जनपद गौतमबुद्ध नगर आर्य समाज ने शास्त्रार्थ का आयोजन कर इस महान परंपरा को फिर से दिया जीवनदान

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अद्भुत रहा आज का दिवस।
*आर्य समाज के 148 वे स्थापना दिवस, वैदिक हिंदू नव वर्ष विक्रमी संवत 2079 के उपलक्ष में शास्त्रार्थ का आयो जन किया गया*। शास्त्रार्थ स्थल आर्य कमल पब्लिक स्कूल हबीबपुर ईकोटेक ग्रेटर नोएडा था। शास्त्रार्थ नियम इस प्रकार बनाए गए कि केवल वेद ऋषि मुनियों के ग्रंथों को ही शब्द प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाएगा साथ ही महर्षि दयानंद के ग्रंथ वचनों को भी प्रमाण की कोटी में माना जाएगा।

शास्त्रार्थ का विषय /प्रतिज्ञा यह थी की ” वैदिक मान्यताओं के आलोक में अकाल मृत्यु होती है या नहीं । क्या ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य /जीव की आयु उसकी मृत्यु का स्थान मृत्यु का समय निश्चित कर रखा है या नहीं” जैसा कि लोक में प्रचलित मान्यता है।

शास्त्रार्थ ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना के मंत्रों के सामूहिक पाठ के पश्चात शुरू किया गया।

सबसे पहले शास्त्रार्थ के एक पक्ष वादी महेंद्र आर्य अध्यक्ष महर्षि दयानंद वेद संस्थान ने अपनी प्रतिज्ञा रखी की “जीव की मृत्यु का माध्यम स्थान निश्चित नहीं है अर्थात मनुष्य अपने कर्मों से अपनी आयु को घटा बढ़ा सकता है आरोग्यप्रद दिनचर्या के पालन उत्तम पौष्टिक खानपान व्यायाम से माता पिता की सेवा आशीर्वाद विद्वानों की सेवा से उनके निर्देशों का पालन कर हम अपनी आयु में वृद्धि कर सकते हैं साथ ही कोई भी जीव हमारी मृत्यु का अपनी कर्म की स्वतंत्रता के कारण कभी भी हमारे शरीर को नष्ट कर हमारी मृत्यु कारित कर सकता है।

प्रतिवादी जिसमें महाशय तेजपाल आर्य सिरोरा सत्य प्रकाश आर्य टीला विष्णु पंडित
गढी आचार्य दिवाकर, आचार्य महाशय कर्म सिंह,रविदत् शास्त्री भदौली ने प्रतिवाद किया प्रत्येक जीव मनुष्य की मृत्यु का स्थान स्वास और ग्रास निश्चित है। जिस व्यक्ति की मृत्यु जिस स्थान जिस समय पर लिखी है वह वही होकर रहेगी।

वादी महेंद्र आर्य ने इस प्रतिज्ञा का खंडन किया उन्होंने कहा मृत्यु का स्थान समय निश्चित नहीं है जीव अपने कर्मों से अपनी मृत्यु को घटा बढ़ा सकता है। यदि मृत्यु का स्थान कारण निश्चित हो तो किसी सड़क दुर्घटना में ट्रक ड्राइवर की असावधानी से मरने वाले किसी मोटरसाइकिल सवार की मृत्यु के लिए उस ट्रक ड्राइवर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। क्योंकि इसमें ट्रक ड्राइवर का कोई दोष नहीं था उसे भगवान ने उस समय पर मोटरसाइकिल सवार की मृत्यु करने के लिए भेजा था फिर भी ट्रक ड्राइवर को लापरवाही से गाड़ी चलाने के लिए दंडित किया जाता है तो उसे दंडित क्यों किया जाता है उसे क्यों ना पुरस्कार दिया जाए क्योंकि वह कार्य उसने ईश्वर की आज्ञा से किया वह तो ईश्वर की आज्ञा का पालन कर रहा था, यदि मृत्यु का स्थान समय माध्यम निश्चित हो ईश्वर के द्वारा । बल्कि सत्य सिद्धांत यह है ट्रक ड्राइवर ने अपनी लापरवाही से अपने कर्म की स्वतंत्रता से दूसरे जीव मनुष्य की मृत्यु की उसे लापरवाही के लिए दंड मिलना चाहिए यदि मृत्यु का स्थान समय निश्चित मान लिया जाए तो फिर तो कोई भी व्यक्ति किसी भी कर्म के लिए उत्तरदाई ना ठहरा जाए सब ईश्वर को ही दोषी बना दें कि वह कार्य उसने नहीं किया वह तो ईश्वर ने उस के माध्यम से कराया हैं ऐसा कर सारी कर्मफल न्याय दंड व्यवस्था ही चौपट हो जाएगी।

प्रतिवादी पक्ष ने वाक छल जाति निग्रहस्थान का प्रयोग करते हुए जो कि न्याय दर्शन के अनुसार शास्त्रार्थ के लिए अच्छी रीति नहीं मानी जाती योग दर्शन के सूत्र ” सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः का गलत अर्थ कर अपने पक्ष की सिद्धि के लिए प्रयोग करते हुए कहा जाति आयु भोग निश्चित है यह निश्चित है तो स्वास भी निश्चित है। प्रतिवादी महेंद्र आर्य ने इसका खंडन किया उन्होंने कहा केवल जाति अर्थात मनुष्य पशु पक्षियों की अन्य योनि यही निश्चित होती है आयु और भोग निश्चित नहीं होते कोई व्यक्ति संपन्न परिवार में पैदा होता है उसे अधिक भोग सामग्री मिलती है वह उस भोग सामग्री को परिश्रम कर और अधिक बढ़ा सकता है बुराइयों में फंसकर अनपढ़ रह कर संपत्ति को जुए शराब में गवा भी सकता है साथ ही कोई व्यक्ति अपनी आयु को भी कम या अधिक कर सकता है आयु और भोग निश्चित नहीं है। भगवान ने हम मनुष्य का शरीर इस प्रकार से बनाया है यह यदि नियम संयम से हम अपने जीवन में रहे तो 100 वर्ष तक यह शरीर चल सकता है और नियम शर्तों को तोड़ दे गलत खानपान आचार व्यवहार रखें तो हम 30, 40, 50 वर्ष की आयु में भी रोगों से ग्रस्त होकर मर सकते हैं उन्होंने कहा जो आयु निश्चित होती तो मनुष्य वेदों में 100 वर्ष जीने की परमात्मा से प्रार्थना क्यों करता? भगवान कभी भी झूठी प्रार्थना नहीं कराता यदि मृत्यु निश्चित है नियत समय पर पहले से ही निर्धारित है तो फिर 100 वर्ष की आयु के लिए प्रार्थना क्यों? मान लीजिए कोई युवक 25 वर्ष की आयु में सड़क हादसे किसी बीमारी से मर जाता है और वह अपनी मृत्यु से पूर्व ईश्वर से 100 वर्ष की आयु की प्रार्थना करता है क्या वह झूठी प्रार्थना कर रहा है क्या ऐसी झूठी प्रार्थना का फल ईश्वर देगा?निष्कर्ष यह निकलता है कोई भी रोग कोई भी अन्य व्यक्ति अपने कर्म की स्वतंत्रता से जैसा कि सड़क हादसों चोरी डकैती हत्या कांड युद्ध में घटित होता है हमारे शरीर का नाश कर सकता है प्राकृतिक आपदाओं बाढ़ भूकंप आगजनी में भी कभी भी किसी की मृत्यु हो सकती है। प्रतिवादी ने कहा कि रोग ईश्वर के द्वारा मिलते हैं वादी महेंद्र आर्य ने कहा रोग ईश्वर के द्वारा नहीं मिलते जीव अपनी अज्ञानता असावधानी से रोगी होता है यदि रोग ईश्वर के द्वारा मिलते फिर लोग रोगों की चिकित्सा क्यों कराते लोगों को ईश्वर की आज्ञा मानकर मृत्यु के प्रति आत्मसमर्पण कर देते लेकिन नहीं लोग औषध उपचार कराते हैं खुद परमात्मा ने वेदों के अनेक मंत्रों में जिनसे आयुर्वेद निकला वहां कहा है कि हे !जीव अपनी आयु को औषधि सेवन शुद्ध अन्न पान सेवन आदि से अधिक से अधिक बढ़ाओ। अपने तर्क पक्ष की सिद्धि में उन्होंने सैकड़ों से अधिक वेदों के प्रमाण दिए साथ ही ऋषि दयानंद के आयु वृद्धि विषयक वचनों का भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुतीकरण किया। आयु को निश्चित मृत्यु का स्थान समय मरने का तरीका निश्चित मानने वाले प्रति पक्षी पक्ष ने कोई भी युक्तियुक्त प्रमाण अपनी प्रतिज्ञा सिद्धांत की पुष्टि के लिए नहीं दिया प्रकरण से अलग प्रमाण प्रस्तुत किए गए जिसे निर्णायक मंडल ने अस्वीकार कर दिया निर्णायक मंडल में 8 व्यक्ति शामिल थे जिनमें आचार्य जयेन्द्र , मोहन देव स्वामी, धर्मवीर प्रधान ,रामेश्वर सरपंच ,आर डी गुप्ता, प्रधानाचार्य निरंजन आर्य, सागर आर्य,डॉक्टर वीरपाल विद्यालंकार। पक्ष प्रतिपक्ष की युक्ति तर्क प्रमाणो का अवलोकन कर निर्णायक मंडल ने 7-0 से वादी महेंद्र आर्य के मत को अधिक स्पष्ट विकसित वेद सम्मत सत्य माना अर्थात प्रथम पक्ष विजित हुआ अर्थात कोई भी मनुष्य अपने कर्मों से अपनी आयु को घटा बढ़ा सकता है कोई भी व्यक्ति कभी भी किसी की मृत्यु का कारण बन सकता है ईश्वर किसी भी व्यक्ति की मृत्यु का समय स्थान मृत्यु का तरीका निर्धारित नहीं करता यही वैदिक मान्यता है जो सत्य सनातन है बाकी सब इस विषय में कोरा अज्ञान है जो दूर होना चाहिए। आयुर्वेद में 101 प्रकार की मृत्यु मानी गई है सुश्रुतकार महर्षि सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता में 101 में से 100 प्रकार की मृत्यु को अकाल मृत्यु माना है एक प्रकार की मृत्यु ही काल मृत्यु मानी है । स्वाभाविक नेचुरल डेथ मानी है जो वृद्धावस्था में स्वाभाविक रूप से होती है। अर्थात वैदिक मान्यताओं के आलोक में अकाल मृत्यु ऋषि-मुनियों ने स्वीकार की है वेद की भी यही मान्यता है। निर्णायक मंडल ने प्रतिवादी पक्ष की भी सराहना की इसी रीति से वाद-विवाद शास्त्रार्थ के कार्यक्रम होने चाहिए। जिनसे सत्य सामने निकल कर आए वैदिक संस्कृति शास्त्रार्थ प्रधान रही है इस देश में अनेकों महान ऋषि मुनि हुए है बड़े-बड़े राजा महाराजा चक्रवर्ती सम्राट शास्त्रों का आयोजन कराते थे अनेक सभाओं में महिलाओं ने भी शास्त्रार्थ किए हैं वैदिक विदुषी गार्गी मैत्री लोपामुद्रा इसमें शामिल रही है जो ऋषि-मुनियों को भी याज्ञवल्क्य जैसे ऋषि-मुनियों को भी शास्त्रार्थ में पराजित करती थी ।

मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने शास्त्रार्थ महारथी शंकराचार्य को भी ऐसे ही एक शास्त्रार्थ में निरुत्तर कर दिया था। सभी मनुष्य सभा संगठनों को वैदिक हिंदू नव वर्ष के उपलक्ष में शास्त्रार्थ आयोजित कराने चाहिए जिससे सत्ता निकल कर आए समाज का मार्गदर्शन हो अंधविश्वास ढोंग आडंबर दूर हो। कार्यक्रम का सफल संचालन विजेंदर आर्य जी ने किया कार्यक्रम की अध्यक्षता मुकेश वकील जी ने की। इस अवसर पर सैकड़ों आर्य जन धर्म प्रेमी सज्जन शास्त्रार्थ कार्यक्रम में सहभागी साक्षी होकर लाभान्वित हुए उपस्थित रहे सभा के अंत में सभी ने सामूहिक शांति पाठ किया कार्यक्रम के आयोजक श्रीमान यज्ञ प्रेमी सज्जन कमल आर्य का सभी ने सहृदय धन्यवाद व्यक्त किया गया।

आर्य सागर खारी✍✍✍

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