इतिहास पर गांधीवाद की छाया , अध्याय – 6, मुस्लिम तुष्टिकरण और महात्मा गांधी

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इतिहास पर गांधीवादी की छाया, अध्याय – 6

मुस्लिम तुष्टिकरण और गांधीजी

लियोनार्ड मोसले के अनुसार भारत विभाजन के समय बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के उपरान्त भी महात्मा गांधी ने कहा था- “चाहे पाकिस्तान में समस्त हिन्दू व सिख मार दिए जाएं, पर भारत के एक कमज़ोर मुसलमान बालक की भी रक्षा होगी ।”
स्रोत-(पुस्तक- भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन: एक विहंगावलोकन, लेखक-मुकेश बरनवाल, डॉ. भावना चौहान)
कांग्रेस का इतिहास मुस्लिम तुष्टीकरण के सभी उदाहरणों से भरा हुआ है। आज देश में सीएए व एनआरसी की आड़ में जिन मंचों से मुस्लिम कट्टरपंथी शक्तियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, उन सभी मंचों के पीछे जिस निर्लज्जता के साथ कांग्रेस पार्टी और उसके सभी नेता खड़े हैं, वह कोई नई बात नहीं है।  आज जिस प्रकार की भाषा मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर सहित सभी कांग्रेसी नेता बोल रहे हैं, यह कांग्रेस के पाठ्यक्रम का एक हिस्सा हैं। वह कांग्रेस ही थी जिसने धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलिरिज्म) शब्द को संविधान में स्थान दिया , औऱ सदा उसकी आड़ में मुस्लिम कट्टरपंथी शक्तियों को प्रश्रय दिया। जिसका परिणाम आज तक यह देश भुगत रहा है।
डॉ. अम्बेडकर अपनी पुस्तक “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया” में लिखते हैं कि “कांग्रेस ने मुसलमानों को राजनीतिक और अन्य रियायतें देकर उन्हें सहन करने और खुश रखने की नीति अपनाई है। क्योंकि वे समझते हैं कि मुसलमानों के समर्थन के बिना वे अपने मनोवांछित लक्ष्य को नहीं पा सकते। मुझे लगता है कि कांग्रेस ने दो बातें समझी ही नहीं हैं। पहली बात यह है कि तुष्टीकरण और समझौते में अन्तर होता है, और यह एक महत्वपूर्ण अन्तर है। “तुष्टीकरण” का अर्थ है, एक आक्रामक व्यक्ति या समुदाय को मूल्य देकर अपनी ओर करना ; और यह मूल्य होता है उस आक्रमणकारी द्वारा किये गए, निर्दोष लोगों पर, जिनसे वह किसी कारण से अप्रसन्न हो, हत्या, बलात्कार, लूटपाट और आगजनी जैसे अत्याचारों को अनदेखा करना। दूसरी ओर, “समझौता” होता है दो पक्षों के बीच कुछ मर्यादाएं निश्चित कर देना । जिनका उल्लंघन कोई भी पक्ष नहीं कर सकता। तुष्टीकरण से आक्रान्ता की मांगों और आकांक्षाओं पर कोई अंकुश नहीं लगता, समझौते से लगता है।

दूसरी बात, जो कांग्रेस समझ नहीं पाई है, वह यह है कि ‘छूट देने की नीति’ ने मुस्लिम आक्रामकता को बढ़ावा दिया है; और, अधिक शोचनीय बात यह है कि मुसलमान इन रियायतों का अर्थ लगाते हैं हिन्दुओं की पराजित मानसिकता और सामना करने की इच्छा-शक्ति का अभाव। तुष्टीकरण की यह नीति हिंदूओं को उसी भयावह स्थिति में फंसा देगी जिसमें मित्र देश (द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस आदि) हिटलर के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाकर स्वयं को पाते थे।”
स्रोत-(पुस्तक-डॉ. अम्बेडकर की दृष्टि में मुस्लिम कट्टरवाद, लेखक- एस के अग्रवाल : शास्त्री संदेश )

डॉक्टर अम्बेडकर जी का उपरोक्त कथन मुस्लिमों के प्रति उनके व्यावहारिक चिन्तन को प्रकट करता है। उनके इस कथन से यह भी स्पष्ट होता है कि गांधीजी का ‘मुस्लिम प्रेम’ इस देश के लिए घातक रहा है । दुर्भाग्य की बात है कि तथाकथित गांधीवादी नेता गांधीजी के इसी ‘मुस्लिम प्रेम’ को इस राष्ट्र का मूल संस्कार घोषित और स्थापित करने की हठ किए हुए हैं।
आज के गांधीवादी नेता भी वैसा ही मुस्लिम प्रेम प्रकट करते हैं जैसा कभी गांधीजी ने 1947 में देश के बंटवारे के समय या उससे पूर्व किया था ? इन्हें देश को चोट पहुंचाने के लिए दाखिल हुए उस एक घुसपैठिए की अपेक्षा सारे हिन्दू – सिक्ख शरणार्थी अस्वीकार्य हैं जो अपने प्राण बचाकर किसी प्रकार इस देश को ‘अपना घर’ समझकर यहाँ आए हैं।

श्रद्धानंदजी के हत्यारे को गांधी ने कहा था – ‘भाई’

आर्य समाज जैसी पवित्र और राष्ट्रवादी संस्था ने अनेकों देशभक्त क्रान्तिकारी योद्धाओं का निर्माण किया है । एक समय ऐसा था जब इस संस्था के द्वारा संचालित गुरुकुलों को राष्ट्रभक्ति का कारखाना कहकर अंग्रेज संबोधित करने लगे थे । इसी संस्था ने स्वामी श्रद्धानन्द जी जैसे महान योद्धा का निर्माण किया था । जिन्होंने ‘शुद्धि आन्दोलन’ के माध्यम से 5 लाख मलकानी राजपूतों ( मुसलमानों ) की ‘घर वापसी’ कराई थी ।1926 में स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी। लोगों की अपेक्षा थी कि गांधीजी स्वामीजी के हत्यारे के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही करने की मांग अंग्रेजी सरकार से करेंगे , परंतु गांधीजी ने ऐसा न करके स्वामी जी के हत्यारे अब्दुल रशीद को अपना ‘भाई’ कह कर सम्मानित किया और अपने मुस्लिम प्रेम का प्रकटीकरण किया । उन्होंने स्वामी जी के हत्यारे के जघन्य अपराध को भी उचित ठहराया।
इतना ही नहीं गांधी जी ने स्वामी जी के शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र- विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।
‘गांधी छाप इतिहास’ इस घटना को आज भी इसी प्रकार महिमामंडित करता है ,और गांधीजी के इस विचार को इस देश के लिए उनकी बहुत बड़ी ‘देन’ के रूप में स्थापित करता है।

गांधीजी की दृष्टि में गुरु गोविंद सिंह थे – पथभ्रष्ट देशभक्त

हमने पूर्व में ही यह स्पष्ट किया है कि गांधीजी छत्रपति शिवाजी और महाराणा प्रताप जैसे राष्ट्रभक्तों की राष्ट्रभक्ति को उचित दृष्टिकोण से नहीं देखते थे। उन राष्ट्र भक्तों के प्रति उनके हृदय में कोई सम्मान का भाव नहीं था । इसके विपरीत वह औरंगजेब और अकबर के गीत गाते थे। देश के इतिहास के इन महानायकों के प्रति गांधीजी ने अपनी घृणा को प्रकट करते हुए अनेकों अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को ‘पथभ्रष्ट देशभक्त’ कहा। जिन महापुरुषों के सत प्रयासों और वीरतापूर्ण कृत्यों से इस राष्ट्र की संस्कृति और धर्म की रक्षा हो सकी और हम राष्ट्र निर्माण करने में सफल हुए वह तो ‘पथभ्रष्ट देशभक्त’ हो गए और जिस व्यक्ति की हठधर्मिता से हिंदूहितों को अनेकों बार चोट पहुंची और इस देश की संस्कृति , धर्म व इतिहास की परम्पराओं को आघात लगा वह पथ निर्माता हो गया।

राजा हरि सिंह को दिया था गांधी जी ने परामर्श

जम्मू कश्मीर के हिन्दू महाराजा हरिसिंह को गांधी जी ने उनकी ‘राष्ट्रभक्ति का उचित पुरस्कार’ देते हुए उन्हें काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया था। राजा हरिसिंह का अपराध केवल यह था कि वह कश्मीर के हिंदुओं को नवनिर्मित पाकिस्तान के मुस्लिमों की भेंट चढ़ाना नहीं चाहते थे ।वह उसे ससम्मान भारत के साथ विलय करना चाहते थे । इस अपराध में गांधी जी ने उन्हें काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श किया था । जबकि उसी समय एक और भी रियासत थी ,जिसे हैदराबाद की निजामशाही के नाम से जाना जाता था । वहाँ का निजाम भारत के विरुद्ध खुली बगावत कर रहा था और देश के बीचों-बीच एक नया पाकिस्तान बनाने की दिशा में आगे बढ़ता जा रहा था। इतना ही नहीं वह देश के पौरुष और शौर्य को ललकारते हुए को धमकाने की स्थिति में आ गया था । वह देश की संप्रभुता ,एकता और अखंडता के लिए खतरा बन चुका था। उस राष्ट्रद्रोही निजाम के प्रति गांधी जी का दृष्टिकोण बहुत ही उदार था । गांधीजी के इसी दृष्टिकोण से कांग्रेस का हिन्दू विरोधी चरित्र विकसित हुआ । वर्तमान में कांग्रेस के जिस विकृत हिंदू विरोधी चेहरे को हम देखते हैं, उसके मूल में गांधी और गांधीवाद का यही चिन्तन कार्य करता रहा है कि मुस्लिमों का चाहे जितना राष्ट्र विरोधी दृष्टिकोण हो , उसे फिर भी उचित मानो और हिन्दू चाहे जितना सहिष्णु और सामाजिक समरसता में विश्वास रखने वाला हो, उसे उत्पीड़ित करते रहो। एक प्रकार से कांग्रेस के इस ‘शासकीय आतंकवाद’ को इसी गांधीवाद ने जन्म दिया है। ‘संगठित अपराध’ का विरोध करने वाली कॉंग्रेस और उसके इतिहास लेखक क्या कभी कांग्रेस के इस ‘शासकीय आतंकवाद’ या उसकी ‘संगठित अपराध’ की इस कार्यशैली को भी स्पष्ट कर सकेंगे ?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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