वैदिक संपत्ति
उपक्रम : संसार के सभी मनुष्य सुख शांति चाहते हैं और उसको प्राप्त करने के लिए अपनी परिस्थिति के अनुसार कभी भौतिक और कभी आध्यात्मिक साधनों के द्वारा प्रयत्नancientman भी करते हैं। परंतु उनकी सुख शांति का आदर्श वही होता है, जिससे कि वे प्रभावित होते हैं, और उसी प्रकार के ही प्रयत्नों का अनुकरण करते हैं जिस प्रकार के प्रयत्न करते हुए वे अपने उस प्रभावशाली व्यक्तित्व को देखते हैं। इस समय समस्त संसार योरूप से प्रभावित है और सबने उसी को अपना आदर्श मान लिया है। यही कारण है कि वर्तमान योरोपीय सभ्यता ने समस्त पृथिवी की प्राचीन सभ्यताओं को बदल दिया है और जहां तक भौतिक उन्नति तथा बाहरी बनाव चुनाव का संबंध है, सारा संसार एक विशाल योरूप बन रहा है।
परंतु इससे यह न समझना चाहिए कि योरूप अपनी इस भौतिक उन्नति से स्वयं संतुष्टï है। वह संतुष्टï नही है, प्रत्युत इस भौतिक उन्नति से उत्पन्न विलास, रोग, स्पर्धा और युद्घों ने उसे भयभीत कर दिया है। अतएव वह अब इससे त्राण चाहता है और सच्ची सुखशांति की खोज करता हुआ मनुष्य की प्रारंभिक अर्थात आदिमकालीन अवस्था तक पहुंचा है। अब वहां विद्वानों की प्रवृत्ति का झुकाव दिन प्रतिदिन मनुष्य की आरंभिक रहन सहन की ही ओर बढ़ रहा है। वे अब मनुष्य के आहार, विहार, समाज शासन और शादी-विवाह के जो उदाहरण देते हैं वे प्राय: आदिमकालीन ही होते हैं। जिससे स्पष्टï हो जाता है कि मनुष्य की आदिमकालीन दशा ही उत्तम थी। इधर हमारे देश के ऋषि मुनियों ने भी आरंभिक रहन-सहन को ही उत्तम माना है और उसी के अनुसार समस्त मनुष्यों को अपना जीवन बनाने का भी आदेश दिया है। ऐसी दशा में जबकि प्राचीन और नवीन विचारों की एकता का उपक्रम हो रहा है तो हमने भी नवीन विचारों से इस पुस्तक का उपक्रम और प्राचीन विचारों से उपसंहार करने का निश्चय किया है। आशा है इस उपक्रम उपसंहार से संसार को वास्तविक सुखशांति के पहिचानने और प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। क्योंकि देखा जाता है कि यदि मनुष्य का मस्तिष्क बिगड़ा न हो और उसको किसी ने छकाया न हो तो वह सदैव वास्तविक शांति की ही इच्छा करता है। वह रात दिन विद्या, धन, समाज सुधार और राष्टï्र निर्माण आदि साधनों के द्वारा वास्तविक सुखशांति का ही उपाय किया करता है और लक्ष्य तथा प्रयत्न के अनुसार फल भी प्राप्त करता है। किंतु कुछ लोग कहते हैं कि प्राय: वही शांति क्रियाहीनता का चिन्ह है, जो अकर्मण्य है, आलसी है, निस्तेज और भीरू हैं, प्राय: वही शांति-शांति की चिल्लाहट करते हैं। पुरूषार्थी, कर्मनिष्ठ और जीवनयुक्त मनुष्य कभी शांति नही चाहते। क्योंकि शांति से बल और बुद्घि दोनों में बाधा उपस्थित होने का डर रहता है। किंतु अशांति से, जीवन संग्राम से-मनुष्य सदैव विजय प्राप्त करने के लिए-जीने के लिए-बल और बुद्घि दोनों में उन्नति करता है, और इस उन्नति से संसार के समस्त उच्चतम विज्ञानों की प्राप्ति होती है। इसलिए मनुष्य के जीवन में शांति का कुछ भी प्रयोजन नही है।
यद्यपि सुनने में ये बातें बड़ी मधुर मालूम होती हैं। मालूम होता है कि कोई बड़ा तत्वदर्शी बड़े मर्म और मार्के की बातें कर रहा है, पर जरा सा सोचकर, केवल एक दो प्रश्न और आगे बढ़ाने से इस आडंबरयुक्त वाक्य समूह की कलई खुल जाती है। जब पूछा जाता है कि अशांति से उत्पन्न हुए बल और बुद्घि से मनुष्य को क्या लाभ होगा, और वह विज्ञान जो अशांति से उत्पन्न हुआ है और अशांति की ही वृद्घि करता है मनुष्य के जीवन में किस मौके पर काम आवेगा? तो कुछ भी उत्तम नही बनता। ऐसी दशा में यह बिलकुल स्पष्टï हो जाता है कि अब तक लोगों ने वास्तविक सुख शांति को अच्छी तरह समझ नही है। अतएव हम यहां आवश्यक समझते हैं कि सबसे प्रथम यह समझने का यत्न करें कि वास्तविक शांति क्या है? क्योंकि लोगों ने मान रखा है कि शांति का तात्पर्य आलस्य और क्रियाहीनता है। लोग समझते हैं कि शांति चाहने वाले रोगी, दुर्बल, मूर्ख निकम्मे और भाग्य पर रोने वाले होते हैं। न उनके घर खाने का ठिकाना होता है न उनके बाल बच्चों की शिक्षा का प्रबंध होता है और न उनका कोई समाज होता है, न राष्टï्र होता है। बड़ी गड़बड़ तो यह होती है कि जिस किसी ने उनको चार लातें मारीं उसीने उनका घर बार छीन लिया और अपनी गुलामी में नियुक्त कर दिया। परंतु हम बलपूर्वक कहते हैं कि यह नक्शा या लक्षण वास्तविक शांति चाहने वालों का नही है।
शांति चाहने वालों का कार्यक्रम
वास्तविक शांति चाहने वालों का तो नक्शा और कार्यक्रम ही जुदा है। वे निकम्मे नही होते प्रत्युत पुरूषार्थी, बलवान, विद्वान और बुद्घिमान होते हैं। वे नीरोग, सुंदर और पुष्टï होते हैं। वे दयालु और सदाचारी होते हैं। वे कलहरहित होते हैं। वे मनुष्य पशु, पक्षी तृण, पल्लव, कीट पतंग सभी को सुरक्षित और सुखी देखना चाहते हैं। वे प्रकृति के गुलाम नही, किंतु प्रकृति को अपने कब्जे में रखने वाले होते हैं। राज्य-व्यवस्था यज्ञानुष्ठान और समाधिसाधन आदि महापुरूषार्थ के काम सदैव उनके सामने रहते हैं। विद्याध्ययन के लिए उनके पास शिक्षा की बहुत सी शाखाएं भी उपस्थित रहती हैं और ज्ञान-विज्ञान की अंतिम सीमा तक पहुंचने के लिए उस परमात्मा की प्राप्ति का महान लक्ष्य सदैव उनके सामने रहता है, जिसके जान लेने पर फिर कुछ भी जानने की आवश्यकता नही रहती। शांति चाहने वालों की वास्तविक शांति का यही आदर्श है। इस प्रकार की शांति आलसियों, अकर्मण्यों और भीरूओं की नही, प्रत्युत महापुरूषार्थियों की है।
इस शांति का वास्तविक अभिप्राय है ईष्र्या, द्वेष, कलह और लड़ाई आदि की निवृत्ति, रोगदोष, दुखदरिद्रता की समाप्ति, पशुपक्षियों के करूण क्रंदन का अंत और वृक्षों पर चलती हुई कुल्हाड़ी की रोक तथा समस्त संसार को एक राष्टï्र के नीचे लाकर धर्मपूर्वक साम्यभाव से सबको सबसे सुख पहुंचाने का स्वर्गीय बंदोबस्त। यही शांति चाहने वालों का अंतिम ध्येय है। परंतु जो लोग लड़ाई तकरार, स्वार्थ और कुटिलता से मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग तृणपल्लव को दुखी बनाकर स्वयं कृत्रिम अस्वाभाविक और काल्पनिक बलबुद्घि का स्वप्न देखना चाहते हैं उनका यह अशांति से उत्पन्न हुआ बल और विज्ञान स्वप्नसम्मति ही है वास्तविक नही, यथार्थ नही। इसका प्रमाण हमें प्रत्यक्ष मिल रहा है।
हम देख रहे हैं कि वर्तमान वैज्ञानिक संसार धीरे धीरे शारीरिक और मानसिक बल खोता जाता है। उसके शरीर से वह शक्ति हटती जाती है जो साहस के समय कठिन कामों के करने के लिए उत्साह दिलाती है। इसका कारण यही है कि वैज्ञानिक उन्नति यंत्रों का आविष्कार करके शारीरिक श्रमों में कमी उत्पन्न कर देती है और यंत्राश्रित मनुष्यों के शरीर निर्बल हो जाते हैं।
शारीरिक निर्बलता के साथ हृदय भी निर्बल हो जाता है और हृदय के कारण मस्तिष्क स्थिर नही रहता। फल यह होता है कि मनुष्य भीरू अर्थत डरपोक बन जाता है। उसके पास जब तक बंदूक रहती है, तभी तक वह शेर रहता है, परंतु बंदूक के छूटते ही बंदूक का मसाला खत्म होते ही अथवा अधिक मार की दूसरी बंदूक के सामने आते ही उसके देवता कूच कर जाते हैं और वह घबराकर आत्मसमर्पण कर देता है। यही कारण है कि भाला, तलवार अथवा और ऐसे ही सादे हथियारों की लड़ाई में वैज्ञानिक लड़ाई लडऩे वाले सैनिक खड़े नही रह सकते। जिस प्रकार वैज्ञानिक शस्त्रों के द्वारा यह सैनिक भीरूता उत्पन्न होती है उसी तरह अन्य प्रकार के यंत्रों के द्वारा अन्य अनेकों प्रकार की भीरूताएं भी उत्पन्न होती हैं।
पैदल चलने वाले भारतीय ग्रामीण साहस के साथ सैकड़ों कोस का पैदल रास्ता तय करते हैं, पर मोटर पर चलने वाले यंत्राश्रित मनुष्य पंक्चर हो जाने पर घबरा जाते हैं और चार मील भी नही चलपाते। इसी से कहते हैं कि भौतिक उन्नति के द्वारा वास्तविक बलबुद्घि का विकास नही होता, प्रत्युत पतन ही होता है और भीरूता बढ़ती है।
विद्वानों का कहना है कि भीरूता अर्थात डरपोकपना एक प्रकार की पशुता है। क्योंकि देखा जाता है कि जितने हिंसक पशु दूसरों को मारते या काटते हैं वे भीरूता के ही कारण मारते काटते हैं। वे मारे डर के ही विश्वास खो देते हैं और बिना कारण पहले ही ये दूसरों के मारने की घात लगाते हैं। यही हाल भीरू मनुष्यों का भी है। वे भी मारे डर के किसी का विश्वास नही करते और बिना कारण सारी दुनिया को असमर्थ बनाकर मार डालने की फिक्र किया करते हैं। इसका फल यह होता है कि इनकी इस स्वार्थ बुद्घि से उत्पन्न हई शारीरिक और मानसिक निर्बलता उनके शरीर की बनावट पर बहुत ही बुरा असर करती है। इस असर से उनके चेहरे कुरूप हो जाते हैं, आंखों से मधुरता जाती रहती है और मुख मंडल से सौम्यभाव चला जाता है। आज कल योरोप निवासियों के चेहरे इसी ढंग के हो गये हैं। उनकी तीक्ष्ण आंखें, रूखे चेहरे और अकड़ी हुई गर्दन हिंसक पशुओं की याद दिलाती है। परंतु दुख से कहना पड़ता है कि उनको अपने इस पतन की खबर नही है। वे नही जानते कि उनका किस प्रकार पतन हो रहा है। उनको खबर नही है कि किस प्रकार उनमें कुरूपता और भयंकरता मढ़ रही है। किस प्रकार बुद्घि में पाशव तत्व दाखिल हो रहे हैं और किस प्रकार वे चेतन जगत से दूर होते जाते हैं। उन्हें नही सूझता कि रेल मोटर, मिल इंजन और इसी प्रकार के अन्य समस्त भौतिक पदार्थों के संस्कार उनको कहां लिये जा रहे हैं?
इसी तरह उन्हें नही सूझता कि रात दिन असमर्थ मनुष्यों को सताना और पशु पक्षियों को मार मार करना खाना उन्हें किस गहरे गर्त की ओर ढकेल रहा है। एक ओर वे मनुष्य पशु, पक्षी आदि चेतन जगत का नाम करने में लगे हैं और दूसरी ओर भौतिक पदार्थों के मोह में जड़ जगत की उपासना कर रहे हैं। ऐसी दशा में वे चेतन जमात से कितना दूर होते जाते हैं। उन्हें नही सूझता।
क्रमश:

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
orisbet giriş
orisbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
milanobet giriş
hiltonbet giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
hiltonbet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
hititbet
hititbet
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino
vdcasino
hititbet
hititbet
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet giriş
betmarino
betmarino
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
norabahis giriş
celtabet giriş
celtabet giriş