कौटिल्य ने देश को चलाने के लिए किसी मंत्री की योग्यता की एक व्यवस्थित सूची हमें दी है। उनके अनुसार-‘‘एक मंत्री को देशवासी (विदेशी ना हो) उच्चकुलोत्पन्न (संस्कारित और उच्च शिक्षा प्राप्त) प्रभावशाली, कलानिपुण, दूरदर्शी, विवेकशील, (न्यायप्रिय दूध का दूध और पानी का पानी करने वाला-नीर-क्षीर विवेकशक्ति संपन्न) अच्छी स्मृति वाला, जागरूक, अच्छा वक्ता, 1(समाज में लोगों की सकारात्मक सोच को बढ़ाने वाला और जाति, संप्रदाय आदि के आधार पर लोगों में विभाजन न करके समरसता उत्पन्न करने के लिए बोलने वाला) निर्भीक, मेधावी, उत्साही, प्रतापी, धैर्यवान, चरित्रवान, विनयशील, राजा (प्रधानमंत्री) के प्रति अटूट श्रद्घावान, स्वस्थ, तेजस्वितापूर्ण, स्नेहवान, समभावी, होना चाहिए।’’

एक सशक्त, सुसंस्कृत, सुंस्कारित और उच्च मर्यादाओं से सज्जित व भूषित राष्ट्र का निर्माण करना किसी भी शासन पद्घति का प्रथम आदर्श होता है। भारत प्राचीन काल से ही लोकतांत्रिक विचारों का देश रहा है। इसीलिए यहां की शासन-व्यवस्था ने सदा ही उपरोक्त गुगों से भूषित राष्ट्र का निर्माण करना अपनी वरीयता माना है। यही कारण है कि इस सनातन राष्ट्र ने विश्वगुरू का गौरवपूर्ण पद प्राप्त किया और संपूर्ण भूमंडल को अपने द्वारा नियत मर्यादा पथ से बहुत देर तक लाभान्वित किया।

आज हम लोकतांत्रिक राष्ट्र होने का अभिमान करते हैं। परंतु हमारे द्वारा अपनाये गये लोकतंत्र में ऐसे कई दुर्गुण आ घुसे हैं, जिन्हें देखकर लगता नही है कि हम किसी लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में जी रहे हैं। उन दुर्गुणों पर यहां विचार करना उचित नही है। यहां विचारणीय है मोदी द्वारा अपने नये सांसदों को मर्यादा का पाठ पढ़ाने के लिए उनकी ‘क्लास’ लेने का उपक्रम करना। सचमुच यह अच्छी बात है। नये सांसदों को संसद के प्रति तथा देश के प्रति उत्तरदायी बनाना समय की आवश्यकता है। नये सांसदों को प्राचीनता और आधुनिकता के ऐसे सुंदर समायोजन में ढालना आवश्यक है कि वे एक सुंदर राष्ट्र (वसुधैव कुटुम्बकम्-सारी वसुधा ही हमारा राष्ट्र है) के निर्माण के लिए कृतसंकल्प हो उठें। राजनीति को व्यापार बनाकर राजनीति करने वालों पर अब लगाम लगानी चाहिए। बहुत से व्यापारी राजनीति में केवल इसलिए आते हैं कि इससे उनका व्यापार अच्छा चलता है, बड़े अधिकारी उनकी गाडिय़ों पर हाथ नही डालते और गाडिय़ां चाहे जो ले जाएं, या चाहे जो ले आयें, ये माननीयों की गाडिय़ों का भी विशेषाधिकार हो जाता है। इसलिए इन माननीयों को यह भी समझाना आवश्यक है कि आपके अपने तो कुछ विशेषाधिकार हो सकते हैं, परंतु अपनी गाडिय़ों के कोई विशेषाधिकार नही हो सकते।

प्राचीनकाल में (जिसे हमारे यहां ऋग्वैदिक काल की संज्ञा दी जाती है) हमारी शासन व्यवस्था में प्रमुख मंत्रालयों का विवरण इस प्रकार मिलता है। हमारा द्यौस् (सूर्य चंद्रमा आदि  चमकते पदार्थों वाला द्यौ) राष्ट्रपिता कहलाता था। वैसे भी भारत (आभा में रत) का पिता दिव्य और दैवीय ही हो सकता है, क्योंकि भारत मेधा शक्ति का उपासक देश रहा है और वह मेधाशक्ति संपन्न दिव्य गुणों से युक्त संसार की निर्मिती ही चाहता है। इसलिए हमने अपना राष्ट्रपिता द्यौस् को माना। हमारी माता यह पृथ्वी मानी गयी। पृथ्वी माता हमारी जननी माता की भांति सुबह से शाम तक हमारी कितनी ही गलतियों को सहन करती है, और हमारे द्वारा फेेलायी जाने वाली कितने ही प्रकार की गंदगी को सहज रूप में सहन करती है, इसलिए माता के समान वह हमारा ध्यान करती है। अत: वह राष्ट्र की माता है। द्यौलोक और पृथ्वी के बीच मानो हम संतानों के लिए माता-पिता साक्षात द्यौस् और पृथ्वी के रूप में हमारे साथ हैं। परंतु उनका हमारा संबंध क्षणिक है। हम क्षणिक के साथ प्रसन्न नही रह सकते। हम सनातनी हैं और हमें प्रसन्नता मिलती है-सनातन के साथ संबंध जोडऩे में। इसलिए वेद सत्य सनातन परंपराओं का पक्षधर है। इसीलिए उसने हमारा संबंध द्यौस् और पृथ्वी से जोड़ा। कृतज्ञतावश हम इनके उपासक बने। किसी ने हमें प्रकृतिपूजक कहा तो किसी ने जड़तावादी कहा, पर ये लोग वो थे जो हमारी उपासना पद्घति की वैज्ञानिकता से अपरिचित थे।

हमने अपना प्रधानमंत्री ‘विष्णु’ को माना। विष्णु का अर्थ है जो हमारा पालन-पोषण, वृद्घि और विकास करता है। बिना किसी राग-द्वेष के और बिना किसी पक्षपात के हमारा कल्याण करता है। ईश्वर की उस दिव्य शक्ति का नाम विष्णु है। ऐसी मेधाशक्ति से संपन्न व्यक्ति हमारा प्रधानमंत्री होना चाहिए। सारे निहित और दलगत स्वार्थों से सर्वथा ऊपर उठकर और सर्वसंप्रदाय समभाव को अपने जीवन का आधार बनाकर चलने वाला।

हमारा रक्षामंत्री इंद्र कहा जाता था। इंद्र का स्थान सदा आकाश में माना गया है। वास्तव में इंद्र हमारी आत्मा है। आत्मा हृदय मंदिर से मस्तिष्क तक के आकाश अर्थात खाली स्थान में ही निवास करती है। वह हमारे भीतर बैठकर हमें ईश्वर की आज्ञाओं से यथावत परिचित कराती है, इसलिए हमारी रक्षा करती है। अत: उसके जैसे दिव्य गुणों से युक्त व्यक्ति हमारा रक्षामंत्री होना चाहिए।

शिक्षा मंत्रालय एवं गृहमंत्रालय को प्राचीन काल में अग्नि कहा जाता था। अग्नि संस्कृत के अग्रणी शब्द से बना है। जिसका अभिप्राय नेता भी होता है, जो सदा आगे ही आगे चलकर हमारा मार्गदर्शन करे, दूसरे, इसका अभिप्राय प्रकाश भी होता है जो अज्ञान-अंधकार से हमारी रक्षा करे। इसलिए गृहमंत्री और शिक्षामंत्री को ऐसे ही शुद्घ-बुद्घ ज्ञान से और नेतृत्व क्षमता से सुभूषित होना चाहिए।

कृषिमंत्री को हम पर्जन्य करते थे। पर्जन्य का अभिप्राय बादल से है। बादल का कार्य लोक कल्याण होता है। वह धरती की प्यास बुझाता है और धरती को अन्नौषधि आदि उत्पन्न करने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे पर्जन्य भाव से प्रेरित व्यक्ति को ही देश का कृषिमंत्री बनाना चाहिए। पर्जन्यभाव से युक्त व्यक्ति को चौबीसों घंटे देश की कृषि की चिंता रहती है और वह लोक कल्याण से प्रेरित होकर सर्वदा धर्म संगत कार्यों में लगाए रहता है।

स्वास्थ्य मंत्रालय को हम सोम की उपाधि दिया करते थे। सोम चंद्रमा की कांति का नाम है। सोम से ही सौम्य शब्द बना है। सौम्यता भला किसे अच्छी नही लगती? सोम से ही वनस्पतियों में औषधीय गुण आते हैं और बहुत सी वनस्पतियां हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उत्तम औषधि बन जाती हंै। उन औषधियों को जानने वाला और उनकी पहचान कराकर समस्त भूमंडल से रोग व्याधियों को भगाने के लिए विशाल-विशाल यज्ञ कराने वाला व्यक्ति ही स्वास्थ्य मंत्री माना जाना चाहिए।

विधि मंत्रालय के प्रभारी को हमारे यहां वरूण कहा जाता था। ईश्वर की न्यायप्रियता सबको ज्ञात है। वह न्याय करते समय पाई-पाई का भुगतान करता है। ना तो किसी की एक पाई रखता है और ना ही किसी को एक पाई अधिक देता है। उसकी न्यायप्रियता दुष्टों को रूलाती है  और सज्जनों को आनंद देती है। ऐसी दिव्य दृष्टिरखने वाला व्यक्ति वरूण कहलाता है। वही हमारा विधि मंत्री होने का अधिकारी होता है।  देश की न्याय व्यवस्था तभी सक्रिय होती है।

इसी प्रकार हमारा ऊर्जा एवं विकास मंत्रालय सूर्य तथा सविता नाम से पुकारा जाता था। सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। सारी ऊर्जाएं उसी से पैदा होती हैं। सविता ईश्वर की प्रेरक शक्ति का नाम है। यह प्रेरक शक्ति हमारे भीतर ही ऊर्जा का अक्षय स्रोत उत्पन्न करती है। जिससे हमारा आत्मबल बढ़ता है। यह आत्मबल ही आजकल ‘ऑटोमोबाइल’ कहलाता है। हमारी स्वत: स्फूत्र्त शक्ति का, ऊर्जा का वही स्रोत है, और वही हमें भद्र का उपासक बनाती है। उसी के बल से एक व्यक्ति संपूर्ण भूमंडल का चक्रवर्ती सम्राट बनकर मोक्ष की प्राप्ति तक कर लेता है। उसके अभाव में एक व्यक्ति अपने बने बनाये साम्राज्य को गंवा बैठता है। इसलिए हमारा ऊर्जा मंत्री सूर्य और सविता शक्ति संपन्न होना चाहिए। पी.एम. श्री मोदी को अपनी पार्टी के नवनियुक्त सांसदों को पाठ पढ़ाने के साथ मंत्रियों को भी यह पढ़ाना चाहिए कि तुम कितने बड़े दायित्वों का निर्वाह कर रहे हो, और तुम्हारे भीतर अब इस समय कौन सी दिव्यशक्ति ऊर्जा का संचार कर रही है। भ्रष्टाचार, भय और भूख मुक्त भारत के निर्माण के लिए मंत्रियों को अपने दिव्य गुणों को समझना आवश्यक है। भारत की दिव्यता के लिए श्री मोदी को शीघ्रातिशीघ्र अपने मंत्रियों को उनके देवत्व का बोध कराना चाहिए।

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