विपक्षी एकता के अपने मिशन में कितना सफल हो पाएंगी ममता बनर्जी ?

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ललित गर्ग –
तृणमूल कांग्रेस की सुप्रिमो ममता बनर्जी इनदिनों दिल्ली में हैं और वे अभी से साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के सन्दर्भ में विभिन्न राजनीतिक दलों को संगठित करने एवं महागठबंधन की संभावनाओं को तलाशने में जुटी हंै। माना जा रहा है कि वो ऐसे दलों को एक मंच पर साथ लाने की कोशिश में लगी हैं, जिनके समान विचार हैं, समान लक्ष्य हैं और जो नरेन्द्र मोदी सरकार को बेदखल करना चाहते हैं। विपक्षी एकता की संभावनाओं को आकार देेने एवं उससे भारत की राजनीति में बड़े बदलाव को देखने की आशा करते हुए ममता विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रमुखों से मिल रही हैं, उनके इन प्रयासों के गहरे राजनीतिक निहितार्थ है। लोकतन्त्र में राजनीतिक परिस्थितियां प्रायः बदलती रहती हैं, इन्हीं बदलाव की आहट को ममता शायद देख भी पा रही हैं और सुन भी पा रही हैं। भले विपक्षी एकता अभी दिवास्वप्न हो, असंभव प्रतीत हो, लेकिन लोकतंत्र में कुछ भी संभव है। यदि ऐसा संभव हुआ तो यह भारतीय जनता पार्टी की सशक्त जमीन में सेध लगाना होगा। लेकिन ऐसा होना संभव नहीं लग रहा है, क्योंकि भाजपा की जमीन बहुत मजबूत हो चुकी है, बिना ठोस नीति एवं नीयत के नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह से मुकाबला करना आसान नहीं है।
विपक्षी एकता को बल देने के इरादे से किये जा रहे प्रयासों में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कितना सफल होंगी, यह समय ही बताएगा, लेकिन उन्हें जिस तरह विपक्षी दलों को गोलबंद करने वाली संभावित नेता के तौर पर देखा जा रहा है, वह कांग्रेस की दयनीय दशा को बयान करने के लिए पर्याप्त है। राष्ट्रीय दल होने के नाते विपक्षी एकता का जो काम कांग्रेस को करना चाहिए, वह यदि किसी क्षेत्रीय दल को करना पड़ रहा है तो इससे कांग्रेसी नेतृत्व की कमजोरी का ही पता चलता है। लोकतंत्र में राष्ट्रीय दल कांग्रेस का लगातार निस्तेज होते जाना शुभ नहीं है। क्या जो काम कांग्रेस नहीं कर सकी, उसे तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी कर सकेंगी? इस सवाल का जवाब बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि वह राष्ट्रीय दृष्टिकोण का परिचय दे पाती हैं या नहीं?
क्षेत्रीय दलों के नेताओं और विशेषतः ममता के साथ यह एक बुनियादी समस्या है कि वे अपने राज्य के आगे और कुछ देख ही नहीं पाती है। राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर उनका रवैया संकीर्णता से भरा और राष्ट्रहित की अनदेखी करने वाला है। ममता से जुड़ी एक और विडंबना है कि वह राष्ट्रीय नेता तो बनना चाहती हैं, साथ ही साथ बंगाल में बढ़ती हिंसा, अराजकता एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के अवमूल्यन की घटनाओं से स्वयं को दोषमुक्त साबित करती रहती है। ममता बनर्जी की मानें तो बंगाल में चुनाव बाद कहीं कोई राजनीतिक हिंसा नहीं हुई और इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट फर्जी है। ममता चाहे जो दावा करें, लेकिन हिंसा एवं अराजकता की राजनीति से उनकी साख गिरी है, राजनीतिज्ञों की साख गिरेगी तो राजनीति की साख बचाना भी आसान नहीं होगा। हमारे पास राजनीति ही समाज की बेहतरी का भरोसेमंद रास्ता है इसकी साख गिराने वाले कारणों में हिंसा, अपराधीकरण एवं साम्प्रदायिकता के बाद बेवजह की कीचड़ उछाल का भी है। ये चारों ही राजनीति के औजार नहीं हैं, इसलिये राजनीति को तबाही की ओर ले जाते हैं। ममता बंगाल को जिस तरह संचालित कर रही हैं, उससे यह नहीं लगता कि वह राष्ट्रीय राजनीति को कोई सही दिशा एवं दशा दे सकेंगी।
प्रांतीय राजनीति एवं केन्द्र की राजनीति का गणित भिन्न होता है। विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी की शानदार जीत से उत्साहित तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में कुछ अनोखा घटित कर सकेगी, इस विश्वास के साथ उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए विपक्षी एकता का आह्वान किया है। लेकिन उनकी राजनीति सोच एवं दिशाओं में इतना दम दिखाई नहीं देता कि वे विपक्षी नेताओं से मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के वास्ते एकजुट होने और ’गठबंधन’ के गठन की दिशा में कुछ सार्थक कर सकने में सफल हो सके।
जाहिर है, आज यदि तृणमूल कांग्रेस को मोदी और अमित शाह की बीजेपी का सामना करते हुए प्रभावी राष्ट्रीय स्थान पाना है तो उसे विचार, व्यवहार और व्यक्तित्व तीनों स्तरों पर परिवर्तन करना होगा। इसमें नेतृत्व की भूमिका सर्वोपरि होगी। बड़ा प्रश्न है कि विपक्षी महागठबन्धन का नेतृत्व कौन करेगा? इस नेतृत्व के रूप में ऐसा व्यक्तित्व चाहिए, जो वर्तमान भारत की बदली हुई मनोदशा और मोदी के कारण पैदा हुई राजनीतिक परिस्थिति को समझे और उसके अनुरूप सभी स्तरों पर विपक्षी एकता का निर्माण करें। महागठबंधन में इतनी समझ हो कि योग्य और सक्षम व्यक्तियों का चयन कर सामूहिक नेतृत्व विकसित करे।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विपक्षी एकता के मजबूत होने का अर्थ है लोकतंत्र का मजबूत होना। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्षी दलों का सशक्त होना जरूरी है, भारत दुनिया का सबसे बड़ा संसदीय लोकतन्त्र कहलाता है, अतः इसमें जो भी बदलाव आता है वह जनता जनार्दन की इच्छा एवं अपेक्षाओं के वशीभूत ही होता है। जनता ही है जो राजनीतिक दलों की भूमिका बदलती रहती है। इसलिए ममता जो भी प्रयास कर रही हैं वह लोकतन्त्र में और अधिक जिम्मेदारी पैदा करने व जवाबदेह बनाने के लिए ही होने चाहिए। विपक्षी एकता तभी प्रभावी और सार्थक हो सकती है जब वह आम आदमी से जुड़े वास्तविक मुद्दों को उभार सके। आम जनता की समस्याओं के समाधान के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता को मजबूती दे सके।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने निश्चित रूप से ममता की ताकत को दिखाया है और उसी के बल पर विपक्षी खेमे का हौसला बढ़ा है। ममता अपने बल पर 2024 लोकसभा चुनावों में सत्तारूढ़ बीजेपी और एनडीए को हराने का सपना यदि पालती है तो यह अतिश्योक्ति ही कही जायेगी। लोकसभा चुनाव से पहले यूपी एवं अन्य प्रांतों के विधानसभा चुनाव में खासी जोर-आजमाइश होगी और भविष्य की विपक्षी एकता की तस्वीर भी सामने आयेगी। विपक्षी दलों की ताकतें जो बीजेपी को सत्ता से बाहर देखना चाहती हैं, अगर आपस में संवाद और समन्वय के सूत्र मजबूत करने में जुटती हैं तो वे मिलकर भविष्य की राजनीति में बड़ा बदलाव करने का माध्यम बन जाये, इसमें आश्चर्य की कोई बात भले न हो, महत्वपूर्ण जरूर है।
अक्सर ऐसे छोटे-छोटे प्रयासों का बड़ा नतीजा निकलता आया है। दिक्कत बस यह है कि विपक्ष की एकजुटता या उनमें समन्वय का लक्ष्य महज बातचीत से हासिल नहीं होने वाला, उसके लिये त्याग, दूरगामी सोच, ठोस मुद्दे एवं राजनीतिक परिवक्वता जरूरी है। इस प्रक्रिया में शामिल तमाम छोटी-छोटी पार्टियां और नेता अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन का विस्तार करने एवं अपनी जमीन को मजबूत करने में जुटे रहने से यह लक्ष्य हासिल नहीं होगा। उन्हें विपक्षी एकता को मजबूती देने का मकसद भी साथ में लिए चलना होगा। एक मुख्य पहलु है कि विपक्षी एकता का रथ केन्द्र में सत्ता परिवर्तन कर सकता है तो वह है कांग्रेस को इस विपक्षी एकता का आधार बनाना। अन्यथा त्रिकोणात्मक राजनीति का लाभ भाजपा को ही मिलेगा।
विपक्षी दलों के महागठबन्धन का नेतृत्व कांग्रेस यदि करती है तो वह अपनी खोयी जमीन को पुनः पा सकती है। असल में 2013 से कांग्रेस की पराजय का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो कभी थमा ही नहीं। सबसे लंबे समय तक देश का शासन चलाने वाली पार्टी को लगातार दो लोकसभा चुनावों में विपक्ष का नेता पद पाने लायक सीटें भी न मिलें तो हताशा स्वाभाविक है। इस हताशा एवं निराशा को दूर करने एवं विपक्षी एकता को सार्थक करने के लिये कांग्रेस को आगे आना चाहिए, ममता की तुलना में उसका नेतृत्व अधिक प्रभावी हो सकता है। महागठबंधन की सफलता इसी बात पर निर्भर है कि इसमें ठोस विकल्पों की जनता के सामने प्रभावी प्रस्तुति होनी चाहिए। ममता को महागठबंधन की संभावनाओं से पहले जनता से जुड़े ठोस मुद्दों की तलाश करनी चाहिए। यही वह राह है जिस पर चलकर विपक्षी एकता सफल भी हो सकती है और सार्थक भी। इसी से लोकतंत्र को मजबूती भी मिल सकती है।

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