बदलते हुए बिहार को समझना होगा – एनके सिंह

चुनाव आयोग के एक सर्वे के अनुसार बिहार के 80 प्रतिशत मतदाताओं का मानना है कि पैसे या गिफ्ट लेकर मतदान करने में कोई बुराई नहीं है। कोई 4500 से अधिक लोगों के सैंपल साइज के आधार पर किए गए इस सर्वे का निष्कर्ष राज्य के चुनाव तंत्र के लिए एक चुनौती बन गया है। कोई ताज्जुब नहीं कि बिहार में चुनाव की घोषणा के बाद से अभी तक 16 करोड़ रुपए, 8300 लीटर शराब और साढ़े आठ किलो सोना बरामद हो चुका है। किसी समाज में भ्रष्टाचार को लेकर अगर सहिष्णुता का यह भाव हो तो समझा जा सकता है कि चुनावी संवाद किस स्तर तक जा सकता है और नेताओं के लिए तार्किक या नैतिक मानदंडों को ठेंगा दिखाना कितना सहज हो सकता है।

भ्रष्टाचार के आरोप में सजा पाए राजद नेता लालू प्रसाद यादव कहते हैं कि उनके दोनों पुत्रों ने जो उम्र लिखवाई है उसका आधार मतदाता सूची में दर्ज उम्र है। हकीकत यह है कि अगर मतदाता सूची या किसी सरकारी दस्तावेज में कोई टंकण संबंधित या मानवीय गलती तथ्यों को लेकर दिखाई देती है तो उसे ठीक कराना संबंधित नागरिक की जिम्मेदारी होती है। अगर लालू के तर्क को आधार बनाया जाए तो पुलिस के दस्तावेजों के हिसाब से या अदालत के फैसले के मुताबिक वे भ्रष्टाचार के दोषी हैं, लेकिन उन्होंने उसे गलत ठहराते हुए ऊपर की अदालत में अपील की है।

एक अल्पशिक्षित समाज में तर्क पर भावनाएं भारी पड़ती हैं। लिहाजा मायावती इस आधार पर उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतती हैं कि उनका जन्मदिन किसी सम्राज्ञी की तरह मनाया जाता है। उनके मतदाताओं, खासकर दलितों को यह देखकर सशक्तीकरण की झूठी चेतना का अहसास होता है। अगर इस वर्ग के नेताओं पर वही भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं जो किसी उच्च जाति के नेता पर लगे तो इससे भी उसे सशक्तीकरण का ही अहसास होता है।

भावनात्मक आधार पर जनमत को मोडऩा किसी अर्धशिक्षित समाज में तो चलता है, लेकिन जैसे-जैसे समाज में शिक्षा बढ़ती है, आर्थिक आय में इजाफा होता है और इन दोनों के कारण तर्कशक्ति भावना से हटकर बौद्धिक स्तर का सहारा लेने लगती है तो वह व्यक्ति सोचने लगता है कि हमारा नेता भी उसी स्तर का भ्रष्ट हो गया, जिस स्तर का उच्च वर्गीय नेता दशकों से था। उसे इससे भी शक्ति मिलती है कि अधिकतर एसपी और डीएम अपनी जाति से हैं और जहां तक सडक़ का सवाल है, वह तो न तब बनी, न आज बनी। न नौकरी तब लगी, न आज लगी।

किसी समाज या पहचान समूह में नीचे जितनी चेतना-शून्यता होगी, उतनी ही इस तरह की राजनीति के जिंदा रहने की मियाद होगी। लिहाजा कोई मायावती इस सशक्तीकरण की झूठी चेतना वाली राजनीति को 25-30 साल चला सकती है तो कोई मुलायम या लालू 10 से 15 साल, लेकिन कोई मायावती, लालू या मुलायम इसे मियाद से ज्यादा खींचेंगे तो उनका आधार कम होने लगेगा। भैंस की पीठ पर बैठना, चुनाव के दौरान हेलिकॉप्टर से किसी सुदूर गांव में उतरना व गांववसियों को बताना कि सडक़ और पुल बना देंगे तो अफीम की अवैध खेती नहीं कर पाओगे, क्योंकि अफसर तब धड़ाक-धड़ाक छापा मारेगा, और कहकर वोट हासिल करना पांच-दस साल तो चलता है, इससे अधिक नहीं।

कुछ साल पहले राघोपुर के एक गांव में लालू उडऩखटोले से उतरे और तीन वाक्यों का चुनावी भाषण दिया। उन्होंने पूछा कि अब जब तुम नदी में जाल डालते हो मछली पकडऩे के लिए तो कोई सरकारी कर्मचारी तो मना नहीं करता? भीड़ ने जवाब दिया: ना साहेब। नेता का दूसरा सवाल था, जब ताड़ी के पेड़ पर चढक़र ताड़ी उतारते हो तो कोई टैक्स तो नहीं लेने आता? भीड़ ने उसी उत्साह से जवाब दिया : ना साहेब। नेता का तीसरा और अंतिम चुनावी वाक्य था : बस मौज करो, मछली मारो और ताड़ी पियो। उस समय वहां से चुनाव में जबरदस्त सफलता मिली थी, लेकिन उसी नेता की पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री उसी विधानसभा क्षेत्र से 2010 में चुनाव हार जाती हैं, क्योंकि अब उसे केवल अवैध मछली और ताड़ी नहीं, उसके बच्चे को नौकरी चाहिए, अस्पताल चाहिए, सडक़ चाहिए। चेतना, तर्कशक्ति और अपेक्षाएं झूठे सशक्तीकरण के अहसास से काफी ऊपर चली गई हैं।

आज लाखों यादव युवाओं से यह नहीं कहा जा सकता कि तुम तो भैंस की पीठ पर बैठकर शक्ति का अहसास करो और हम बीएमडब्ल्यू कार में चलेंगे। यादव मतदाता विकल्प की तलाश पिछले दस साल से कर रहा है, लेकिन लालू अभी भी पहचान नहीं पा रहे हैं। उन्हें यह नहीं समझ में आ रहा है कि पहचान समूह की चेतना परिवर्तित होती रहती है, लिहाजा राजनीतिक संदेश की विषय वस्तु और संप्रेषण का तरीका भी बदलना पड़ता है। साम्यवादियों ने यही नहीं समझा वर्ना भारत से ज्यादा बेहतर देश साम्यवाद के पनपने के लिए दुनिया में कोई दूसरा नहीं हो सकता था।

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