साध्वी के बयान पर नरेन्द्र मोदी की सटीक प्रतिक्रिया

2014_9image_18_46_457521000jyoti-llकेन्द्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने पिछले दिनों बयान दिया जिसमें एक समुदाय के लोगों को उन्होंने ‘रामजादा’ तो दूसरे समुदाय के लोगों को ”…..रामजादा” कह दिया। भारत जैसे महान देश की केन्द्रीय मंत्री की भाषा में यदि ऐसे शब्द आते हैं, तो निश्चय ही इसे राजनीति के गिरते हुए स्तर के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि शासक वर्ग और उससे जुड़े लोग जनता में लोगों के मध्य इस प्रकार की घृणास्पद विभाजक रेखा खींच कर देखेंगे तो जनसाधारण में उसकी प्रतिक्रिया क्या होगा? यह बात विचारणीय है। विशेषतया तब जब यह बात भारत में सर्वमान्य स्वीकृति प्राप्त किये हुए हैं कि यथा राजा तथा प्रजा। राजा यदि भ्रष्ट है तो जनता भी भ्रष्ट हो जाएगी और यदि राजा निकृष्ट है तो जनता भी निकृष्ट हो जाएगी। इसलिए शासक वर्ग को अपनी भाषा पर संतुलन बनाकर बोलने की सीमा रेखा एक मर्यादा के रूप में अपेक्षित की गयी है।

संस्कृत विश्व की एक मात्र ऐसी भाषा है जिसमें एक शब्द भी गाली के रूप में नही है, जो शब्द हमें अप्रिय लगता है, उसे ‘अपशब्द’ या ‘अप्रिय शब्द’ के रूप में मान्यता मिली है। लेकिन अशोभनीय शब्द गाली का कहीं प्रयोग नही है। गालियों की भरमार उर्दू में है। यदि नेता विदेशी भाषा अपनाएंगे तो उसके परिणाम भी गालियों के रूप में झेलने ही पड़ेंगे। भारत में जिस ”हिन्दू राष्ट्र” या ”सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” की बात कही जाती रही है, उसका अभिप्राय भी ऐसे शब्दों का प्रयोग करने की किसी व्यक्ति को अनुमति दे देना नही है जिससे किसी दूसरे समुदाय के व्यक्ति की भावनाओं को चोट पहुंचे। इसके विपरीत ‘हिन्दू राष्ट्र’ या ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का अभिप्राय है कि जहां पर ऐसे असभ्य आचरण को अपनाने की मूर्खता होती रही है या हो रही है, उन पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा देना। जो लेाग हिन्दुत्व की धारणा का अभिप्राय दूसरों को अपमानित करने या किसी के कपड़े फाड़ देने को मानते हैं, उनकी मानसिकता निश्चय ही संकीर्ण कही जाएगी। जहां तक केन्द्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के वक्तव्य का प्रश्न है तो उन्होंने इस प्रकरण में शीघ्र ही क्षमायाचना कर इस बात का स्पष्ट संकेत दे दिया कि उनसे ‘चूक हुई’ और उस चूक के लिए वह प्रायश्चित करती हैं। इसके साथ ही साथ उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उन पर ‘मोदी अंकुश’ है और वे मोदी अंकुश के सामने नतमस्तक भी हैं। किसी अच्छी टीम के कप्तान और खिलाड़ी दोनों के लिए यह अवश्य भी होता है कि यदि खिलाड़ी खेल के नियमों का उल्लंघन करता है तो कप्तान मैदान के बीच में उस खिलाड़ी का कान पकडऩे का अधिकार रखता है। कप्तान और खिलाड़ी के बीच यह सामंजस्य एक अनुशासन पूर्ण मर्यादा के भीतर रहकर व्यवस्था को व्यवस्थित रहने के लिए प्रेरित करता है। जिसे देश के लिए शुभ संकेत माना जाना चाहिए। जिस देश के पीएम के मंत्री निरंकुश हो जाते हैं वहां पर अराजकता फैल जाती है। अथवा अव्यवस्था का बोलबाला हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने उक्त प्रकरण में शीघ्र हस्तक्षेप कर लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुसार संबंधित मंत्री को जिस प्रकार सदन में माफी मांगने के लिए प्रेरित किया, उससे उनकी न्यायप्रिय छवि उभर कर सामने आयी। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मैं किसी के लिए गलत भाषा का प्रयोग न तो स्वयं करूंगा और न किसी को करने दूंगा। प्रधानमंत्री का सर्वोपरि घोषित लक्ष्य है कि ‘काम करो’ और ‘केवल काम करो’। इस भावना को वह इस सनातन-पुरातन राष्ट्र के राष्ट्रीय चरित्र के साथ एकाकार कर देना चाहते हैं। क्योंकि इसी राष्ट्रीय चरित्र में भारत की सर्वांगीण उन्नति का रहस्य छुपा है। जब हर व्यक्ति किसी राष्ट्रीय चरित्र से अनुशासित और शासित होने लगेगा तो छोटी और ओच्छी बातों का उसे सोचने का समय ही नही मिलेगा। जहां तक इस प्रकरण में विपक्ष द्वारा दिखाये जा रहे विरोध का प्रश्न है तो विरोध प्रदर्शन करना या संसद से बाहर निकल जाना, उनका विशेषाधिकार है। जिसे उन्हें प्रयोग करना भी चाहिए। परन्तु यह भी स्मरणीय है कि अपेक्षा से अधिक किसी को दंडित करना भी अपने आप में एकअपराध है। हमारी संसद अपराधयुक्त भारत के लिए नही, अपितु अपराधमुक्त भारत के निर्माण के लिए बनी है। इसलिए वहां ‘मनसा वाचा कर्मणा’ किसी भी प्रकार का अपराध किया जाना वर्जित है।

लोकसभा चुनावों में बुरी तरह पिटे विपक्ष को यदि मुद्दे नही मिल रहे हैं तो ऐसे में किसी मंत्री का ऐसा बयान जिसके लिए स्वयं प्रधानमंत्री भी क्षमा याचना कर रहे हों, विवाद का मुद्दा नही बन सकता। संसद सत्र चल रहा है इसे अनर्थक बातों में बिताने के लिए विपक्ष गलत ढंग से साध्वी ज्योति के बयान को लेकर अड़ंगा डाल रहा है। लगता है वह विपक्ष अर्थात ‘विशेष पक्ष’ न होकर ‘विपरीत पक्ष’ बनकर रह गया है। इसे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नही कहा जा सकता।

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