आर्य प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर द्वारा शुरू किया गया चतुर्वेद पारायण विश्व शांति महायज्ञ

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ईश्वर ने वेदों को संहिताबद्ध कर विषयों को प्रदान किया : आचार्य विद्या देव

ग्रेनो । (विपिन आर्य/ अजय आर्य) जहां पर स्थित गुरुकुल मुर्शदपुर में आर्य प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर की ओर से चतुर्वेद पारायण विश्व शांति महायज्ञ का शुभारंभ किया गया। जो कि 1 अगस्त से शुरू होकर 21 अगस्त तक चलेगा।


कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए आर्य जगत के सुप्रसिद्ध विद्वान आचार्य विद्यादेव ने कहा कि यज्ञ संसार का सर्वोत्तम कर्म है। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने वेदों को संहिताबद्ध करके अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ऋषियों को प्रदान किया। यह उस समय की घटना है जब चारों ऋषि पृथ्वी के गर्भ में थे। तब परमपिता परमात्मा ने उन चारों ऋषियों के अंतःकरण में वस्तुओं, पेड़ -पौधे ,वनस्पतियों ,औषधियों आदि के नामों के चित्र भी अंकित किये। जिससे वह उन्हें पहचान सके।
उन्होंने कहा कि यह परम सौभाग्य का विषय है कि हम जिस स्थान पर यज्ञ कर रहे हैं यहां पर कभी प्राचीन काल में यमुना नदी बही थी। जमुना के किनारे स्वाभाविक है कि उस समय ऋषियों के आश्रम रहे होंगे। अतः हम ऋषियों की उस पवित्र भूमि पर यज्ञ कर रहे हैं जहां उनकी सूक्ष्म आत्माएं आज भी विराजमान हैं और हमारे इस यज्ञीय कार्य की साक्षी बन रही हैं। निश्चित रूप से उनका आशीर्वाद हम सब के साथ है।
आचार्य श्री ने यज्ञ पर उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि पुण्य अर्जित करने के लिए यज्ञ पर अवश्य उपस्थित हों। क्योंकि इससे जीवन में पवित्रता और धार्मिकता का समावेश होता है। उन्होंने कहा कि भारत की वर्तमान दुर्दशा का कारण यही है कि हमारे लोगों ने यज्ञ की संस्कृति को छोड़ दिया है। आचार्य श्री ने कहा कि यज्ञ पर जब हम बलिवैश्वदेव यज्ञ के माध्यम से कुछ अन्न अग्नि को समर्पित करते हैं तो उसका अभिप्राय केवल यह है कि हमारे जीवन में दान की परंपरा बनी रहे और हम शेष जीवधारियों के जीवन के बारे में भी कुछ ना कुछ करते रहें।

देश की संस्कृति के रक्षक रामचंद्र जी थे पहले राष्ट्रपिता : डॉ राकेश कुमार आर्य

आर्य प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर के सौजन्य से चल रहे चतुर्वेद पारायण यज्ञ में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे राष्ट्रीय प्रेस महासंघ के अध्यक्ष डॉ राकेश कुमार आर्य ने अपने संबोधन में कहा कि वैसे तो परमपिता परमेश्वर ही किसी राष्ट्र का पिता होता है परंतु यदि देश में चल रहे प्रचलन को स्वीकार किया जाए तो देश के पहले राष्ट्रपिता मर्यादा पुरुषोत्तम राम थे। जिन्होंने राक्षस संस्कृति के प्रतीक रावण के साम्राज्य का समूल विनाश किया और उसका विनाश न केवल भारत से बल्कि चीन ,रूस और अमेरिका तक फैले उसके साम्राज्य को भी समाप्त करके किया।
श्री आर्य ने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम चंद्र जी महाराज का यह कार्य उस समय देश की वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए किया गया। जबकि आज के राष्ट्रपिता ने देश की वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए कोई काम नहीं किया। उनकी सरकार ने वेद, वैदिक संस्कृति ,भारतीयता और भारत से घृणा करना सिखाया । जिससे आज आजादी के 75 साल बाद देश बहुत अधिक दुर्दशा को प्राप्त हो गया है।
श्री आर्य ने अपने संबोधन में नागभट्ट प्रथम, नागभट्ट द्वितीय गुर्जर सम्राट मिहिरभोज और राव लूणकरण भाटी के ‘शुद्धि अभियान’ और ‘घर वापसी’ के महान कार्यों पर प्रकाश डाला और कहा कि इतिहास में इन महान शासकों को स्थान मिलना चाहिए। परंतु देश के पहले शिक्षा मंत्री ने मुस्लिम अत्याचारों का विरोध करने वाले इन महान शासकों को कहीं स्थान नहीं दिया। जिसके चलते वर्तमान सरकार को सारा इतिहास दोबारा लिखवाना चाहिए। श्री आर्य ने कहा कि आर्य समाज ने इन महान शासकों के शुद्धि अभियान को महान सन्यासी स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में आगे बढ़ाया था।

श्रावण माह का है विशेष महत्व : देव मुनि जी

इस अवसर पर आर्य समाज के लिए अपने जीवन को समर्पित करने वाले त्याग, तपस्या और सादगी की मूर्ति देव मुनि जी ने कहा कि श्रावण महीने का विशेष महत्व है, क्योंकि इसमें वैदिक कथाओं का प्रचलन प्राचीन काल से होता आया है । उन्होंने कहा कि ऋषि मुनि जब चातुर्मास में अपने आश्रमों से गांवों के पास आ जाया करते थे तो उस समय वह वेद की कथाओं का आयोजन किया करते थे उसी से आजकल की होने वाली कथाओं का प्रचलन समाज में रूढ़ हो गया। उन्होंने कहा कि अब हमें वैदिक कथाओं के माध्यम से लोगों को फिर अपने वैदिक आदर्शों की ओर लौटाने की आवश्यकता है। उसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए इस चतुर्वेद पारायण यज्ञ का आयोजन किया गया है।
कार्यक्रम का सफल संचालन कर रहे आर्य युवा नेता आर्य सागर खारी ने कहा कि आज के युवाओं को अपना जीवन समर्पित कर वैदिक संस्कृति के लिए लगाना चाहिए। क्योंकि आज देश और धर्म के लिए अभूतपूर्व संकट उत्पन्न हो गया है। उन्होंने कहा कि जब तक युवा वेदों की ओर नहीं लौटेगा तब तक भारत का कल्याण नहीं हो सकता।
इस अवसर पर जयप्रकाश आर्य, जयराज आर्य, रविंद्र दरोगा, बाबूराम आर्य, हरि महाशय, अनार आर्य, नेत्रपाल आर्य, यशपाल आर्य, दिवाकर आर्य ,विजेंद्र आर्य आदि आर्यजनों ने यज्ञ में आहुति देकर धर्म लाभ प्राप्त किया।

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