साम्प्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक: राष्ट्रधाती नीति का प्रारूप

प्रस्तुत कर्ता: दिनेश चन्द्र त्यागी, (राष्ट्रीय महामंत्री सांस्कृतिक गौरव संस्थान)
सोनिया गांधी की अध्यक्षता में गठित (तथाकथित) राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC: National Advisory Council ) द्वारा साम्प्रदायिक व लक्ष्यित हिंसा रोकथाम विधेयक, 2011Prevention of Communal and Targetted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill, 2011 का प्रारूप तैयार किया गया। मौलिक रूप में तैयार प्रारूप में इस विधेयक के द्वारा देश में दो प्रकार के आपराधिक कानून न्याय व्यवस्था एवं दंड का प्रावधान तैयार किया गया: इसके द्वारा बहुसंख्यकों (हिन्दुओं) को प्रभुत्ववादी, दंगाई चरित्र एवं हिंसात्मक प्रकृति का माना गया, दूसरी ओर धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों को वंचित एवं पीडि़त ‘समूह’ (गु्रप) माना गया। दंगा होने पर राज्य सरकार को दोषी व अक्षम मानकर उसे भंग करके राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार केन्द्र सरकार को प्रदान किया गया। प्रशासनिक अधिकारियों को भी जेल भेजने का प्रावधान बनाया गया आदि आदि।
देश के प्रमुख सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों तथा कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा उक्त विधेयक के आपत्तिजनक, विभेदकारी प्रावधानों पर तीव्र प्रतिक्रिया व विरोध प्रकट किया गया। अत: इस प्रस्तावित बिल में कुछ धाराएँ निरस्त करते हुए नया प्रारूप तैयार किया गया। परिवर्तित विधेयक में भी कौन सी धाराएँ सामाजिक समरसता के विरुद्ध कार्य करती रहेंगी, उन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। संशोधित बिल का नाम है: साम्प्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक: 2013
-विचारणीय विषय क्र.1- विधेयक जम्मू कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होगा
विधेयक की धारा 1 (2) के अनुसार यह बिल जम्मू-काश्मीर पर लागू नहीं होगा जहाँ हिन्दुओं पर सर्वाधिक अत्याचार होते हैं तथा जहाँ कश्मीरघाटी से 1989 में 5 लाख कश्मीरी पंडितों को अपना घर, सम्पत्ति, नौकरी आदि सब छोड़कर बाहर निकाल दिया गया। 24 वर्ष बीत जानेपर भी आज तक उन कश्मीरी पंडितों को वापिस भेजकर कश्मीर घाटी में रहने की व्यवस्था नहीं की जा सकी। अपने ही देश में ये कश्मीरी पंडित, जम्मू व दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में तथा देश के अन्य कुछ भागों में अपना परित्यक्त जीवन जीने के लिए विवश हैं। हिन्दू उत्पीडऩ से जुड़ा प्रश्न होने के कारण इस विषय को साम्प्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक में क्या इसलिए नहीं रखा गया क्योंकि उत्पीडऩ करने, हत्या करने व राज्य से बाहर जाने को विवश करने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग हैं? क्या यही है कांग्रेसी धर्म निरपेक्षता?
-विचारणीय विषय क्र. 2- आतंकियों पर प्रहार करने वाली किसी कार्य प्रणाली का उल्लेख नहीं किया गया
अनु. 2 के अनुसार भारत से बाहर रहने वाला कोई भारतीय व्यक्ति यदि किसी भारतीय पर अत्याचार करता है तो इस कानून द्वारा वह दण्डनीय होगा। जम्मूकश्मीर, असम, नागालैंड आदि राज्यों के कई ऐसे उदाहरण हैं जब वहाँ से बाहर गए नागरिक आतंकवादी बनकर भारत के इन राज्यों में आतंक फैलाने, दंगा भड़काने व राज्य व केन्द्र सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने में अग्रगी रहे। यह कानून ऐसे अपराधियों पर किस प्रकार लागू होगा, इसका कोई विवरण प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके विपरीत अब 2013 में जम्मू-कश्मीर सरकार उन आतंकी मुस्लिमों को वापिस बुलाकर पुनर्वासित कर रही है जो पाक अधिकृत कश्मीर (POK) में रहकर आतंकवादी शिविरों का संचालन करने में संलग्न थे और जिनके कारण अब तक दस हजार से अधिक नागरिक व भारतीय सैनिक मारे जा चुके हैं।
-विचारणीय विषय क्र. 3- वर्तमान संसद के अन्तिम सत्र में ही प्रस्तुति क्यों?
क्या कारण है कि यह विधेयक गत 9 वर्ष में सत्तारुढ़ कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सका। परन्तु अब जबकि आगामी लोकसभा चुनाव को केवल 2-3 माह ही शेष रह गये हैं, तब इसे संसद के अन्तिम सत्र में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस कूटनीति से स्पष्ट हो जाता है कि वोट बैंक की राजनीति भुनाने के लिए अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण का एक माध्यम इस विधेयक को बनाया गया है।
-विचारणीय विषय क्र. 4- धर्म के साथ भाषा जनित विद्वेष को भी जोड़ा गया
बिल में साम्प्रदायिक विद्वेष के लिए धार्मिक मान्यताओं के साथ भाषा के आधार पर उत्पन्न वैमनस्य को भी दंगे के लिए उत्तरदायी माना गया है। इसका अर्थ होगा कि अब तक हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई के आधार पर जो साम्प्रदायिक दंगे होते रहे, उस आधारभूत कारण को ‘भाषा’ के साथ जोड़कर दंगा क्षेत्रों का विस्तार किया जाएगा। देश के अधिकतर राज्य भाषाई आधार पर ही निर्मित हुए हैं अत: यह प्रस्तावित विधेयक साम्प्रदायिक दंगों के साथ भाषाई दंगों का विस्तार करने का एक शासकीय व प्रशासनिक माध्यम बन जाएगा।
विचारणीय विषय क्र. 5
कानून व व्यवस्था Law and Order तथा जन-व्यवस्था Public Order अभी तक पूर्णत: राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। परन्तु इस विधेयक की धाराओं में केन्द्रीय हस्तक्षेप द्वारा राज्य सरकारों के कार्यक्षेत्रों (अधिकारों) को विभिन्न माध्यमों से नियंत्रित करने की व्यवस्था की गई है। यह संघीय ढाँचे की अब तक चली आ रही व्यवस्था को ध्वस्त करने का सोचा समझा राजनीतिक चक्रव्यूह है जो केन्द्र व राज्य सरकारों में एक कलयुगी महाभारत जैसा निरन्तर चलता रहने वाला संघर्ष का कारण बनेगा।
-विचारणीय विषय क्र. 6
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) जिसके द्वारा इस बिल का प्रारूप तैयार किया गया है, उस परिषद का कोई संवैधानिक आधार नहीं है। संसद में संविधान सम्बन्धी विधेयक की प्रस्तुति केवल किसी सांसद, संसदीय समिति या मंत्रिपरिषद द्वारा ही की जा सकती है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में ऐसे भी नाम हैं जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय अवांछनीय घोषित कर चुका है (यथा: तीस्ता सीतलवाड) तथा जिन पर हवाला से करोड़ों रुपये वसूलने के आरोप हैं (यथा-हर्ष मन्दर) आदि। ऐसे नामधारी सलाहकार क्या राष्ट्र के संविधान में नये विधेयक लाने के उचित पात्र माने जा सकते हैं?
-विचारणीय विषय क्र. 7
प्रस्तावित विधेयक की धारा 3 (क) व धारा 4 के अनुसार किसी साम्प्रदायिक परिस्थिति की जानकारी होना (Knowledge and Intent) अर्थात् संज्ञान होना भी किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करा सकता है। इसे अंग्रेजों के समय का ञ्जद्धशह्वद्दद्धह्ल ष्ह्म्द्बद्वद्ग विचार या चिंतन द्वारा किया गया अपराध माना जा सकता है। दंगों के इतिहास में कई बार ऐसी घटनाएँ हुई हैं जब मस्जिद से ध्वनि वद्र्धक द्वारा घोषित किये जाने के बाद दंगे प्रारम्भ हुए। ऐसी घोषणा किसी हिन्दू के द्वारा सुनी जाने पर माना जाएगा कि उसे भी दंगे का संज्ञान (Thought crime) था। यदि इस हिन्दू द्वारा-प्रशासन को नहीं बताया गया तो वह अपराधी की श्रेणी में रखा जाएगा।
शेष अगले अंक में पढ़ें

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