कभी कोटरा की मनभावन चुनरियों की मांग नेपाल तक थी

जालौन जिला सफेद और मुलायम कपास उत्पादन करने के लिए विशेष रूप से जाना जाता था। इसका श्रेय जिले की मिट्टी को जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार 1830 के पहले कपास का 40 लाख रुपये का सरकारी तरीके से तथा 18 लाख रुपए का व्यक्तिगत तरीके से व्यापार हुआ था।

एक और चीज की खेती जिले मे बडे भारी पैमाने मे की जाती थी वह थी AL की ।चौंक गए न ‘अल’ पढ कर। मैं भी बहुत चौंका था। यह नाम ही नही सुना था। न कभी पहले सुना था और फिर न कभी बाद में ही इसकी खेती के बारे में सुना। मित्रों से भी कोई मदद जब नही मिल सकी तब डिक्शनरी उठाई।

पता चला कि वनस्पति विज्ञान मे इसका नाम Morinda Citrifolia है और इसका उपयोग लाल रंग के बनाने मे किया जाता था। नेचुरल रेड डाई कह सकते हैं। इसके एक्सपोर्ट भी जिले से बाहर किया जाता था। वह भी थोडी मात्रा मे नही बहुत भारी मात्रा में………

Al की खेती कैसे की जाती थी। जिले मे कितनी होती थी। फिर बंद क्यों हो गई इस सबके विवरण उपलब्ध हैं। लेकिन अगर वह लिखने लगा तो कोटरा की चुनरियां रह जायगी…..

अब जब जिले में कपास और रंग दोनों ही मटेरियल उपलब्ध है और उनका एक्सपोर्ट जिले से बाहर किया जा रहा है तो ऐसे कैसे हो सकता है कि जिले मे इनका उपयोग न होता हो। जी जरूर होता था न।

सैदनगर और कोटरा में। तो आइए मेरे साथ सैदनगर और कोटरा की संक्षिप्त यात्रा में चलें और देखें कि यहाँ पर क्या घरेलू उद्योग धंधे थे……..

अगर इसको शोध लेख की तरह पेश करूंगा तो मेरी विद्वता तो झलकेगी मगर आपको पढने मे मजा नही आयगा। संदर्भ और डेटा पोस्ट को बोझिल कर देगी। तो सीधे – सीधे एक किस्सागोई ही ठीक रहेगी।

सैदनगर में बहुत अच्छा कपडा बनता था। जब अच्छी कपास जिले में थी तो कपडा भी अच्छा ही बनता था। और इतना बनता था कि एक वर्ष में एक लाख पचीस हजार रुपए मूल्य का कपडा बनने लगा। कपड़े की रंगाई और छपाई का काम भी उच्चकोटि का होता था।

कल एक मित्र ने पूछा था कि सैदनगर और कोटरा एक साथ ये नाम हमेशा पढने में मिलते हैं। जरूर मिलते हैं। चोली दामन का साथ है दोनों का यह तो मुझे भी लगता और दिखता भी है। फिर देखिए….

कोटरा की छपी हुई मनभावन चुनरियां दूर – दूर तक प्रसिद्ध थीं। यह भी जानकारी दे दूँ तो आश्चर्य न करिएगा कि 1870 में कोटरा से दस हज़ार रुपयों का चुनरियों का व्यापार एक्सपोर्ट के रूप में हुआ था। और ये चुनरियां राठ, झांसी से लेकर आगरा जैसे दूर स्थानों तक भेजी गई थीं।

सैदनगर में स्थानीय कपड़े के लिए दो शब्द मुझे अंग्रेजी भाषा में मिले। एक जमुरदी और एक एइकरी। अंग्रेजी मे जो स्पेलिंग है वह भी पढना किसी शोध से कम नहीं है। पता नहीं कि मैं सही समझ सका कि नही। मैं यही शब्द प्रयोग करूंगा। स्थानीय मित्र सही कर के पढ सकते हैं।
सैदनगर की कपड़े को एइकरी नाम से पुकारा जाता था।

इस कपड़े की लंबाई साढ़े छह गज और चौड़ाई दो गज की होती थी। इसको पहले रंग उडा कर विरंजित किया जाता था। फिर इसको एक हफ्ते तक रोज अरंडी के तेल और उसमे रस्सी या खारी मिट्टी मिला कर मला जाता। एक हफ्ते बाद इसको भलीभांति धोया जाता फिर इसको हारा के घोल में डुबाया जाता। सूख जाने पर गेरू, गोंद, फिटकरी और पानी के पेस्ट से छपाई की जाती। इसके बाद इस कपड़े को फिर धोया जाता।

अब एक भाग धवई फूल, ढाई भाग अल के पाउडर में लगभग छह घंटे उबालकर फिर से हल्के से धोया जाता।
अब एक सेर चूना और डेढ सेर गोंद के पेस्ट से फिर छपाई होती। धोकर कपड़े को फिर सुखाया जाता।अभी पूरा काम नही हुआ है।

अब दस सेर नउटी की लकड़ी, वह भी जैतपुर के जंगल में मिलने वाली, ढाई सेर अनार की छाल ढाई सेर फिटकरी के घोल में इस कपड़े को डुबाया जाता। सुखा कर गेरू और गोंद के पेस्ट से फिर से बचे खाली भाग में छपाई की जाती।

अंत में इस छपे कपड़े को दो बार नील के घोल में डुबा कर गोंद का कलफ लगाया जाता। अब यह तैयार है।
यह भी जान लीजिये इस कपड़े की डिमांड पडोसी देश नेपाल तक में थी।
यह है कोटरा सैदनगर।
खोजें तो।
✍🏻आदरणीय देवेन्द्र सिंह जी से साभार

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