पर्यावर्णानुकूल परंपराओं और व्यवस्थाओं को अपनाने का प्रयास प्रारंभ करना होगा

images (20)

ममता रानी

आज विश्व की सबसे बड़ी समस्या है कूड़े का प्रबंधन यानी जो कचरा आज हम इस्तेमाल कर के फेंक रहे हैं उसका निस्तारण कैसे किया जाये। जी हां, ये कचरों के ढेर चारों तरफ दिखाई दे रहे हैं। गांव हो या शहर हर जगह कचरों का ढेर है। हम अपने घर से कचरा निकालकर कूड़ेदान में डाल देते हैं और निश्चिन्त हो जाते हैं कि घर की गंदगी चली गई। पर जरा सोचिए ये लाखों टन कचरा कहां फेंका जाएगा इससे पर्यावरण को क्या नुकसान होगा? इस कचरे के फैलाव का एक बड़ा कारण है डिस्पोजेबल सामानों का बढ़ता उपयोग। डिस्पोजेबल यानी उपयोग करो और फेंक दो। डिस्पोजेबल के अनेक फायदे हैं जिनके कारण इनका उपयोग बढ़ता जा रहा है।
डिस्पोजेबल के फायदे
डिस्पोजेबल का जो सबसा बड़ा फायदा है कि बर्तनो के ढेर से छुट्टी मिल जाती है। ना ज्यादा बर्तन रखने का झंझट न ही उसे साफ़ करने का। घर में चार मेहमान आये नहीं कि थर्माकोल की थाली और प्लास्टिक के कप ग्लास निकाल दिये जाते हैं। बस खाओ-पीओ और फेंक दो। छोटी-मोटी पार्टी हो, ठेले वाला हो या खोमचे वाला, ढाबा हो या छोटा-मोटा रेस्तरां, सभी जगह डिस्पोजेबल डब्बे, पोलीथिन पैकेट, चाय के प्लास्टिक या कागज के कप, जूस के लिये कागज के ग्लास आदि का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। हम सभी पोलीथीन या प्लास्टिक के डिब्बे में खाना पैक करवाकर घर ले जाते हैं। हमे बड़ा मजा भी आता है कि देखो ये एयर टाइट है, इससे एक बूंद भी रस बाहर नहीं निकलता। पर इसके बदले हम अपना कितना नुकसान कर रहे हैं, यह कोई सोचता भी नहीं है।

डिस्पोजेबल के नुकसान
डिस्पोजेबल ग्लास हो या कप, कटोरी हो या थाली, चाहे प्लास्टिक की हो या थर्माकोल की, यह हमारे शरीर के लिये बहुत ही नुकसानदेह है। डिस्पोजेबल बर्तन बनाने में बर्ड इथाइल व मेट्रोसेमिन नामक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। इन बर्तनो में गर्म खाना या चाय पीने से ये रसायन हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं जो गम्भीर बीमारियों का कारण बनते हैं। प्लास्टिक के बर्तनों में अन्दर चिकना करने के लिये मशीन से मोम की बहुत पतली परत चढ़ायी जाती है जिससे ग्लास चिपके नहीं, आसानी से अलग हो सकें। गर्म चाय डालने पर यह मोम पिघल कर हमारे लीवर और किडनी को खराब करती है। इससे हृदय रोग, लीवर, कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
कनाडा की गवेल्फ विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में बताया है कि बिस्फेनॉल ए नामक रसायन का उपयोग प्लास्टिक की बोतलें और बेबी फूड की बोतलों को बनाने में किया जाता है। यह पदार्थ दिमाग के लिये हानिकारक है। इसके लगातार सेवन से आगे चलकर अल्जाइमर जैसी बीमारी हो सकती है। बिस्फेनॉल ए के कारण युवाओं मे मधुमेह होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। प्लास्टिक के लगातार इस्तेमाल से पाचन संबंधी समस्याएं पैदा होने लगती हैं। ये प्लास्टिक सिर्फ हम मनुष्यों को ही नुकसान नहीं पहुंचा रहा इससे पशु-पक्षी, कीट-पतंग, पानी, हवा, मिट्टी, नदियों, तालाब और समुद्र तक को नुकसान हो रहा है।

भारत में डिस्पोजेबल
समस्या डिस्पोजेबल नहीं, समस्या आज के डिस्पोजेबल हैं। उपयोग करो और फेंक दो यह आसान सा उपाय भारत में भी प्राचीन काल से ही होता रहा है। डिस्पोजेबल का उपयोग भारत की प्राचीन परंपरा में रहा है परंतु यह न तो हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती थी और न ही पर्यावरण को। गांवों में जाकर देखें या फिर किसी बुजुर्ग से जाकर पूछें तो पता चलेगा कि भारत मे सदियों से ऐसी चीजों का इस्तेमाल होता था जो आधुनिक जीवन शैली से मेल तो खाता था पर पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता था। उल्टा इससे छोटे-छोटे ग्रामोद्योग हर गांव में चलते थे, जिससे लोगों की रोजीरोटी चलती थी। भारतीय परंपरा में प्लास्टिक की जगह मिट्टी के बर्तन होते थे जो जल्द ही टूटकर मिट्टी में मिल जाते थे। थर्माकोल की थालियों की जगह पत्तों की थाली होती थी जो कुछ ही दिनों में सूखकर सड़-गल कर मिट्टी में मिल जाती थी। कोई भी बड़ा आयोजन हो, कुछ ही दिनों में कचरों का कोई नामोनिशान नहीं रहता था। डिस्पोजेबल हम भी प्रयोग करते थे, परंतु वह पर्यावरणानुकूल डिस्पोजेबल था। आज भी आप बिहार, झारखंड के गांवों में किसी विवाद या भोज में जाएंगे तो आपको मिट्टी की कुल्लड़ में चाय, मिट्टी के ग्लास में पानी, सखुआ के पत्तों से बनी थाली-कटोरी आदि देखने को मिल जायेंगे। यह सिर्फ बिहार झारखंड में ही नहीं, पूरे भारत में प्रयोग किया जाता था। दक्षिण भारत में केले के पत्तों पर भोजन करने की परम्परा है। पत्तों पर खाना खाने के पीछे स्वास्थ्य का विज्ञान भी है। सखुआ का पत्ता हो या केले का, इस पर गर्म खाना रख कर खाने से अनेक प्रकार के ऐसे तत्व हमारे शरीर में जाते हैं जो शरीर की शुद्धि करते हैं जिससे हम रोगमुक्त रहते हैं। थाली, दोने और कटोरियां बनाने के लिए सखुआ और केले के पत्तों के अलावा पलाश, बड़ आदि कई अन्य पेड़ों के पत्तों का भी उपयोग किया जाता रहा है।
मिट्टी के बर्तन की तारीफ क्या की जाये? यह तो आज के डॉक्टर भी मानने लगे हैं कि फ्रिज का पानी न पीयें, ठंडा पानी पीने के लिए मिट्टी के घड़े का उपयोग करें। आज से 20 साल पहले तक ट्रेन में भी मिट्टी की प्याली में ही चाय मिलती थी। बिहार, झारखंड, बंगाल आदि कुछ राज्यों में आज भी मिलती है। पोलीथिन के थैलों के स्थान पर भारत में कागज के थैले या लिफाफे बनते थे, जिसे कई जगह ठोंगा के नाम से भी जाना जाता है। इन सभी चीजो से न तो मनुष्य को कोई नुकसान होता था और न ही पर्यावरण को। भारत मे पानी को लेकर घूमने का प्रचलन कभी नहीं था। हर गांव में दो चार प्याऊ होते ही थे, जो भी राहगीर आते थे, मुफ़्त में पानी पीते थे। तब तो किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि जिस देश में गंगा यमुना जैसी नदियों की धारा अविरल बहती हो वहां बोतल में बंद करके पानी का व्यवसाय किया जाएगा।

डिस्पोजेबल और रोजगार
अब रही व्यवसाय की बात। जितना रोजगार आज डिस्पोजेबल प्लास्टिक से लोगों को मिलता है, उससे ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं मिलता, अगर हम अपनी संस्कृति से जुड़े रहते। मिट्टी के बर्तन बनाने का काम कुम्हार जाति के लोग करते थे। यही इनका व्यवसाय था। इसे एक लघु उद्योग कह सकते हैं। वैसे ही कागज का लिफाफा गांवों-कस्बों और शहरों में भी घरेलू महिलाएं बनाती थी जो उनकी आय का एक माध्यम था। पत्तों के दोने, थाली आदि बनाने का काम ज्यादातर जनजातीय लोग किया करते थे, जिससे उनका भरण-पोषण चलता था। सखुआ या अन्यान्य वृक्षों के पत्तों को चुनने के लिए ये रोज जंगल जाते थे। कहीं सूखे पत्तों का बनाने का प्रयोग होता था तो कहीं हरे पत्तों का। पत्तों के लिए ये लोग नित्य नए पेड़ भी लगाते थे जिससे जंगल भी हरा भरा रहता था और हमारी धरती भी स्वच्छ साफ और सुंदर दिखती थी।
आज हमारे कुम्हार और जनजातीय लोग रोजगार खो रहे हैं। उनके द्वारा बनाए जाने वाली चीजों के विकल्प बड़े-बड़े कारखानों में बनने लगे हैं और वही लोग जो कभी उद्यमी और स्वतंत्र व्यवसायी हुआ करते थे, उन कारखानों में मजदूर बन कर काम करने के लिए विवश हैं। आज आवश्यकता है कि एक बार फिर से हम अपनी उसी पर्यावर्णानुकूल परंपराओं और व्यवस्थाओं को अपनाने का प्रयास प्रारंभ करें। अभी भी अधिक देर नहीं हुई है। राजधानी दिल्ली में भी कुम्हारों या पत्तों तथा पत्तल बनाने वालों या कागज के लिफाफों की कमी नहीं है। कमी हमारे अंदर है।

स्वास्थ्यवर्धक है पत्तलों में खाना

1. पलाश के पत्तल में भोजन करने से, स्वर्ण के बर्तन में भोजन का पुण्य व आरोग्य मिलता है।
2. केले के पत्तल में भोजन करने से, चांदी के बर्तन में भोजन करने का पुण्य व आरोग्य मिलता है।
3. रक्त की अशुद्धता के कारण होने वाली बीमारियों के लिये, पलाश से तैयार पत्तल को उपयोगी माना जाता है। पाचन तंत्र सम्बन्धी रोगों के लिये भी इसका उपयोग होता है। आम तौर पर लाल फूलों वाले पलाश को हम जानते हैं, पर सफेद फूलों वाला पलाश भी उपलब्ध है। इस दुर्लभ पलाश से तैयार पत्तल को बवासीर (पाइल्स) के रोगियों के लिये उपयोगी माना जाता है।
4. जोड़ों के दर्द के लिये, करंज की पत्तियों से तैयार पत्तल उपयोगी माना जाता है। पुरानी पत्तियों को नयी पत्तियों की तुलना में अधिक उपयोगी माना जाता है।
5. लकवा (पैरालिसिस) होने पर अमलतास की पत्तियों से तैयार पत्तलों को उपयोगी माना जाता है।

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
betnano giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
ikimisli giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
betnano giriş
ikimisli giriş
betnano giriş
betlike giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betparibu giriş
betparibu
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş