Kalyanएक दैनिक समाचार पत्र में एक लेख ‘राज्यपाल, राष्ट्रगान और कॉमन सेन्स’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ। विगत 13 जुलाई 2015 को प्रकाशित हुए इस लेख के लेखक पंकज श्रीवास्तव हैं। आलेख में लेखक ने पिछले दिनों राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह द्वारा राष्ट्रगान से ‘अधिनायक’ शब्द को हटाने संबंधी टिप्पणी की, यह कहकर आलोचना की है कि देश में एक तबका साफ तौर पर यह मानता है कि इस ‘अधिनायक’ शब्द का अभिप्राय जॉर्ज पंचम से है जो 1911 ई. में भारत आये थे। लेखक का मानना है कि ‘अधिनायक’ का अभिप्राय राष्ट्र की जनता से है, उसके सामूहिक विवेक से है या उस सर्वशक्तिमान (ईश्वर) से है जो भारत के रथचक्र को सदियों से आगे बढ़ा रहा है। इसलिए लेखक ने एक प्रकार से कांग्रेस की ‘ब्रिटिश चाटुकारिता’ की उस समय की नीति का बचाव किया है कि इस गीत के गाने का अभिप्राय तत्कालीन कांग्रेसियों की ब्रिटिश राजा की ‘चरणवंदना’ करना नही था, और ना ही गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर का उद्देश्य ब्रिटिश राजा की ‘चरणवंदना’ करना था।

लेखक का विचार है कि ऐसे बयान आर.एस.एस. जैसे संगठनों की पृष्ठभूमि में रहने वाले कल्याणसिंह जैसे लोगों की सोच का परिणाम होते हैं। क्योंकि गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर जैसे कवि से यह अपेक्षा नही की जा सकती कि वे ब्रिटिश राजा की स्तुति में ऐसी कविता लिख दें, विशेषत: तब जबकि जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड के पश्चात ‘नाइटहुड’ की मिली उपाधि को उन्होंने सविनय लौटा दिया था। लेखक का मानना है कि 27 जुलाई 1911 को ‘बादशाह हमारा’ नामक गीत सम्राट के लिए गाया गया था, जो कि राजभुजा दत्त चौधरी ने लिखा था। पर लेखक का यह भी कहना है कि इस गीत से पूर्व कांग्रेसियों ने ‘जन-गण-मन’ गीत भी गाया था।

उक्त लेख का लेखक पूर्णत: पूर्वाग्रह से ग्रसित है। लेखक ने तथ्यों की समीक्षा किये बिना या तथ्यों को उपेक्षित करके यह लेख तैयार करने का प्रयास किया है। परंतु इसके उपरांत भी लेखक ने अपने ही लेख में यह तो स्वीकार कर ही लिया है कि 1911 ई. में ब्रिटिश राजा के आने पर यह ‘जन-गण-मन’ वाला गीत ‘बादशाह हमारा’ से भी पूर्व गाया गया था। वैसे लेखक ने कांग्रेस के तत्कालीन अधिवेशन की तिथि 27 जुलाई लिखी है, जो कि असत्य है। कांग्रेस का अधिवेशन प्रारंभ से ही वर्ष के अंत में उसके स्थापना दिवस के समय 25 दिसंबर से 30 दिसंबर के मध्य ही रखा जाता रहा है। वर्ष 1911 में यह अधिवेशन 27 दिसंबर से प्रारंभ हुआ था। यह भी सर्वमान्य सत्य है कि उसी माह में ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम का भारत आगमन हुआ था।

अब आते हैं कांग्रेस की ब्रिटिश सत्ताधीशों के प्रति ‘चरणवंदना’ पर, तो कांग्रेस के विषय में यह भी सर्वमान्य सत्य है कि इसका जन्म भारत को स्वतंत्र कराने के लिए न होकर भारतीयों के असंतोष को इसके माध्यम से निकालने के लिए किया गया था। भारत के स्वातंत्रय समर का इतिहास लिखने में इस तथ्य की पूर्णत: उपेक्षा की गयी है कि 1875 ई. में आर्य समाज की स्थापना के पश्चात से देश में ‘स्वराज्य’ चिंतन की प्रक्रिया बढ़ गयी थी और लोग अंग्रेजों के विरूद्घ  1857 की क्रांति से भी बढक़र क्रांति करने के लिए आंदोलित होते जा रहे थे, इसलिए कांग्रेस को अपनी ‘सेफ्टीवाल्व’ के रूप में स्वयं अंग्रेजों ने ही स्थापित कराया था। यह कांग्रेस अपने मूल स्वभाव में ही अंग्रेजों के प्रति अपनी राजभक्ति को प्रदर्शित करने तथा स्वयं को ब्रिटिश राजा का नागरिक मानने में गर्व की अनुभूति किया करती थी। इसके सम्मेलनों में वही लोग आया करते थे जो पढ़ लिखकर पूरी तरह अंग्रेज बन गये होते थे। स्वयं जवाहरलाल नेहरू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं :-‘‘(1912 ई. में) मैंने एक डेलीगेट की हैसियत से बांकीपुर कांग्रेस में भाग लिया था। यह मात्र अंग्रेजी जानने वाले उच्च संभ्रांत लोगों का जलसा मात्र था, जिसमें प्रात: बढिय़ा कोट और प्रेस की हुई पतलूनों वाले लोग जुटे थे। यह केवल एक सामाजिक जलसा मात्र था, इसमें ना तो मुझे कहीं राजनीतिक तनाव दिखाई दिया और ना ही किसी प्रकार की उत्तेजना ही दिखाई दी। गोखले ही इस अधिवेशन में प्रभावशाली दिखाई दे रहे थे।’’ अनेक अन्य प्रस्तावों तथा धन्यवाद के साथ यह अधिवेशन समाप्त हो गया था।

पंडित नेहरू ने इस समय तक की कांग्रेस को पूर्णत: ‘निष्क्रिय’ मानते हुए अपनी आत्मकथा में लिखा है :-‘‘कांग्रेस उदारवादियों (जो कोट पतलून पहनकर वर्ष में एक बार कहीं बैठ लिया करते थे) का समूह प्रतिवर्ष एक वार्षिक जलसा करता था, कुछ प्रस्ताव पास करता था और यह थोड़ा बहुत ध्यान ही आकर्षित कर पाता था।’’ अत: ऐसी कांग्रेस से पूरी अपेक्षा की जा सकती थी कि वह ‘जन-गण-मन अधिनायक’ को केवल जॉर्ज पंचम के लिए ही गा रही थी।

यद्यपि 1906 ई. के कांग्रेस अधिवेशन में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे, परंतु दादाभाई नौरोजी ने उस समय भी अपने आपको और सभी कांग्रेसियों को ‘ब्रिटिश नागरिक’ ही माना और उस पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की थी। इस मंच से कांग्रेस ने पहली बार ‘स्वराज्य’ शब्द का प्रयोग भी किया, परंतु वह ‘स्वराज्य’ अंग्रेजी प्रशासन को भारतीय बनाने तक ही सीमित था। पूर्ण स्वराज्य की मांग करने के लिए कांग्रेस ने 1930 ई. में अपना कार्यक्रम विधिवत प्रारंभ किया था। जबकि आर्य समाज जैसी राष्ट्रवादी संस्थाएं इस कार्य को बहुत पहले से करती आ  रही थीं। डा. बलदेवराज गुप्त ने अपनी पुस्तक कांगे्रस का इतिहास के पृष्ठ 47 पर लिखा है कि ‘‘अपने मुल्क को प्यार करने वालों को उस समय ‘गैर वफादार’ माना जाता था।’’ कांग्रेस को प्यार ब्रिटिश राज्य से था, इसलिए वह गैर वफादार नही थी। अत: अपने आपको ब्रिटिश राजभक्त दिखाना उसके लिए आवश्यक था और वह दिखाती भी रही। यही कारण है कि उसके स्वराज्य और आर्य समाज के स्वराज्य में जमीन आसमान का अंतर था। उसका ‘स्वराज्य’ भी ब्रिटिश राजभक्ति से सराकोर था। कल्याण सिंह जैसे लोग उस समय चाहे ‘गैर वफादार’ कहे जाते हों, पर आज नही हैं।

क्रमश:

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