अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए उद्योगों को रोजगार के अवसर तेजी से बढ़ाने होंगे

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प्रह्लाद सबनानी 

पश्चिमी देशों में कृषि क्षेत्र पर केवल लगभग 2 प्रतिशत आबादी ही आश्रित रहती है और शेष आबादी को उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों से रोजगार मिलता है। इसके कारण प्रति व्यक्ति आय भी इन देशों में बहुत अधिक रहती है। परंतु भारत में परिस्थितियां कुछ भिन्न हैं।

किसी भी देश के आर्थिक विकास को गति देने में तीन क्षेत्रों- कृषि क्षेत्र, उद्योग क्षेत्र एवं सेवा क्षेत्र का योगदान रहता है। विकास के शुरुआती दौर में कृषि क्षेत्र का योगदान सर्वाधिक रहता है परंतु जैसे-जैसे देश में विकास की गति तेज होने लगती है वैसे-वैसे कृषि क्षेत्र का योगदान कम होता जाता है और उद्योग एवं सेवा क्षेत्र का योगदान बढ़ता जाता है। वर्ष 1947 में भारत की आजादी के तुरंत बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 55 प्रतिशत पाया गया था, जो आज घटकर 16-18 प्रतिशत के बीच रह गया है, हालांकि देश में लगभग 60 प्रतिशत के आसपास आबादी आज भी गांवों में ही निवास करती है। वर्ष 1947 के बाद से आज सेवा क्षेत्र का योगदान 60 प्रतिशत से अधिक हो गया है। इस बीच भारत में कई उद्योग तो स्थापित हुए हैं परंतु भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योग क्षेत्र का योगदान उत्साहजनक रूप में नहीं बढ़ा है।

रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे
सामान्यतः किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में अधिक से अधिक उद्योगों की स्थापना करने से रोजगार के नए अवसर निर्मित होते हैं। परंतु भारत में कृषि क्षेत्र के कम होते गए योगदान को सेवा क्षेत्र अपना योगदान बढ़ाकर इस कमी की पूर्ति करता गया, जबकि उद्योग क्षेत्र अपना योगदान कोई बहुत अधिक नहीं बढ़ा पाया जिसके कारण रोजगार के जितने अवसर निर्मित होने चाहिए थे, उतने नहीं हो सके। सेवा क्षेत्र का दबदबा शहरों के आसपास ही बना रहा एवं रोजगार के नए अवसर भी शहरों में ही निर्मित होते रहे। देश के ग्रामीण इलाकों में कृषि क्षेत्र के कम होते योगदान के बीच एवं गांवों में निवास करने वाले लोगों की अधिक संख्या के चलते ग्रामीण इलाकों में रोजगार के नए अवसर आवश्यकतानुसार निर्मित नहीं हुए। इसलिए ग्रामीण इलाके अभी भी गरीबी की चपेट में बने हुए हैं। भारत के शहरी एवं ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति आय में भी भारी अंतर दृष्टिगोचर है।

पश्चिमी देशों में कृषि क्षेत्र पर केवल लगभग 2 प्रतिशत आबादी ही आश्रित रहती है और शेष आबादी को उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों से रोजगार मिलता है। इसके कारण प्रति व्यक्ति आय भी इन देशों में बहुत अधिक रहती है। परंतु, भारत में परिस्थितियां कुछ भिन्न हैं एवं 60 प्रतिशत आबादी गांवों में निवास करते हुए अपने रोजगार के लिए मुख्यतः कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर है। देश के ग्रामीण इलाकों में कुटीर एवं लघु उद्योगों की स्थापना की जानी चाहिए थी परंतु अभी तक ऐसा हो नहीं सका है। ग्रामीण इलाकों में कुटीर एवं लघु उद्योगों द्वारा निर्मित उत्पादों का बाजार भी इन इलाकों में ही उपलब्ध रहेगा एवं इस प्रकार ये उद्योग शीघ्र ही पनप जाने की क्षमता रखते हैं। कुटीर एवं लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा ब्याज रहित वित्त की व्यवस्था की जा सकती है। इस तरह की एक योजना को हाल ही में केंद्र सरकार ने कोरोना महामारी के दौरान प्रभावित हुए रेड़ी वाले, ठेले वाले एवं फुटपाथ पर व्यापार करने वाले गरीब वर्ग के लोगों के लिए लागू किया था। हां, इस योजना के अंतर्गत ब्याज रहित ऋण प्राप्त करने के लिए ऋण की किश्तों का भुगतान समय पर करना आवश्यक था। इस योजना के अंतर्गत प्रदान किए गए ऋणों पर ब्याज की राशि का भुगतान केंद्र सरकार द्वारा बैंकों को किया गया था। कुटीर एवं लघु उद्योग के लिए ब्याज रहित वित्त की व्यवस्था यदि आसानी से हो जाती है तो ग्रामीण इलाकों में कुटीर एवं लघु उद्योगों की स्थापना आसानी से एवं तेजी से होने लगेगी। हमारे धर्म शास्त्रों, वेदों एवं पुराणों में भी वर्णन मिलता है कि राज्य में नागरिकों द्वारा किए जाने वाले व्यापार के लिए ब्याज रहित वित्त की व्यवस्था राज्य द्वारा की जाती थी और प्रत्येक व्यक्ति उत्पादन के अन्य घटकों का मालिक स्वयं ही रहता था एवं प्रत्येक व्यक्ति आर्थिक उपक्रमों में संलग्न रहता था और इस प्रकार इन राज्यों में बेरोजगारी बिल्कुल नहीं रहती थी। प्रत्येक परिवार चूंकि आर्थिक उपक्रम में संलग्न रहता था अतः परिवार के सभी सदस्य इस पारिवारिक उपक्रम में कार्य करते थे और कोई भी बेरोजगार नहीं रहता था एवं परिवार के सभी सदस्यों को आर्थिक सुरक्षा प्रदत्त रहती थी।

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में भारत की रैंकिंग
परंतु, अब तो भारत में समय बदल रहा है एवं देश में उद्योग क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था में अपना योगदान बढ़ाने के लिए आगे आना ही होगा। हाल ही के समय में भारत में केंद्र सरकार द्वारा उद्योग जगत को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से कई उपायों की घोषणाएं की गईं हैं। भारत सरकार द्वारा किए गए इन उपायों के चलते “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” की रैंकिंग में भारत का स्थान पूरे विश्व में 148वें स्थान से छलांग लगाते हुए 63वें स्थान पर आ गया है और अभी भी प्रयास किए जा रहे हैं कि इस वर्ष भारत का स्थान 50वें स्थान के अंदर आ जाए। न केवल रोजगार के नए अवसर निर्मित करने के उद्देश्य से बल्कि आत्म निर्भर भारत के सपने को साकार करने के लिए भी उद्योग क्षेत्र को अब आगे आकर भारतीय अर्थव्यवस्था में अपने योगदान को बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है।         
इसी कड़ी में भारत में लगभग सभी क्षेत्रों में नए नए स्टार्ट अप बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं एवं सफल भी हो रहे हैं। बहुत कम समय में ही भारत में कई स्टार्ट अप अपने आप को “यूनीकोन” की श्रेणी में ले आए हैं अर्थात् इनकी सम्पदा बहुत कम अवधि में ही 100 करोड़ रुपए से अधिक हो गई है।
मोदी सरकार क्या कर रही है ?
पहले भारत में आयात शुल्क को बढ़ाकर देशी उद्योग को संरक्षण प्रदान किया जाता था ताकि इन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतियोगिता से बचाया जा सके। परंतु अब परिस्थितियां बदल रही हैं और टैक्स की दरें कम की जा रही हैं, आयात शुल्क घटाए जा रहे हैं ताकि न केवल देशी उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाया ना सके बल्कि विदेशी निवेशकों को भी प्रोत्साहित किया जा सके ताकि वे भी भारत में आकर अपनी विनिर्माण इकाईयों को स्थापित करें एवं देश में ही रोजगार के नए अवसर निर्मित करें और भारत में उत्पादों का निर्माण कर उसे निर्यात भी करें। एक तो देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के चलते एवं दूसरे निर्यात के बढ़ने से विदेशी मुद्रा का अर्जन भी और अधिक होने लगेगा। इसके कारण भारतीय रुपया भी धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत होने लगेगा।

भारतीय उद्योग जगत द्वारा की जाने वाली मांगों की ओर भी अब सरकार पूरा ध्यान दे रही है। 1 अप्रैल 2022 से चीन से आयात की जाने वाली सौर ऊर्जा निर्मित करने वाली प्लेट्स पर आयात शुल्क को बढ़ा दिया गया है ताकि भारतीय उद्योगपति इनका निर्माण भारत में ही करने के लिए प्रोत्साहित हो सकें। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना को भी लागू कर दिया गया है जिसके चलते देश में ही निर्माण की गतिविधियों का विस्तार होगा और कई उत्पादों का आयात भी कम होने लगेगा। 
भारत में वर्ष 2012 से लागू “पूर्वप्रभावी कर प्रणाली” को अभी हाल ही में समाप्त कर दिया गया है। इस घोषणा के बाद से तो अब उम्मीद की जा रही है कि विदेशी निवेशक भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित होंगे तथा वे भारत में आकर विनिर्माण इकाईयों की स्थापना करने लगेंगे एवं भारत में ही व्यापार करना पसंद करेंगे।

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