सैयाह सुनामी की प्रासंगिकता और इतिहास का पुनर्लेखन

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राजीव रंजन प्रसाद

ऐतिहासिक उपन्यासों की परम्परा में अनेक नाम देदीप्यमान हैं लेकिन कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनकी रचनाओं को जनप्रियता तो प्राप्त हुई तथापि उनका समुचित मूल्यांकन नहीं हुआ। वाद और पंथ की बेडिय़ों ने समालोचकों को अनेक साहित्यिक नाम प्रतिमान की तरह स्थापित करने के लिये प्रदान किये परंतु कतिपय लेखन ऐसा भी रहा है जिसे जानते बूझते अनदेखा किया गया है। किशोरीलाल गोस्वामी से आरम्भ हुई ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की परम्परा को समृद्ध करने वालों में अनेक उपन्यासकारों की महती भूमिका रही है। कुछ नाम तो अंगुलियों पर ही गिने जा सकते हैं जिनमें वृन्दानलाल वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, जयशंकर प्रसाद, राहुल सांकृत्यायन, रांगेय राघव, हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, अमृतलाल नागर, मनु शर्मा, नरेन्द्र कोहली आदि प्रमुख हैं। इतिहासलेखन में प्रवीण अनेक ऐसे उपन्यासकार भी हैं जो विवेचनाओं की कसौटी से होकर कम ही गुजारे गये तथा समय के साथ उनका कृतित्व गुमनामी में खोता चला गया, ऐसा ही एक नाम हैं रामजी दास पुरी जो सय्याह सुनामी के नाम से ख्यात हैं।
हिन्दी के उपन्यासकारों में सय्याह सुनामी को तलाश पाना इसलिये भी कठिन है चूंकि वे मूलत: उर्दू में अपना सृजनकर्म कर रहे थे, सम्भवत: यही कारण उनके उपनाम धारण करने के लिये भी रहा है। रचनाकार की विविधता देखिये कि पंजाब सरकार ने राज्य के श्रेष्ठतम साहित्यकारों की सूची में उन्हें सम्मिलित किया था। हिन्दी के पाठकों के लिये उनके उपन्यासों का अनुवाद साठ के दशक से ही उपलब्ध होने लगा तथापि वे उर्दू साहित्यकारों के कोष्ठक में ही कैद रहे। हिन्दी जगत में उनकी उपेक्षा का एक अन्य कारण यह प्रतीत होता है कि अनूदित कृतियों के मूल रचनाकार की ओर हिन्दी समालोचना जगत ने दृष्टि करना आवश्यक नहीं समझा अथवा इस दिशा में लेखक का राष्ट्रवादी स्वर, एक बडी बाधा बना है। वे इतने समर्पित राष्ट्रवादी थे कि उन्होंने अपनी कृतियों के उत्तराधिकार को भी राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। पंजाब सरकार ने उन्हें उपन्यास ‘परायी तलवार’ के लिये तथा भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने कृति ‘एक औरत एक कयामत’ के लिये पुरस्कृत किया था। परिचय में यह जोड़ा जाना आवश्यक है कि वे बहुत अच्छे कवि भी थे।
सय्याम सुनामी का लेखन का राष्ट्र के गौरव का परिचायक है, अतीत के अनकहे का रोचक प्रस्तुतिकरण है इस सबके साथ साथ इनमें अद्भुत जनपक्षधरता भी है। उपन्यास ‘काफिर’ जो कि औरंगजेब द्वारा उसके अपने भाई तथा तख्त-ए-ताउस के वास्तविक उत्तराधिकारी शहज़ादे दाराशिकोह की हत्या साथ ही राणा राजसिंह द्वारा औरंगजेब को पराजित किये जाने के लोमहर्षक वृतांत पर आधारित है; इस कृति की भूमिका में सय्याम सुनामी लिखते हैं – ‘साहित्यकार को मानवीय पक्ष दृष्टिगत रखते हुए आतताई और पीडि़त (जालिम और मजलूम) में से पीडि़त के प्रति सहानुभूति व्यक्त करनी चाहिए। हमारी परम्परा की भी यही मांग है। यही बात व्यक्तिगत और समष्टिगत जीवन के संबंध में भी लागू होती है। किन्तु एक विडंबना यह भी है कि मैं उस समाज का ही एक घटक रहा हूँ जो एक सहस्र वर्ष तक आक्रान्ताओं से पीडि़त रहा है और जिसका यह सदगुण है कि वह न्याय एवं शान्ति का उपासक है। दुर्भाग्य यह है कि उसके ये गुण ही उसके लिए अभिशाप सिद्ध हुए हैं। अतएव ऐसे समाज से संबंधित एक लेखक के नाते मेरे समक्ष यह उलझन भी रही है कि मैं पहले लेखक हूँ अथवा समाज का घटक? तब मेरा चिन्तन और विवेक मेरे इस प्रश्न का एक ही उत्तर देता है कि मानव जीवन के अनेक पक्ष हैं, वे एक दूसरे के अनुपूरक होते हैं विरोधी नहीं। मेरी यह भी धारणा है कि विश्व में कोई भी सामान्य मानव सर्वथा निष्पक्ष नहीं हो सकता। समकालीन परिस्थितियों का जिस पर प्रभाव नहीं पड़ता वह जड़ है, चैतन्यशील मानव नहीं।’
कृष्णानंद सागर ने सय्याम सुनामी की कृतियों पर टिप्पणी करते हुए लिखा -‘सुनामी जी ने भारतीय इतिहास के विभिन्न कालखण्डों को अपने उपन्यास का विषय बनाया है। ऐतिहासिक तथ्यों के इर्द गिर्द वे कथा का ऐसा ताना बाना बुनते हैं कि इतिहास की अनेक उलझी हुई गुत्थियाँ पाठक के मन में स्वत: ही सुलझती जाती हैं। वे निराशा को आशा में तथा उदासीनता को कर्मण्यता में बदल देते हैं। अंत:करण के अंधकार में उत्साह की ज्योति प्रज्वलित कर देते हैं। सुनामी जी का मूल मंत्र था ओम् राष्ट्राय स्वाहा। अपनी सभी कृतियों में उन्होंने इसी मंत्र को प्रतिध्वनित किया है। ‘यह टिप्पणी सुनामी जी के उपन्यासों के लिये बिलकुल सटीक बैठती है। नृशंस हूणों के भारत पर आक्रमण जैसे जटिल विषय पर आधारित उपन्यास ‘आखिर जीत हमारी’ पढते हुए अतीत के प्रति अलग तरह के गर्व से मन भर उठता है, यह उपन्यास वर्तमान को भी सुस्पष्ट संदेश देता है। ऐतिहासिक उपन्यास लिखते हुए प्राय: लेखक तथ्यात्मकता प्रदान करने की ललक में कहानी के बीच बीच में निबन्धों से पन्ने भर देते हैं परंतु सुनामी जी का लेखन अत्यधिक प्रवाहमय और सतत संवादों से भरा हुआ है। वे पात्रों के माध्यम से समय को सजीव करते हैं और उनके संवादों द्वारा विश्लेषण।
ऐसा प्रतीत होता है कि सय्याह सुनामी का इतिहास लेखन सोद्देश्य था। वे भारतीयता को उसका मर्म प्रदान करने के लिये प्रयासरत थे। अपने उपन्यास ‘काफिर’ की भूमिका में में वे लिखते हैं – ‘आक्रान्ताओं ने भारत के विभिन्न राज्यों के सत्ताधीशों को तो परास्त किया ही, साथ ही यहाँ अनेक निर्दोष नर-नारियों, आबाल-वृद्धों का भी नरसंहार किया और पावन धर्मस्थानों को भी अपनी विनाशक प्रवृत्ति की भेंट चढ़ाया। उन्होंने इस बात की भी उपेक्षा कर दी कि भारत के धर्म, दर्शन और संस्कृति के भी कुछ अनुकरणीय पक्ष हो सकते हैं।’यह स्वांत; सुखाय लेखन की ओर इशारा नहीं है। सुनामी ने जो लिखा किसी अभियान की तरह यश-धन की कामना से विरक्त हो कर। वे जानते थे कि वाम-वर्चस्व वाला साहित्यसमाज उन्हें सहजता से अपनायेगा नहीं परंतु साधक को इसकी परवाह कहाँ होती है? सुनामी लिखते है -‘संभव है कि मेरी कृति को कई लोग पसन्द न करें, क्योंकि सभी लोग समान विचारों के अनुगामी नहीं हो सकते। कई लोग अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर अपने प्राण समर्पित करते हैं तो विश्व में ऐसे भी अनेक लोग आपको मिलेंगे जो अन्याय को अन्याय कहने से भी डरते हैं। हमारे देश में भी ऐसी प्रवृत्ति काफी व्याप्ता रही है। यदि इस प्रकार के किसी एक व्यक्ति को मेरी यह रचना अनुप्रेरित कर पाई तो मैं अपने प्रयास को सफल मानूँगा।’
सय्याह सुनामी का लेखन हिन्दी में अनूदित हो कर पाठकों के समक्ष आ सका, यह एक बड़ी उपलब्धि है। काफिर, आखिर जीत हमारी, उड़ता त्रिशूल, हेमचन्द्र विक्रमादित्य, परायी तलवार, एक औरत एक कयामत, भगवान एकलिंग आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। आज जब इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है, अतीत को वाम-पूर्वाग्रहों से निकाल कर सही समझ विकसित करना जरूरी है। गया है तब हम सय्याह सुनामी की रचनाओं से हो कर ही आगे बढ सकते हैं। कालजयी रचनाओं का ऐसा लेखक आज के समय में अधिक प्रासंगिक है।

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