हिंदू धर्म के दिग्विजय व्याख्याता युगदृष्टा विवेकानंद और उनका हिंदुत्व दर्शन-1

दिनेश चंद्र त्यागी
सन 1897 में स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी। इन सौ से अधिक वर्षों में शिक्षा स्वास्थ्य व आध्यात्मिक क्षेत्र में रामकृष्ण मिशन ने बहुत सराहनीय कार्य किया है, भारत में भी और भारत से बाहर भी । बहुत बड़ी संख्या में उत्कृष्ट विद्यालयों का संचालन तथा अस्पतालों की स्थापना करके ईसाई मिशनरियों द्वारा इस क्षेत्र में किये गये अतिक्रमण को विफल करने की सफल चेष्टा की है। इतना महान एवं अद़भुत कार्य करते करते परिस्थितियां यहां तक पहुंच गई कि रामकृष्ण मिशन ने स्वयं को हिंदू धर्म पोषक न मानकर मानवता की सेवा में समर्पित संस्था घोषित कर दिया। कलकत्ता उच्च न्यायालय में उसे अहिंदू बनने की सुविधा प्रदान भी कर दी गयी। अखिल भारत हिंदू महासभा ने इसके विरूद्घ उच्चतम न्यायालय में प्रतिवाद किया। अंतत: हिंदू महासभा की विजय हुई और रामकृष्ण मिशन को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हिंदू इतर मानने से असहमति व्यक्त करते हुए उसे हिंदू धर्म का ही अंग माना। इस प्रकार एक बड़ी दुर्घटना होने से बच गयी।
इस लेख में यह संदर्भ प्रस्तुत करने की चेष्टा की गयी है जब स्वामी विवेकानंद 1893 में शिकागो अमेरिका धर्म सम्मेलन में सम्मिलित हुए थे तो वहां उनका भाषण हिंदू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में ही हुआ था तथा आयोजकों ने मानव धर्म नाम के किसी धर्म को वहां आमंत्रित ही नही किया था। स्वामी जी ने अपने उद्बोधन से यह सफलता पूर्वक सिद्घ कर दिखाया था कि हिंदू धर्म ही मानवता की सेवा का सर्वोत्कृष्ट माध्यम है। स्वामी विवेकानंद द्वारा अमेरिका जाकर हिंदू धर्म का जयघोष करने से पूर्व उन परिस्थितियों पर ध्यान देना आवश्यक है जिनमें विदेशी चिंतकों द्वारा हिंदू धर्म को पतनोन्मुख सिद्घ करने की निकृष्ट योजनाएं बनाई जा रही थीं। उनमें से कुछ हिंदू विरोधी विचारों का उल्लेख यहां किया जा रहा है-
(1) प्रसिद्घ यूरोपियन इतिहासकार जेम्स गिल ने अपनी पुस्तक History of British India में लिखा-
Everything we know of the ancient state of Hindustan conspires to prove that it was rude. Further Hindu excels in the qualities of a slave and his moral character is very low.
हम प्राचीन हिंदुस्तान के विषय में जो भी जानते हैं वह उसे असभ्य ही दिखाता है। इसके अतिरिक्त हिंदू दासता के गुणों में अग्रणी है और उसका नैतिक चरित्र अत्यंत निकृष्ट होता है।
(2) More than half a century after the establishment of british rule in Bengal, Governor General, the Marquess of Hastings observed The Hindoo appears a being merely limited to animal functions, with no higher intellect than a dog and elephant or a monkey. Suich People can never be advanced in civil polity..
बंगाल में ब्रिटिश शासन स्थापित होने के बाद गवर्नन जनरल माकर््िवस ऑफ हेस्टिंग्ज ने टिप्पणी की हिंदू केवल पशु कर्मों तक सीमित दिखाई देता है, उसकी बुद्घि कुत्ते, हाथी या गधे से ऊंची नही होती। ऐसे लोग कभी वैधनिक राजयवस्था में उन्नत नही हो सकते।
(3) A German Scholar Hers Niese published a book in 1893 in which he proclamed, All developments of indian culture were derived from Alexanders Greece.
it is a curious coincidence that in the very year (1893) Swami Vivekanand proclaimed the superiority of Hindu culture in the parliament of Religions at chicago (USA) be fore an august assembly of representatives from all parts of the world, (Ref. Swami Vivekananda Centenary Memorial Volume R.C.M)
हर्ष नीस नामक जर्मन विद्वान ने 1893 में एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उसने घोषणा की भारतीय संस्कृतिक का सारा विकास सिकंदर के यूनान से प्राप्त किया गया है।
यह विचित्र संयोग है कि उसी वर्ष (1893) स्वामी विवेकानंद ने शिकागो यूएसए में आयोजित विश्व धर्म संसद में विश्व के सभी भागों से पधारे प्रतिनिधियों की महती सभा के समक्ष हिंदू संस्कृति की श्रेष्ठता को उद्घोषित किया। (संदर्भ : स्वामी विवेकानंद शताब्दी स्मारक ग्रंथ रमेश चंद्र मजूमदार सम्पादित)
हिंदुओं को अपमानित करके, उनके धर्म, दर्शन, इतिहास, परंपरा और श्रद्घा केन्द्रों को तिरस्कृत करके उनके मन में एक हीन ग्रंथि उत्पन्न करना जिससे कि वे स्थायी रूप से दास बन सकें और धर्म त्याग कर ईसाई बन सकें, ये था इन तथाकथित महान लेखकों का उद्देश्य।
भारत में ब्रिटिश राज के समय 1861 से जनगणना का कार्य प्रारंभ हुआ। 1861, 1871, 1881 में जो जनगणना प्रतिवेदन प्रकाशित हुई, उस में एक तीखा व्यंग्य किया गया चार दशक की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि हिंदू धर्म अब पतन के कगार पर खड़ा है (Hindu Race is a dying race) हिंदू एक मरणासन्न जाति है। अब वह चिरकाल तक गुलाम रहने के लिए विवश है।
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी को व्यापार की सुविधा देने का पुरस्कार हिंदुओं को मिला राजनीतिक दासता एवं धार्मिक पतन के रूप में। इस गहन अंधकार में काल की कोख से फूटकर एक ज्योति शलाका प्रभासित हुई स्वामी विवेकानंद के रूप में। यह दिव्य प्रकाश जितना तेजस्वी सौ वर्ष पूर्व था उतना ही आज भी है।
प्रसिद्घ कथन है Child is the father of man (बच्चा पुरूष का पिता होता है) आईए विचार करें कि महामानव विवेकानंद बचपन में क्या थे। अंग्रेजी साहित्य में एक प्रसिद्घ वक्रोक्ति है-  One should be very careful in the choice of his parents. व्यक्ति को अपने माता पिता के चयन में बहुत सतर्क रहना चाहिए। लेखक व्यंग्य करता है कि अपने माता पिता का चुनाव हम सावधानी से करें स्वामी जी उस उक्ति पर खरे उतरे।
सभी जानते हैं कि उनके पिता का नाम श्री विश्वनाथ दत्त था, किंतु उनके बाबा का नाम जानना भी आवश्यक है-वे थे श्री दुर्गाचरन दत्त।
आश्चर्य देखिए, धर्मपरायण बाबा फारसी व संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे और बालक विश्वनाथ दत्त के जन्म लेने के तुरंत बाद 25 वर्ष की युवावस्था में ही श्री दुर्गाचरन दत्त सन्यासी बनकर गृह त्याग कर गये थे। बाबा भी संन्यासी और बाद में पौत्र भी संन्यासी। इस घटना ने अंग्रेजी बालों को एक पग और आगे सोचने का अवसर दिया-
Child is the grandfather of man At least in case of Swami Vivekanand  बच्चा पुरूष का पितामह होता है। (कम से कम स्वामी विवेकानंद के विषय में तो अवश्य)
Ref. 1. Hindu Polity-Barrister N.N. Banerjee.
2. Centenary volume-R.C. Majumdar page 34 संदर्भ 1. हिंदू राज्य व्यवस्था बैरिस्टर एनएस बनर्जी कृत 2. शताब्दी ग्रंथ रमेश चंद्र मजूमदार संपादित पृष्ठ 34 मकर संक्रांति पृथ्वी का जन्म दिवस माना जाता है। नरेन्द्र का जन्मदिन पृथ्वी के जन्मदिन से मेल खाता है।
12 जनवरी 1863 को बालक नरेन्द्र का जन्म हुआ। माता भुवनेश्वरी ने भगवान शिव से मनोकामना हेतु जो अनुष्ठान किया था वह मकर संक्रांति के पवित्र दिवस पर पूर्ण हुआ। सूर्योदय के कुछ मिनट पूर्व नरेन्द्र का जन्म हुआ था। पौष मास के शुक्ल पक्ष का सप्तम दिवस था। प्रकृति की इस अदभुत घटना के नाते वे धरती पुत्र थे। संसार के मानवों के कल्याण के लिए ही उनका आविर्भाव हुआ था।
7 वर्ष के बालक नरेन्द्र मोहन जिस विद्यालय में प्रवेश दिलाया गया वह था Metropolitan institure जिसके संस्थापक थे श्री ईश्वर चंद्र विद्यासागर पिता के स्थानांतरण के कारण बीच में शिक्षा स्थगित रही।
1879 में हाई स्कूल प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। कक्षा 11 में Predency College Calcutta में प्रवेश लिया। इस विद्यालय की स्थापना 1818 में राजा राममोहन राय ने की थी जिसका 175वां वार्षिक समारोह कुछ वर्ष पूर्व ही मनाया गया है। Scottish Church College से कक्षा 12 उत्तीर्ण करके इसके बाद यही से दर्शन शास्त्र का भी विषय लेकर बीए उत्तीर्ण किया।

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