कीर्तिशेष पं. प्रकाशचन्द्र कविरत्न के सभी उपलब्ध भजनों का भव्य एवं नयनाभिराम संस्करण प्रकाशित’ =========

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ओ३म्

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श्री प्रकाशचन्द्र कविरत्न जी आर्यसमाज के गीतकारों वा भजन लेखकों में अग्रणीय व एक प्रमुख गीतकार थे। उन्होंने अपने जीवन में सकैड़ों भजनों की रचना की। उनके सभी भजन उच्च कोटि के हैं जिन्हें शास्त्रीय संगीत की मधुर धुनों में प्रस्तुत किया जा सकता है। ‘वेदों का डंका आलम में बजवा दिया ऋषि दयानन्द ने’ उन्हीं की रचना है। उनके सभी भजन उनके जीवन काल में अनेक संग्रहों में प्रकाशित हुए। वह सभी संग्रह अब उपलब्ध नहीं हैं। उनके सभी भजनों के एक संग्रह का प्रकाशन समय की आवश्यकता थी। यह काम हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डौन सिटी-राजस्थान ने किया है। प्रकाशचन्द्र जी के 404 भजनों का संग्रह ‘‘प्रकाश स्तम्भ – प्रकाश भजन सरिता” के नाम से वैदिक आर्य साहित्य के प्रकाशक ऋषिभक्त श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने किया है। 364 पृष्ठों का यह एक अत्यन्त भव्य एवं आकर्षक ग्रन्थ है। मुख पृष्ठ को भी आकर्षक बनाया गया है। इस पृष्ठ पर कविरत्न प्रकाशचन्द्र जी का भव्य चित्र दिया गया है। पुस्तक के कवर पर ऋषि दयानन्द से जुड़े 6 भव्य रंगीन चित्र भी दिये गये हैं। ऋषि का एक पूरे पृष्ठ का चित्र भी दिया गया है। इस ग्रन्थ के प्रकाशक महोदय का पूर्ण विवरण हैः हितकारी प्रकाशन समिति, ‘अभ्युदय’ भवन, अग्रसेन कन्या महाविद्यालय मार्ग, स्टेशन रोड, हिण्डैन सिटी, राजस्थान-322230। प्रकाशक जी के चलभाष 7014248035 एवं 9414034072 हैं तथा इमेल aryaprabhakar@yahoo.com है। पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2021 में हुआ है तथा इसका मूल्य रुपये 300.00 है।

पुस्तक का प्रकाशकीय श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने लिखा है। उन्होंने बताया है कि जीवन के प्रति इतना सकारात्मक संदेश देने वाले कविरत्न प्रकाशचन्द्र जी ने बहुत-सा जीवन का अन्तिम अशक्त अवस्था में व्यतीत किया, परन्तु वेद के सन्देश ‘चरैवेति चरैवेति’ को आत्मसात करते हुए मुस्कराते हुए जीया। आपके काव्य में काव्यकला के दर्शन तो होते ही हैं, साथ ही सकारात्मक जीवन जीने की उत्कण्ठा व जीवन, चाहे व्यक्ति का हो अथवा समाज का, उसके चरम लक्ष्य को प्राप्त करने की जिजीविषा का दर्शन भी होता है। यह भी बता दें कि पुस्तक का ईवक्ष्यवाचन श्री दिनेश जी विद्यार्थी फरीदाबाद-हरियाणा ने निष्ठाभाव से किया है। पुस्तक के प्रकाशन में आर्थिक सहयोग बहिन जूही गुप्ता जी ने किया है। उनके सहयोग से ही यह पुस्तक प्रकाश में आ सकी है।

श्री प्रभाकरदेव जी आगे लिखते हैं कि आर्यसमाज में अनेक कवि हुए हैं, परन्तु प्रकाशजी की सैद्धान्तिक निष्ठा मनोहारी है। मैं छोटा था। पिताजी अपने साथ अजमेर लेकर गये। बहुत से जनों ने व्हीलचेयर पर बैठे एक व्यक्ति को बड़ी श्रद्धा के साथ घेरा हुआ था। लोग उनके चरण-स्पर्श कर रहे थे। मुझे लगा बड़ा आदमी है। मैंने हस्ताक्षर पुस्तिका निकाली और उनके समक्ष कर दी। मुझे कई व्यक्तियों ने टोका। कहा दिखता नहीं वह लिख नहीं सकते। मैं ठिठक गया और पुस्तिका वापिस रखने वाला ही था कि उन्होंने बड़े दुलार के साथ कहा–बेटा! देना और उन्होंने बड़े यत्नपूर्वक दो प्रेरणादायी पंक्तियां बहुत सुन्दर लेख में उस हस्ताक्षर पुस्तिका में अंकित कर मेरे सिर पर हाथ फेरा। बाद में पूज्य पिताजी ने उनके बारे में बताया। तभी एक स्वप्न देखा जो अब साकार हो रहा है।

आर्यजी बताते हैं कि इस अधूरे सुख में भी जो प्रतीति मुझे हो रही है उसको शब्द दे पाना नहीं हो रहा है। आपका बहुत सारा काव्य मुझे अप्राप्य है। कोई गुणी व्यक्ति इसकी महत्ता समझ उपलब्ध करायेगा तो उसे प्रकाशित करने का यत्न रहेगा। आयुर्वेदाचार्य श्री बालकृष्णजी महाराज का मेरे प्रति बहुत आत्मीय भाव है। एक बार उनके साथ वार्ता में प्रकाशजी का प्रसंग आया तो वह भावविभोर हो गये। मुझे करणीय कार्य के लिए स्मरण हुआ और मैंने यत्न प्रारम्भ किया। अन्त में श्री प्रभाकरदेव आर्य जी लिखते हैं कि इस मधुमय प्रकाश कलश को आपको समर्पित करते हुए कुछ-कुछ कर पाने का सुख अनुभव कर रहा हूं।

पुस्तक का प्राक्कथन श्री प्रकाशचन्द्र कविरत्न जी के कर्तिशेष शिष्य तथा आर्यसमाज के प्रसिद्ध भजनोपदेशक पं. पन्नालाल पीयूष जी ने लिखा है। वे लिखते हैं कि राजस्थान के अजमेर नगर में पं. बिहारीलाल का यश दूर-दूर तक फैला था। साहित्यकार होने के साथ वे संगीत-प्रेमी भी थे। धार्मिक और सामाजिक उत्सवों में रंग जमा देते थे। उन्हीं के घर में जन्म लिया एक होनहार बालक ने। वह बालक परिवार की आंखों का तारा था। उसे देखकर आंखों में चमक भर जाती थी। नाम धरा गया प्रकाश। गीत-संगीत के पालने में झूलकर प्रकाश पर तरुणाई आई। अच्छे संस्कारों के साथ ही साहित्य और संगीत की शिक्षा मिली। सौभाग्य से कविरत्न प्रकाश का सम्पर्क हो गया आर्यसमाज से। फिर क्या था। सोने में सुगंध भरने लगी। आर्योपदेशकों में उठने बैठने, वेदों की घटनाओं को गुनगुनाने, समाज में व्याप्त बुराइयों को मिटाने में ही लीन हो गए।

पंडित पन्नालाल पीयूष जी बताते हैं कि छन्द-रचना में इन्हें जन्मजात रुचि थी। उठती जवानी ने उमंगों में इतने अनूठे रंग भर दिए कि जो भी इन्हें सुनता, मुग्ध रह जाता। पिता गायक थे तो इन्हें भी राग-रागनियों और तालों की गहरी सूझबूझ होती गई। आर्यसमज के जलसे-जुलूसों और उत्सवों-समारोहों में इन्हें दूर-दूर से बुलाया जाने लगा। प्रकाश जी की कीर्ति कुछ ऐसी फैली कि इनकी रची हुई भजनावली देश की सीमाएं पार करती गई। उनके छोटे संग्रहों को संकलित करके, प्यासे पाठकों के लिये उनके अमृत-कलश से कुछ धाराएं प्रवाहित की जा रही हैं। इनकी मिठास मन-प्राण में नवयौवन भर देगी।

पाठक-मित्रों के लाभ की दृष्टि से प्रकाश जी का एक लोकप्रिय भजन प्रस्तुत है:

हे पुजारी! स्वार्थ-वश यह पाठ पूजन और है।
किन्तु उस भगवान् का निष्काम चिन्तन और है।।

देखते हैं जिसमें हम उस दिव्य दर्पणकार को।
जग के दर्पण से अलग वह मन का दर्पण और है।।

इन गरजने वालों का विश्वास करना व्यर्थ है।
तृप्त करता जो तृषित को वह सजल घन और है।।

भर न दम वैराग्य का अय राग के रंग में रंगे।
त्याग के रंग में रंगा वह सन्त-जीवन और है।।

देख बाहर की चमक धोखा न खाना तू ‘प्रकाश’।
ये अरे! पीतल निरा है, शुद्ध कंचन और है।।

पं. प्रकाशचन्द्र कविरत्न जी का जीवन परिचय एवं कार्यों का संक्षिप्त विवरण कीर्तिशेष विद्वान डा. भवानीलाल भारतीय जी ने अपने ग्रन्थ ‘आर्य लेखक कोश’ में दिया है। वहीं से हम उनका परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं कि आर्यसमाज के उत्कृष्ट कवि, गायक तथा प्रचारक पं. प्रकाशचन्द्र कविरत्न का जन्म आश्विन शुक्ला 9 संवत् 1960 विक्रमी (1903) को अजमेर में हुआ। इनके पिता पं. बिहारीलाल कट्टर पौराणिक थे। इनका प्रारम्भिक शिक्षण डी.ए.वी. हाईस्कूल अजमेर मे हुआ। आर्यसमाज में प्रविष्ट हेने की प्रेरणा उन्हें राजस्थान के प्रसिद्ध धर्म प्रचारक पं. रामसहाय शर्मा ने दी थी। जीविका निर्वाह हेतु वे भड़ौच की एक मिल में लिपिक का कार्य करने लगे। उन्हीं दिनों अमृतसर में जलियांवाला-बाग हत्याकाण्ड हुआ जिसमें सैकड़ों निर्दोष व्यक्ति मारे गये। इस भीषण घटना ने कविरत्नजी को विचलित कर दिया और वे नौकरी से त्यागपत्र देकर राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में जुट गये। यहां यह स्मरणीय है कि उनका मूल नाम ‘दुर्गाप्रसाद’ था। आर्यसमाज में प्रविष्ट होने पर उन्होंने अपना नाम ‘प्रकाशचन्द्र’ रख लिया। जब उन्होंने शुक्लतीर्थ (गुजरात) के मेले में ईसाई पादरियों द्वारा ग्रामीण, भोले भाले हिन्दुओं को ईसाई बनाते देखा, तो आर्यसमाज के प्रति उनकी श्रद्धा और अधिक बढ़ गई क्योंकि उन्हें आर्यसमाज के उपदेशक एवं प्रचारक ही ईसाई पादरियों का मुकाबिला करने में सन्नद्ध दीख पड़े। अब उन्होंने विधिवत् आर्यसमाज के उपदेशक के रूप में धर्म प्रचार आरम्भ किया। अजमेर में उन्हें कुंवर चांदकरण शारदा तथा पं. जियालाल आदि आर्य नेताओं का सान्निध्य तथ सहयोग प्राप्त हुआ।

1925 में कविरत्न जी ऋषि दयानन्द की जन्म-शताब्दी में भाग लेने मथुरा गये। वहां उनके गीत ‘वेदों का डंका आलम में बजवा दिया ऋषि दयानन्द ने’ ने धूम मचा दी और प्रकाशजी को शीघ्र ही लोकप्रियता प्राप्त हो गई। कविता कामिनी कान्त पं. नाथूरामशंकर शर्मा को आप अपना काव्य गुरु मानते थे। 1930 के हैदराबाद आर्य सत्याग्रह आन्दोलन मंक भी आपने भाग लिया और कारावास का दण्ड स्वीकार किया। कालान्तर में आप वात रोग से ग्रस्त होकर प्रायः अपंग से हो गये और अजमेर के पहाड़गंज मोहल्ले में रहने लगे। यहां पर ही 11 दिसम्बर 1977 को उनका निधन हुआ। आनासागर तट पर उनका सार्वजनिक अभिनन्दन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता राजाधिराज सुदर्शनदेव शाहपुराधीश ने की थी। पण्डित प्रकाशचन्द्र जी के कई काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं। 1. प्रकाश भजनावली 5-भाग, 2. प्रकाश भजन सत्संग, 3. प्रकाशगीत 4-भाग, 4. प्रकाश तरंगिणी, 5. कहावत कवितावली (2021 वि.), 6. गोगीत प्रकाश, (1945 ई.) 7. दयानन्द प्रकाश खंड-1 महाकाव्य (1971), 8. राष्ट्र-जागरण (चीन के आक्रमण के समय लिखी गई कविताएं), 9. स्वामी श्रद्धानन्द गुणगान (2033 वि.)। पण्डित प्रकाशचन्द्र कविरत्न पर डा. भारतीय जी द्वारा सम्पादित ‘प्रकाश अभिनन्दन ग्रन्थ’ भी प्रकाशित हुआ था।

ऋषिभक्त श्री प्रभाकर देव आर्य जी ने ‘प्रकाश भजन सरिता’ का प्रकाशन कर एक महनीय कार्य किया है। इससे पाठकों को प्रकाशजी के 404 भजन पहली बार एक ही ग्रन्थ में सुलभ हो गये हैं। पंडित प्रकाश जी ने इन भजनों को लिखने में अपना पूरा जीवन लगाया है। यह महद् कार्य उन्होंने ईश्वर व आर्यसमाज सहित वेद की महिमा का गुणगान करने तथा वेदप्रचार के लिए किया था। हमारा कर्तव्य है कि हम पंडितजी और आर्यसमाज के प्रति श्रद्धा का परिचय दें और इस ग्रन्थ को मंगाकर इसका वाचन व अध्ययन करें तथा इसे अपनी भावी पीढ़ियों को सौंपकर जायें। ऐसा करने व इस प्रवृत्ति से ही वैदिक धर्म सुरक्षित एवं जीवन्त रह सकता है। ऐसा करके हम आर्यसमाज के संगठन को भी सुदृण बना सकेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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