गाँधी की ‘चरखा भ्रांति’ से नहीं, सावरकर सुभाष की ‘रक्तिम क्रांति’ से आई थी आजादी : श्याम सुंदर पोद्दार

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भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के समय ब्रिटिश पार्लियामेंट में साम्राज्य सत्ता छोड़ने का समय आने के कारण दुःखी हुए चर्चिल के एक प्रश्न का निरुपाय होने से उत्तर देते समय तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमन्त्री एटली ने जिन तीन – चार वाक्यों में
ब्रिटेन की आवश्यकता का सूत्ररूप वर्णन किया है ।
वे इस प्रकार है—Britain is transferring power due to the fact that (1) The Indian mercenary army is no longer loyal to Britain and (2) Britain can not afford to have a large British Army to hold down India ‘.
इन दो सैनिक दुर्बलताओं के कारणवश ब्रिटेन को हिंदुस्तान छोड़ना पड़ा। अहिंसा का सिद्धांत समझ आने के कारण हमारा हृदय परिवर्तन हो गया अथवा साम्राज्यवाद अन्याय है इसलिए स्वेच्छा से हमने हिंदुस्तान छोड़ा’इस प्रकार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली अथवा क़िसी भी ब्रिटिश सदस्य ने नही कहा। अर्थार्थ सशस्त्र क्रांतिकारी पक्ष ने हिंदी सेना में ज़ो बिद्रोह फैलाया और पर राष्ट्रीय राजनीति पर सोच विचार करके ब्रिटेन के शत्रु के साथ संधि करते हुए उससे शस्त्रबल सम्पादन करके सशस्त्र क्रांतिकारियों ने रणभूमि में जो संघर्ष किया, उसी से ब्रिटिश सत्ता इस वैधानिक संकट में फँस गयी,इसका साक्षात ब्रिटिश प्रधान मंत्री के मुख से ही यह प्रमाण निकल रहा है।
२७ वर्ष में ११ वर्ष अंडमान की काले पानी की जेल। फिर ३ वर्ष भारतीय जेलों में क़ैद फिर नाशिक में जिलाबंदी तथा राजनीति करने पर प्रतिबंधित २७ वर्ष बाद वीर सावरकर १९३७ में जीवराज मेहता के बॉम्बे प्रेज़िडेन्सी का प्रधान मंत्री नही बनने के आगे झुकी सरकार ने वीर सावरकर को मुक्त किया।

रजगोपालाचारी, जवाहर लाल नेहरू.सुभाष बोस ने उनसे आग्रह किया कि वे कांग्रेस के अध्यक्ष बन जाएं। उन्होंने कहा कि यह तिलक वाली कांग्रेस नही रही , गांधी वाली बन गयी। इसमें शामिल होने का सवाल ही पैदा नही होता। उन्होंने तिलक स्वराज पार्टी को अपने अनुकूल समझा । मुस्लिम लीग की चुनौती व गांधी कांग्रेस की मुस्लिम परस्त राजनीति के सामने हिन्दू समाज को संगठित करना आवश्यक था तो उन्होंने पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा प्रतिष्ठित हिन्दू महासभा का अध्यक्ष बनना स्वीकार किया।
उन्होंने हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए नारा दिया’ राजनीति क़ा हिंदुकरण व हिन्दुओं का सैनिकीकरण’ द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों को १० लाख भारत के सैनिक चाहिए उन्होंने सावरकर जी से मदद माँगी। सावरकरजी ने पूर्ण सहयोग का आश्वासन यह कहते हुए दिया कि आपने १८५७ में हमसे अस्त्र ले लिए थे। आज आप अपने स्वार्थसिद्धि के लिये दे रहे है तो हम क्यों नही लेंगे ? युवकों ने उनसे प्रश्न किया कि हम ब्रिटिश के दलाल तो नही होंगे । युवकों से उनका जवाब होता एक बार ट्रेनिंग तो ले लो फिर समय आने पर तुम स्वयम समझ जाओगे कि बंदूक़ की नाल किधर घुमानी है ? मुस्लिम लीग बहुत चिल्लाने लगी । सावरकर ने सेना में हिन्दुओं को भर कर हिन्दू जहां ३२ प्रतिशत होते थे व मुस्लिम ६७ प्रतिशत उसको उल्टा क़र दिया , अब हिन्दू सेना में ६७ ! प्रतिशत हो गए व मुस्लिम ३२ प्रतिशत।
कांग्रेस सभापति पद पर २०५ वोटों से जीतने के बाद भी पहले तो गांधी ने सुभाष बाबू को कार्यकारिणी समिति गठन करने में रुकावट डालकर सभापति पद से त्याग पत्र देने को मजबूर कर दिया फिर कांग्रेस से निकल दिया। इस अवस्था में भविष्य का मार्ग दर्शन लेने हेतु २२जून १९४० को सुभाष बाबू बम्बई में सावरकर सदन में सावरकर जी से मंत्रणा करने पहुँचे। सावरकर जी के हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बनने पर विश्वव्यापी क्रांतिकारी लोग हिंदू महासभा में सम्मिलित होने लगे। आरएसएस के डॉक्टर हेडगेवार हिन्दू महासभा के मृत्यु पर्यन्त उपाध्यक्ष रहे। रासबिहारी बोस जापान हिन्दु महासभा के अध्यक्ष बने।
जब सिंगापुर पर जापानी सेना व भारतीय राष्ट्रीय सेना मिल कर ब्रिटिश आर्मी क़ा सामना कर रहे थे। तब रास बिहारी बोस ने युद्ध को रोक कर भारतीय सैनिकों से अपील की कि उन्हें मातृभूमि क़ी स्वतंत्रता के लिए लड़ना चाहिए। उनकी अपील का व्यापक असर हुआ। एक झटके में ४५००० सैनिक व ३०० अफ़सर आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गए। जापानी अफ़सर आश्चर्य चकित हो गए। सावरकर का सैनिकीकरण प्रयास स्वरूप लेने लगा। (Two great Indians in Japan by Mr. J.J.Oswaha क़ी पुस्तक से)

आज़ाद हिंद रेडियो पर २५ जून १९४४ को प्रसारित किये गए अपने भाषण में सुभाष बाबू ने कहा,’कांग्रेस के प्रायः अदूरदर्शी नेता ब्रिटिश हिंदी सेना को केवल भाड़े के टट्टू तथा पेटपेसुये कह क़र आते जाते निंदा करते थे ,फिर भी उत्साह जनक बात यह थी कि वीर सावरकर निर्भयतापूर्वक हिन्दी युवकों को सशस्त्र सेना में प्रवेश करने के लिए सतत प्रोत्साहित कर रहे है। ब्रिटिश हिंदी सेना में प्रविष्ट इन्ही हिंदी युवकों से आज हमारी हिंदी राष्ट्रीय सेना को I.N.A. को समर कला में प्रवीण और मुरब्बी प्रशिक्षितों (Trained Men) का तथा सैनिकों क़ा संभरण हो रहा है।
जापान पर अणु बम गिरने से द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ भारतीय राष्ट्रीय सेना के सिपाहियों पकड़ कर लाकर लाल क़िले में उन पर क़ेस चलाया गया तथा ढिल्लों,सहगल, शहनवाज को जब सजा सुनायी गयी तो १८ फ़रवरी १९४६ को बम्बई कराची नौसेना में विद्रोह हो गया , दूसरे दिन वायुसेना में हरताल के साथ पहुँच गया। यह थलसेना में पहुँचे उसके पहले वायसराय ने घोषणा कर दी । आज़ाद हिंद सेना पर सब क़ेस वापस होंगे, सब सजा वापस ली जाती है। आप लोग अपने – अपने बैरक में चले जाएं , भारत को आज़ादी दीं जाएगी। २३ फ़रवरी १९४६ यह घोषणा वायसराय ने कर दीं।
वीर सावरकर की बात को स्मरण करते हुवे सैनिकों ने बंदूक़ की नाल अंग्रेजों की तरफ़ मोड़ दी और भारत माता स्वतंत्र हो गयी।

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