सामवेद उपासना तथा समरसता उत्पन्न करने वाला वेद है : आशीष दर्शनाचार्य

IMG-20201104-WA0002

ओ३म्

===========
वैदिक विद्वान आचार्य आशीष दर्शनाचार्य ने वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून में चल रहे सात दिवसीय सामवेद पारायण एवं गायत्री यज्ञ के पश्चात अपने सम्बोधन में कहा कि हम सबको मिल बैठकर सामवेद की भावना के अनुसार संगीत व एकरसता को उत्पन्न करना चाहिये। हमें सामवेद को समझने का प्रयास भी करना चाहिये। सामवेद संगीत का वेद है जो जीवन में भक्ति संगीत को उत्पन्न करता है। मनुष्य वेदों के मन्त्रों के सत्य अर्थों को जानकर जब उसके अनुसार प्रयत्न करता है तब वह सामवेद के अध्ययन मे भी प्रवृत्त होता है। आचार्य जी ने श्रोताओं से पूछा कि साम-गान का आपने नाम सुना होगा परन्तु साम-गान होता क्या है? यह बहुत से वेद प्रेमियों को पता नही है। उन्होंने कहा कि हमें सामवेद से परिचित होना चाहिये। इससे परिचित होने पर हम सामगान से भी परिचित हो सकेंगे। आचार्य जी ने कहा कि सामवेद का अर्थ जीवन में समता व सन्तुलन बनाना है। वह ज्ञान जिससे यह कार्य सम्पन्न होता है उस ज्ञान को सामवेद कहते हैं।

आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी ने कहा कि जो ज्ञान जीवन में समरसता ले आये, जो जीवन में सन्तुलन स्थापित कर दे, वह ज्ञान सामवेद होता है। सामवेद शब्द की व्युत्पत्ति को भी संस्कृत व्याकरण के नियमों के अनुसार आचार्य जी ने समझाया। आचार्य जी ने आगे कहा कि ऐसा ज्ञान जो मन की अशान्ति व दुःख को हर ले, वह सामवेद कहलाता है। सामवेद का ज्ञान मन को ईश्वर भक्ति व प्रेम में स्थापित करता है। आचार्य जी ने कहा कि कुल चार वेद हैं जिसमें तीसरा वेद सामवेद है। यह वह सत्य ज्ञान है जो ईश्वर ने सृष्टि के आदि काल में चार ऋषियों को दिया था। यह चार वेद वही ज्ञान है जिससे जीवन में समरसता तथा सन्तुलन उत्पन्न होता है। सामवेद के अध्ययन व अभ्यास से मनुष्य के मन की अशान्ति दूर हो जाती है और मन ईश्वर की भक्ति करने में प्रवृत्त होता है। ऐसे ज्ञान को सामवेद कहते हैं।

वेदों के विद्वान आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी ने बताया कि सामवेद में 1875 मन्त्र हैं। उन्होंने कहा कि हर ग्रन्थ की एक रुपरेखा होती है। ऋषि दयानन्द लिखित ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश की भी अपनी रुपरेखा है। सत्यार्थ-प्रकाश ग्रन्थ का आरम्भ भूमिका से होता है। इसके बाद 14 समुल्लास हैं तथा इसके अनन्तर निष्कर्ष जिसे ग्रन्थ का सार भी कह सकते हैं, वह प्रस्तुत किया गया है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के निष्कर्ष को51 परिभाषायें प्रस्तुत कर दिया है। इस निष्कर्ष को ‘स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश’ कहते हैं। इसी प्रकार से हमें सामवेद की रुपरेखा को भी समझना चाहिये। आचार्य जी ने कहा कि सामवेद में आर्चिक हैं। उन्होंने कहा कि जिसका अध्ययन किया जाता है उन्हें अध्याय कहते हैं। पाठ उसे कहते हैं जिसे पढ़ा जाता है। समुल्लास उसे कहते हैं जो प्रसन्नता व उल्लास उत्पन्न करता है। सत्यार्थप्रकाश के समुल्लास प्रश्नोत्तर की शैली में हैं। आचार्य जी ने कहा जो प्रश्न समय समय पर हमारे मन में उठते रहते हैं परन्तु जिनका अन्यत्र समाधान नहीं होता, उनका उत्तर हमें सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में मिलता है।

दर्शनों के आचार्य आशीष जी ने कहा कि मनुष्य को सत्य जानने की जिज्ञासा हेाती है। मनुष्य के जीवन में संशयों का होना सामान्य बात है। उन्होंने कहा कि संशय रूपी सीढ़ी को जो ठीक से पार कर लेता है वह निःशंक होकर सत्य ज्ञान को प्राप्त होता है। जब हम किसी विषय का अध्ययन करते हैं तो हमें उस विषय में कुछ शंकायें होती हैं। इसे दूर करने के लिये हमें विषय की गहराई में जाना पड़ता है। ऐसा करके हमारे संशय कम होते हैं व कुछ शेष रह जाते हैं। इनका निवारण वेद व सत्यार्थप्रकाश जैसे सद्ज्ञान के ग्रन्थों से होता है। संशय होने पर हम उनका समाधान ढूंढते हैं। इससे हम जीवन में आगे बढ़ते हैं। संशयों को दूर करना मनुष्यों के लिए आवश्यक होता है। गीता नामक ग्रन्थ में कहा गया कि जिस मनुष्यों को संशय होते हैं परन्तु उसको उनका समाधान प्राप्त नहीं होता, वह मनुष्य नष्ट हो जाता है। ऋषि दयानन्द लिखित सत्यार्थप्रकाश एक ऐसा ग्रन्थ हैं जिसमें हमें अपने प्रायः सभी संशयों का समाधान मिलता है। संशयों के उत्तर हमारे हृदय व आत्मा में उल्लास पैदा करते हैं। ऐसा ही उल्लास हमें सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन करने से प्राप्त होता है। इसी कारण से ऋषि दयानन्द ने अध्याय या पाठ के स्थान पर समुल्लास शब्द का प्रयोग किया है।

आचार्य आशीष जी ने कहा कि सामवेद में प्रयुक्त होने वाले ‘आर्चिक’ शब्द को भी हमें समझना है। उन्होंने कहा कि वेदमन्त्रों को ऋचा कहते हैं। ऋचा शब्द से ही आर्चिक शब्द बना है। आर्चिक ऋचाओं व मन्त्रों का समूह होता है। आचार्य जी ने कहा कि सामवेद में तीन आर्चिक हैं जिनके नाम हैं पूर्वाचिक, महानाम्नी आर्चिक तथा उत्तरार्चिक। महानाम्नी आर्चिक में मात्र10 वेद मन्त्र ही हैं। आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी ने आगे कहा कि सामवेद भक्ति तथा उपासना विषयों का वेद हैं। आचार्य जी ने सामवेद के प्रथम मन्त्र का उल्लेख किया और बताया कि सामवेद का प्रथम मन्त्र है ‘अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि।।’ उन्होंने कहा कि हम सबको यह पूरा मन्त्र अथवा इसके प्रथम तीन पद ‘अग्न आ याहि’ तो स्मरण होने ही चाहियें। आचार्य जी ने कहा कि मनुष्य को परीक्षा के भय से ऊपर उठना चाहिये। उन्होंने कहा कि जब श्रोताओं को वक्ता यह कहते हैं कि वह जो विषय प्रस्तुत कर रहे हैं उस पर वह बाद में प्रश्न पूछेंगे तो इससे श्रोता भयभीत हो जाते हैं। आचार्य जी ने कहा कि सामवेद का अध्ययन करने वाले मनुष्यों का भय समाप्त होता है और उनमें समरसता आती है। उन्होंने कहा कि सामवेद मन की अशान्ति को दूर कर मनुष्य को परमात्मा की भक्ति में लगाता है। आचार्य आशीष जी ने कहा कि हमें अपने मन की अशान्ति को दूर करने के लिये सामवेद का अध्ययन करना होगा।

दर्शनाचार्य आचार्य आशीष जी ने कहा कि जब मन की स्थिति बाहरी बातों पर निर्भर करती है तो उसे सांसारिक अवस्था कहा जाता है। जिस मनुष्य के मन पर बाहरी बातों का प्रभाव नहीं पड़ता अपितु वह अपनी आत्मा पर निर्भर होता है, उस स्थिति को मन की आध्यात्मिक स्थिति व दशा कहलाती है। मन को जैसा चाहें वैसा रखने की स्थिति को मन की आध्यात्मिक अवस्था कहते हैं। आचार्य जी ने बताया कि पूर्वार्चिक में चार पर्व या खण्ड हैं। पर्व जोड़ को कहते हैं। इसके लिये आचार्य जी बांस का उदाहरण दिया। बांस में अनेक पर्व वा ग्रन्थियां होती है। सामवेद का प्रथम पर्व आग्नेय पर्व है। आग्नेय शब्द अग्नि शब्द से जुड़ा हुआ है। इस पर्व के मन्त्रों का विषय जिसे देवता कहते हैं, वह अग्नि है। आचार्य जी ने स्पष्ट किया कि मन्त्र के विषय या सबजेक्ट को मन्त्र का देवता कहते हैं। इसी के साथ आचार्य आशीष जी ने अपना व्याख्यान समाप्त किया। कार्यक्रम का संचालन कर रहे आर्य विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी, हरिद्वार ने आचार्य जी के व्याख्यान की प्रशंसा की। सत्यार्थी जी ने उपासना का एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि अकबर तानसेन की गायन कला से प्रसन्न था। उसने उसे उनके गुरु पं. हरिदास जी का गीत सुनवाने को कहा। इसके लिए तानसेन अकबर को जंगल में अपने गुरु की कुटिया के समीप ले गया। गुरुजी ईश्वर की ठभक्ति में मग्न थे। तानसेन ने कोई गुरु जी से संगीत सुनने के लिए एक बेसुरा गीत गाना आरम्भ किया जिसे सुनकर उनके गुरु का ईश्वर में ध्यान भंग हो गया। इस बेसुरे गीत से उन्हें पीड़ा हुई। उन्होंने तानसेन को उसकी गलतियां बताकर ईश्वर भक्ति का एक अत्यनत प्रभावशाली गीत गाकर सुनाया। अकबर गीत सुनकर प्रसन्न हुआ। अकबर ने तानसेन को कहा कि तुम्हारें गीतों में वह भक्तिरस नहीं होता जो तुम्हारे गुरु के गीत में था। इस पर तानसेन बोला कि महाराज मैं अकबर का गवैय्या हूं जबकि मेरे गुरु हरि दास जी ईश्वर के दरबार के गवय्ये हैं। उनका गीत तो मेरे गीत से सर्वोत्तम होगा ही।

आचार्य आशीष जी के सम्बोधन से पूर्व आश्रम में चल रहा सात दिवसीय सामवेद पारायण एवं गायत्री यज्ञ किया गया जिसके ब्रह्मा स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी थे। वेद मन्त्रपाठ गुरुकुल पौंधा-देहरादून के ब्रह्मचारियों ने किया। यज्ञ की समाप्ति पर स्वामी जी ने सब यज्ञ प्रेमी भक्तों की ओर से ईश्वर से सामूहिक प्रार्थना की। उनके कुछ शब्द थे‘संसार में परमात्मा ने सुन्दर व्यवस्था की है। हमारी आवश्यकता के सभी पदार्थ हमें प्रचुर मात्रा में परमात्मा की की हुई व्यवस्था से प्राप्त हो रहे हैं। हम आपका कोटि कोटि नमन व वन्दन करते हैं। हम ईश्वर से जन-जन के कल्याण की कामना करते हैं। कोरोना रोग की चर्चा करते हुए स्वामी जी ने ईश्वर से कहा कि वह हम सबको इस रोग से मुक्त रखे। हमारा देश भी इस रोग से मुक्त हो। हम लोग ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान से लाभ उठायें और अपने अपने जीवन को वेदमय बनायें। वेदों को भुला कर हमने व हमारे पूर्वजों ने अतीत में बहुत दुःख उठायें हैं। हम ईश्वर को भूल गये थे। इससे देश देशान्तर में अव्यवस्था फैल गई थी। स्वामी जी ने इस स्थिति मे ंऋषि दयानन्द के आविर्भाव का उल्लेख किया। ऋषि दयानन्द ने अनेक बार जहर पीकर भी वेदों के सत्य ज्ञान का जन जन में प्रचार किया। लोगों ने ऋषि का कार्य पूरा होने से पहले ही उन्हें हमसे दूर कर दिया। स्वामी जी ने सब श्रोताओ को वेदों का आचरण करने की प्रेरणा की। उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यों की सराहना की तथा उन्हें मंगलकामनायें दी। स्वामी जी ने कहा कि हमारी सेनायें देश की रक्षा करने में समर्थ हों। ईश्वर से उन्होंने कहा कि हम व हमारा देश सभी क्षेत्रों में उन्नति करे। यह देश हमारा व हम सबका देश है। परमात्मा की कृपा व दया से हम सबके शरीर निरोग व बलवान हों। सबका मंगल व कल्याण हो। स्वामी जी ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः कहकर ईश्वर से अपनी प्रार्थना को विराम दिया।’ इसके बाद श्री रमेशचन्द्र स्नेही, हरिद्वार तथा श्री नरेशदत्त आर्य, बिजनौर के कई मधुर गीत व भजन हुए। बड़ी संख्या में श्रोतागण आयोजन में उपस्थित थे। शान्ति पाठ के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

norabahis giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
mariobet giriş
betvole giriş
mariobet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
mariobet giriş
betpas giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
dedebet
betkanyon
radissonbet
casinofast
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
norabahis giriş
betwild giriş
redwin giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
redwin giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
realbahis giriş
realbahis giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
hilarionbet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
norabahis giriş
ikimisli giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş