‘वन्देमातरम्’ को राष्ट्रगान घोषित करो

वेदों में मातृभूमि-वंदना बड़ी प्राञ्जल भाषा में की गयी है। वास्तव में साहित्य वही होता है, जो पाठक के भीतर मचलन उत्पन्न करे। उसके भीतर अवैज्ञानिक, अतार्किक और बुद्घिहीनता की परिचायक धारणाओं, मान्यताओं और परंपराओं के लगे ढेर में आग लगा दे, उसकी होली जला दे। शिक्षा का उद्देश्य भी यही है, और गुरू (गु + रू=अंधकार मिटाने वाला) का जीवन ध्येय भी यही है कि ‘आग’ लगे और चारों ओर लगे, जिससे पुरातन का पतझड़ समाप्त हो और नूतन की कलियां अपना विस्तार करें। विज्ञान, तर्क और बुद्घि का तकाजा भी यही है किजीवन निरंतर प्रवाहमान रहे, उसमें ठहराव ना हो, भटकाव ना हो पराधीनता ना हो।
बात पराधीनता की आ गयी है, तो पराधीनता का अर्थ है कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से हम किसी भी प्रकार की विषमताओं की विसंगतियों में न फंसे हों। हमें सहज और प्राकृतिक रूप से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ हो और हम अपनी स्वार्थ-साधना के लिए अनावश्यक ही किसी के चारण न बन जायें। क्योंकि विद्या वही है जो बंधनों से अर्थात दासता से मुक्त कराये-”विद्या सा विमुक्तये।” जो विद्या बंधनों में या दासता में जकड़ती है, वह विद्या नही अविद्या होती है। इसलिए बंधन के या दासता के प्रतीक चिन्ह भी कहीं ना हों, यह किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिए आवश्यक है।
पर भारत में  ऐसे कितने ही प्रतीक चिन्ह हैं जो अभी तक हमारी दासता की ओर संकेत करते हैं। हम बंधनों में जकड़े पड़े हैं, और कह रहे हैं, कि हम स्वतंत्र हैं। हमारी  दासता का सबसे बड़ा प्रतीक है-हमारा राष्ट्रगान। अब यह बात पूर्णत: स्पष्ट हो गयी है कि हमारा राष्ट्रगान-‘जन गण मन अधिनायक…’ हमारे भीतर स्वाभिमान और राष्ट्रीय गौरव का संदेश नही भरता, अपितु हमें आज भी लगता है कि हम जॉर्ज पंचम के सामने कांग्रेसी मुद्रा में सिर झुकाये खड़े हैं, और उसका कीत्र्तगान गाकर स्वयं को दीनहीन, मतिहीन और गतिहीन सिद्घ कर रहे हैं। स्वाभिमान पर चोट पहुंचाना होता है किसी के सामने याचक बनकर दीनता के वचन बोलना-‘ऐ बाबू! जरा सुनो, एक रूपया दे दो-भूख लगी है।’ क्या पूरा राष्ट्र इस दीन वचन को बोलते-बोलते अपने ‘अधिनायक’ के सामने आज तक इसी मुद्रा में नही खड़ा है? आश्चर्य की बात है कि जिस देश के आदर्श ग्रंथ वेद का पृथ्वी सूक्त पूरा का पूरा राष्ट्रभूमि की वंदना से भरा पड़ा है, जिसके पास-‘आ ब्रह्मन ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी….(यजु. 22/22)’का वैदिक राष्ट्रगान है, और जिसकी आर्यभाषा-संस्कृत से विश्व की समस्त भाषायें निकलती हैं, जिसके वेदों में राष्ट्र का सरस चित्रण है, जिसके वीरों की भुजाओं में राष्ट्र के लिए फड़कन है और हृदयों में राष्ट्र के लिए धड़कन है, जिनके हृदय में राष्ट्र निर्माण की तड़प है और कसक है उस राष्ट्र का राष्ट्रगान एक विदेशी राजा के सम्मान में गाया गया गीत हो।
हमारा गीत वही होगा जो हमें मचलने के लिए विवश कर दे, हमारा संगीत वहन्ी होगा जो हमें नये सृजन के लिए प्रेरित करे, हमारी वंदना वही होगी जो राष्ट्रवादी वीणा के तारों में नई झंकार उत्पन्न करने की सामथ्र्य रखे, और हमारी आराधना वही होगी जो हमें श्रेष्ठता का बोध कराये। क्या यह सारी विशेषतायें हमारे वर्तमान राष्ट्रगान में हैं :-उत्तर नही। तब हम इस गीत को राष्ट्रगान के रूप में कब तक ढोएंगे? निश्चित रूप से हमें अपने राष्ट्रगान का सम्मान करना चाहिए-पर उसके भाव, उसके इतिहास और उसके निर्माण के कारणों पर तो विचार करना ही होगा।
वन्देमातरम् शब्द आते ही शरीर में रोमांच उत्पन्न होता है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय एक यही शब्द था जिसने हमारे भीतर देश के लिए मर मिटने का जज्बा पैदा किया था। एक षडय़ंत्र के अंतर्गत इसे देश का राष्ट्रगान नही बनने दिया गया, कांग्रेस के ‘एक बड़े नेता’ ने इसका व्यक्तिगत स्तर पर विरोध किया और सारी कांग्रेस ने उस ‘बड़े नेता’ के सामने जमीर बेचकर इस प्रचलित कांग्रेसी राष्ट्रगान को देश का राष्ट्रगान बना दिया। पता नही अपने जन्मकाल से ही व्यक्ति पूजा में आकण्ठ डूबी कांग्रेस इसके उपरांत भी कैसे अपने आपको व्यक्तिनिष्ठ न होकर समूहनिष्ठ होने का दम भरती है?
1965 के गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में तत्कालीन राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने जब कुलार्णव तंत्र का अधोलिखित श्लोक बोला था तो राष्ट्रवादी लोगों का दिल बल्लियों उछल पड़ा था, और लोगों को लगा था कि देश के नेता ऐसे ही होने चाहिए जो अपने गौरव पूर्ण अतीत की झांकियों को अपने उद्बोधनों में प्रकट करने की क्षमता से भरपूर हों। श्लोक था—-
हिमालयं समारम्भ यावदिन्दु सरोवरम्।
हिन्दुस्थानमिति ख्यातं अंतक्षरात योगात।।
अर्थात हिमालय का आदि अक्षर ‘हि’ और कन्याकुमारी पर्यन्त इन्दु सरोवर का अंतिम अक्षर ‘न्दु’ के संयोग से हिन्दू और हिंदू से यह भूखण्ड हिन्दुस्थान बना है। 1965 के पश्चात 2014 के स्वतंत्रता दिवस पर फिर वह गौरवपूर्ण क्षण आये जब देश के प्रधानमंत्री मोदी ने लालकिले की प्राचीर से ‘वंदेमातरम्’ बोला। इस गीत में बंकिम चंद्र चटर्जी ने मातृभूमि की वंदना की है, और मातृभूमि की इस वंदना में मानो उन्होंने वेद के पृथ्वी सूक्त का निचोड़ लाकर रख दिया है। अथर्ववेद (12 /1/11) की एक बानगी देखिए:-‘हे हमारी मातृभूमि! तुम्हारी पहाडिय़ां और बर्फ से ढके पहाड़ व वन जंगल हमें सुखदायक हों, भरण पोषण करने वाली, कृषि योग्य, उपजाऊ, भूरे काले और लाल रंगों वाली तथा अनेक रूपों वाली और स्थिरता वाली, सबका आश्रय स्थान, विस्तृत तथा विस्तार वाली और ख्याति देने वाली सम्राट से सुरक्षित (राष्ट्र के प्रधान सेवक से सुरक्षित) अपनी मातृभूमि पर मैं पूर्ण आयु वाला अहिंसित और सब प्रकार के कष्टों से रहित आनंद पूर्वक अधिष्ठित रहूं। अर्थात राज्य व्यवस्था ऐसी हो कि बर्फीले पहाड़ों से लेकर छोटी छोटी पहाडिय़ां, जंगल एवं विभिन्न प्रकार की मृदाओं का राष्ट्र कल्याण के लिए सर्वोत्तम उपाय हो। लोग राष्ट्र में निर्भय होकर रहें। प्रशासन राष्ट्र को सुदृढ़ और सुरक्षित करे, एवं प्रत्येक नागरिक स्वस्थ नीरोग होकर पूर्ण आयु सानंद रहे।”प्रचलित राष्ट्रगान कांग्रेसी नेताओं की ब्रिटिश राजा के प्रति चाटुकारिता का नमूना है, उसमें देशभक्ति कहीं नही दीखती, मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्रवासियों के कल्याण का कोई संकल्प नही दीखता, जबकि ‘वंदेमातरम्’ गीत में ये चीजें दिखाई देती हैं। इसलिए ‘वंदेमातरम्’ को यथाशीघ्र सरकार राष्ट्रगान घोषित करे।

Comment:

norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
mariobet giriş
betvole giriş
mariobet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
mariobet giriş
betpas giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
dedebet
betkanyon
radissonbet
casinofast
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
norabahis giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betwild giriş
redwin giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
redwin giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
realbahis giriş
realbahis giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpark giriş