समाज और देश के दुश्मन हैं

विघ्नसंतोषी और नकारात्मक लोग

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

आजकल आदमी के दिल और दिमाग से लेकर परिवेश तक नकारात्मक मानसिकता और बुराइयों से भरी प्रवृत्तियों का वजूद बढ़ता जा रहा है। हममें से अधिकांश लोगों की सोच नकारात्मक होने लगी है, हमारे भीतर से मानवीय गुणों का ग्राफ निरन्तर नीचे आता जा रहा है।

हमारी असीमित इच्छाओं, अनगिनत कल्पनाओं और ढेरों स्वप्नों ने मिलकर हमारी मनोवृत्ति को इतना दूषित कर दिया है कि  हम उन सारे कर्मों को अपनाने के लिए भाग-दौड़ करने लगे हैं जो अंधियारी गलियों से होकर गुजरते हैं और रोशनी के वजूद को हमेशा ललकारते रहते हैं।

कोई सा इंसान हो, कोई सा कर्म हो, हमें अब उनमें न कोई अच्छाई दिखती है, न इनमें अच्छी बात। विचारधाराओं में शुचिता और शुद्धता नहीं रही, आदर्श पलायन कर चले हैं, नैतिक मूल्यों की मौत हो रही है, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की जहरीली हवाएं पूरी मस्ती के साथ बहने लगी हैं, आदमी को अब सिर्फ अपने आप से ही मतलब रह गया है और वह उन्हीं कामों में रमा रहता है जो सिर्फ उसे लक्ष्य मानकर किए जाते हैं।

हममें से कई सारे लोग ऎसे हैं जिन्हें अपने कामों से ज्यादा चिंता दूसरों के बारे में होती है। अपने कोई काम हो न हों, हमें कोई फायदा हो न हो, दूसरों का कोई सा काम नहीं होना चाहिए। हमारा मानसिक प्रदूषण और नकारात्मक चिंतन इतना अधिक परिपक्व हो चला है कि दूसरों का नुकसान करते हुए हमें अजीब से आनंद की अनुभूति होती है और अब तो यह हमारी तलब ही हो चुकी है।

औरों का काम बिगाड़े बगैर हमेंं चैन नहीं मिलता। इसीलिए हममें से ज्यादातर लोग दिन-रात इसी फिराक में रहते हैं कि कैसे किसी की छवि खराब की जाए, कैसे किसका क्या नुकसान किया जाए। समाज और देश को नालायकों और उदासीन लोगों से उतना खतरा नहीं है जितना उन लोगों से है जो विघ्नसंतोषी बने हुए औरों के काम बिगाड़ने तथा नीचा दिखाने की तलब पा चुके हैं।grudge_against_society

ऎसे लोग सभी स्थानों पर हैं। हमारे अपने पावन इलाकों में भी ऎसे लोगों का वजूद बना हुआ है जो नकारात्मक गतिविधियों और प्रदूषित विचारों के साथ समाज-जीवन के हर किसी मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। चारों तरफ से हम घिरे हुए हैं नकारात्मक माहौल से, नकारात्मक मानसिकता भरे लोगों से। अब तो कोई सा रचनात्मक कर्म हो, अच्छा कार्य हो, उसके जन्म लेते ही आभामण्डल के इर्द-गिर्द नकारात्मकता का अंधेरा घेरा बनने लगता है।

यही कारण है कि आदर्श और श्रेष्ठ कर्म करने वाले लोग सामाजिक गतिविधियों से पलायन करने लगे हैंं। दूसरा दुर्भाग्य यह है कि समाज में ऎसे नकारात्मक लोगों और विघ्नसंतोषियों के अपने छोटे-बड़े समूह बनने लगे हैं और इस वजह से जहाँ कहीं कोई क्रिया होती है उसकी प्रतिक्रिया में नकारात्मक समूहों का आगमन अपने आप होने लगता है। ऎसे में नकारात्मकता का अंधकार काले बादलों की तरह समाज और क्षेत्र की छाती पर छा जाता है।

आज प्रत्येक इंसान को इस बात के लिए आत्मचिंतन की आवश्यकता है उनका अवतरण क्यों हुआ है तथा जीवन का लक्ष्य क्या है। इन दो बातों को गंभीरता से हर कोई समझ ले तो सभी का भला हो जाए।

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