहने का कोई विकल्प तलाशा। आखिर ऐसी फसलें भी तो उगाई जा सकती हैं जो मानसून के ज्यादा आने अथवा कम आने पर निस्पृह, निष्प्रभावित रहें । लेकिन किसानों के हित के इस विषय पर सोचने तक के लिए किसी ने कोशिश नहीं की, क्योंकि राजनेताओं के केन्द्र में तो वैसे बड़े किसान होते हैं जो अपना पैसा कमाने के लिए कृषि को उद्योग बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं।

पर अगर कभी वे अपने केन्द्र में अपने भरण-पोषण के लिए कृषि को आजीविका बनाने वाले लघु व सीमांत कृषकों को लाकर उनके हितों की अनदेखी न करने अर्थात कृषि कार्य को अपनी आजीविका बनाने वाले किसानों की आजीविका को सुरक्षा प्रदान करने के उपायों के सम्बन्ध में शान्तचित होकर बुद्धिपूर्वक सोचें और तत्सम्बन्धी उपाय करें तो शायद कौशल विकास का ज्यादा गहन परीक्षण सम्भव है ।

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