अधिकार से पहले कर्तव्य , अध्याय – 16 , सांप्रदायिक सद्भाव एवं सतर्कता

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अधिकार से पहले कर्तव्य —— अध्याय — 16

सांप्रदायिक सद्भाव एवं सतर्कता

भारत प्राचीन काल से ही सद्भाव , सम्मैत्री , करुणा , एकता , भाईचारे और सांप्रदायिक सद्भाव की शिक्षा देने वाला देश रहा है । यही कारण रहा है कि विश्व में भारतीय संस्कृति को सबसे उत्तम ,अनुपम और अनोखी माना गया है । मानवतावाद को विकसित करने का गुण केवल भारतीय संस्कृति में है , और उसका कारण केवल एक ही है कि यह सद्भाव की समर्थक संस्कृति है तथा विश्व में प्रेम ,अहिंसा और बंधुत्व की प्रचारक और प्रसारक सबसे प्राचीनतम और महान संस्कृति है।

भारत की राजनीति की विशेषता

भारत का सामाजिक और राजनीतिक चिंतन भी उपरोक्त वर्णित मानवीय मूल्यों पर आधारित रहा है। यही कारण रहा है कि भारत की राजनीति प्राचीन काल से ही राष्ट्रपरक और वैश्विक परिवारवाद अर्थात वसुधा को ही परिवार मानने और प्रोत्साहित करने वाली रही है। इस प्रकार भारत का राजनीतिक और सामाजिक चिंतन विश्व के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाता रहा है। भारत ने विश्व को लोकतांत्रिक विचारधारा प्रदान की । लोकतांत्रिक विचारधारा की विशेषता होती है कि उसमें ‘सांप्रदायिक सद्भाव और सतर्कता’ के लिए विशेष स्थान होता है। कोई भी राजा या शासक वर्ग का कोई भी कर्मचारी या अधिकारी यहां तक कि एक सामान्य व्यक्ति भी अपने कार्य व्यापार मे , विचारों में या अपने आचरण में कहीं से भी ऐसा कोई संकेत नहीं देगा कि वह दूसरे व्यक्ति से इस आधार पर घृणा करता है कि वह दूसरे मत ,पंथ या संप्रदाय को मानने वाला है।
अपने इन्हीं उत्कृष्ट गुणों के कारण भारत प्राचीन काल से ही समाज के विभिन्न संप्रदायों के मध्य सद्भाव स्थापित किए रखने में सफल रहा है । जातिवाद व सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर यहाँ के सम्राटों व राजाओं ने कार्य करने का प्रयास किया। इसी को उन्होंने अपना राष्ट्रधर्म घोषित किया
वास्तव में भारतीय शासकों का यह राष्ट्रधर्म ही वास्तविक पंथनिरपेक्षता है।
हमारा मानना है कि भारत ने सांप्रदायिक विविधताओं को स्वीकार करके भी और उन्हें भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देकर भी अपनी शास्त्रार्थ परम्परा के माध्यम से उन सबको किसी एक ‘परम सत्य’ पर सहमत होने के लिए प्रेरित किया। इसी सहमति के कारण भारत में दीर्घकालिक सांप्रदायिक सद्भाव बना रहा । क्योंकि अंततः सब किसी एक ‘परम सत्य’ को मानने वाले और स्वीकार करने वाले बने रहे। राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखने और सामाजिक भाईचारे को समरस बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि संपूर्ण देशवासी एक देव , एक देश , एक संस्कृति , एक भाषा , एक भेष के उपासक हों । भारत में सांप्रदायिक सद्भाव वहीं वहीं छलका है जहां किसी एक ‘परम सत्य’ पर आम सहमति को भंग करने वाले स्वर उभरे हैं या उन्होंने देश की आम सहमति को भंग करने का घृणास्पद कार्य किया है।
भारत की राजनीति ने विशेष मत का सदैव समर्थन किया है । क्योंकि विशेष मत प्रकट होने से संवाद ऊंचा होता है और हम किसी सही निष्कर्ष पर पहुंचने में समर्थ होते हैं । भारत में दिखाई देने के लिए तो अनेकों सम्प्रदाय प्राचीन काल से हैं , परंतु वे सभी वेद और वैदिक ज्ञान के प्रति निष्ठावान रहे हैं । कुछ-कुछ पूजा पद्धतियां अलग-अलग अपनाई गयीं ,किन्तु इसके उपरांत भी उनका किसी एक ‘परम सत्य’ सत्ता में विश्वास अविचल और अडिग रहा ।यद्यपि धीरे – धीरे इन संप्रदायों ने भी सत्य का गला घोटना आरम्भ कर दिया और वैदिक मत या मान्यताओं को उनके इस प्रकार के आचरण से भारी क्षति हुई । इस विषय पर प्रकाश डालना हमारे लिए उचित नहीं होगा । हम यहां पर केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि ऐसी विपरीत परिस्थितियों के होते हुए भी भारत में सांप्रदायिक सद्भाव बना रहा । इसका कारण एक ही था कि चाहे जैनी लोग हों , चाहे बौद्ध हों और चाहे हिंदू समाज के भीतर पाए जाने वाले अन्य विभिन्न संप्रदायों के लोग हों , सबकी आस्था इस देश की वैदिक संस्कृति , वैदिक मान्यताओं , वैदिक सिद्धांतों के प्रति तो अडिग रही ही साथ ही देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने में भी इन लोगों ने अपने अपने स्तर पर सहयोग दिया । कहने का अभिप्राय है कि ना तो सांस्कृतिक विभेद पैदा हुआ और ना ही राष्ट्रीय एकता और अखंडता को नष्ट करने का कोई विचार कहीं से जन्मा । इसके अतिरिक्त एक बात और भी अधिक महत्वपूर्ण यह रही कि कभी भी किसी भी संप्रदाय ने दूसरे संप्रदाय के लोगों का सामूहिक नरसंहार करने के लिए कोई राजनीतिक गुट तैयार नहीं किया । ना ही किसी प्रकार की लुटेरी सेना तैयार की और ना ही एक दूसरे के हितों को चोट पहुंचाने के लिए अपने – अपने अलग – अलग राज्य स्थापित किए।

सांप्रदायिक सद्भाव की सीमाएं

कुछ लोग भारत में सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए यह तर्क देते हैं कि भारत में प्राचीन काल से ही सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने के प्रति लोगों में सतर्कता बनी रही है । इस बात से किसी सीमा तक हम भी सहमत हैं , परंतु हमारी सहमति वहीं तक है जहां तक देश की एकता और अखंडता को बनाए रखकर और देश के सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति एकमत बने रहकर लोग कार्य करने के स्वभाविक अभ्यासी होते हैं । साथ ही किसी विपरीत सम्प्रदाय के लोगों के अधिकारों का शोषण न करते हैं और ना ही दूसरे सम्प्रदाय पर जबरन शासन करके उन्हें लूटते , काटते या मारते हैं – वहीं पर यह साम्प्रदायिक सद्भाव इस प्रकार जीवित रह सकता है।
जहाँ एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय के सांस्कृतिक मूल्यों से घृणा करता है या उन्हें नष्ट कर अपने साम्प्रदायिक सांस्कृतिक मूल्यों को दूसरे सम्प्रदाय पर थोपने का प्रयास करता है या देश को तोड़ने की गतिविधियों में संलिप्त मिलता है या दूसरे सम्प्रदाय के लोगों का नरसंहार कर उन पर शासन करने की तिकड़में बैठाता है , वहाँ साम्प्रदायिक सद्भाव को बनाए रखना बड़ा कठिन होता है। वहाँ पर साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रति सतर्कता की भावना और भी अधिक बढ़ जानी चाहिए। वहाँ साम्प्रदायिक सद्भाव तभी विकसित हो सकता है जब या तो दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करने की नीति पर काम किया जाए या कठोर कानून बनाकर सरकार ऐसे लोगों को देश की मुख्यधारा के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए बाध्य करे जो किसी भी प्रकार से साम्प्रदायिक संकीर्णता का परिचय देते हुए लोगों के अधिकारों का हनन करते हों ।
भारत के विषय में यह सच है कि ये देश सांप्रदायिक संकीर्णता को अपनाने वाला देश कभी नहीं रहा। परंतु यह अपनी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रति सदैव सतर्क रहा है , इसलिए इसने साम्प्रदायिक संकीर्णता का परिचय देने वाली शक्तियों का सैकड़ों वर्ष तक जमकर सामना किया है। आज भी साम्प्रदायिक संकीर्णता का परिचय देने वाली शक्तियां देश के भीतर सक्रिय हैं । जो देश की एकता और अखण्डता को तार-तार कर देना चाहती हैं और किसी भी प्रकार से किसी सम्प्रदाय विशेष का शासन स्थापित कर एक सम्प्रदाय को समूल नष्ट कर देने के षडयंत्रों में संलिप्त हैं।
संसदीय लोकतंत्र में अपनी गहन आस्था और प्रतिबद्धता के लिए विख्यात भारत विविधता में एकता का अनूठा संगम माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि आधुनिक भारत के निर्माताओं की बौद्धिक सूझबूझ एवं प्रयासों का ही परिणाम है कि स्वतंत्रता के बाद हम अपने देश की विविधता और अखण्डता की रक्षा करने में सफल रहे। इस पर हमारा मानना है कि हम देश में साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रति पूर्णतया सतर्क व सावधान रहने के साथ – साथ हम अपने देश की एकता और अखंडता के प्रति शत्रुभाव रखने वाले लोगों के प्रति भी सावधान और सतर्क रहें। जो भारतवर्ष की सांस्कृतिक विरासत को तो नष्ट करना ही चाहते हैं साथ ही इस देश को तोड़ देने का विचार भी रखते हैं और सनातन मूल्यों में विश्वास रखने वाले लोगों का सामूहिक नरसंहार कर सत्ता को कब्जाने की चालों में फँसे रहते हैं।

कौन करते हैं सांप्रदायिक दंगे शुरू

राष्ट्रवादी लेखक और चिंतक विनोद सर्वोदय जी का यह कथन बहुत ही प्रासंगिक है :– “आज समाज जागरुक हो गया है। अब असत्य व अन्याय सहकर प्रताड़ित होंते रहने का समय नहीं, हिंदुओं ने एक तरफा हुए अपने ही सगे-संबंधियों के भीषण कत्लेआमो को झेला है । उन्होंने अपनी भीरुता और कायरता से हज़ारों मंदिरो को विंध्वस होते देखा है और साथ ही अपनी व देश की अनन्त सम्पदा को लुटवाया है। अत्याचारों से चीखती -विलखती बहन बेटियों की चीत्कार को आज भी भुलाया नहीं जा सकता। कब तक इतिहास के काले पन्ने सार्वजनिक नहीं किये जायेंगें ? एक वर्ग दूसरे वर्ग को लूटता रहें , उनकी बहन बेटियों को उठाता रहें, उसकी दुकान -मकान आदि सम्पति को जलाता रहे तो वो कब तक चुप रहकर क्यों कर सद्भाव की बड़ी बड़ी बातें कर पायेगा ? जबकि “द पॉलिटिक्स ऑफ कम्युनिलिज्म 1989″ की लेखिका एवं मुस्लिम स्कॉलर जैनब बानो के अनुसार यह स्पष्ट होता है कि 75% साम्प्रदायिक दंगों की शुरुआत मुसलमान ही करते है । दशकों पूर्व जब भिवंडी ( महाराष्ट्र) में हुए दंगो पर 14 मई 1970 को जनसंघ के नेता के रुप मे श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कहा उसके कुछ अंश… ” डेढ साल में हुए प्रमुख दंगो के कारणों की जांच एवं उसके विवरण भारत सरकार के द्वारा तैयार एक रिपोर्ट में उपलब्ध हैं। उस काल में 23 दंगे हुए और मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार उन 23 दंगों में से 22 दंगों का प्रारंभ उन लोगों ने किया जो अल्पसंख्यक समुदाय के माने जाते है।” (वही पृष्ठ-254)। ऐसे में साम्प्रदायिक सद्भाव एक मृग मरीचिका से अधिक और कुछ नही। ”

क्या कहता है कानून ?

केन्द्र सरकार ने आतंकवादी और साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों की सहायता के लिए केन्द्रीय योजना आरम्भ की है। इसके अन्तर्गत प्रभावितों को मुआवजे के अलावा एक बार तीन लाख रुपए की सहायता दी जाती है। सरकार ने ‘धार्मिक संस्थान (दुरुपयोग की रोकथाम) कानून, 1988’ बनाया है। जिसका उद्देश्य किसी भी धार्मिक स्थल की पवित्रता को बनाए रखना तथा राजनीतिक, आपराधिक एवं विध्वंस या साम्प्रदायिक कार्यों के लिए दुरुपयोग किए जाने पर रोक लगाना है। इस कानून में किसी भी धार्मिक स्थल के भीतर हथियारों एवं आग्नेयास्त्रों के भण्डारण पर पाबन्दी है। इसमें प्रबन्धकों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे ऐसी किसी भी स्थिति के उत्पन्न होने पर धर्मस्थल का दुरुपयोग रोके जाने के लिए पुलिस को जानकारी दें।
पूजा स्थल (विशेष स्थान) कानून, 1991 में पूजा के किसी भी स्थल की स्थिति, जो 15 अगस्त 1947 को विद्यमान थी, को बदलने पर पाबन्दी लगाई गई है। इस कानून के अनुसार किसी भी धार्मिक संस्थान या उसके प्रबन्धक द्वारा ऐसे किसी भी परिसर का उपयोग किसी राजनीतिक गतिविधि या किसी अपराधी को शरण देने के लिए नहीं किया जा सकता है। बिना किसी वैध लाइसेंस या अनुमति के किसी भी धार्मिक स्थल मे किसी तरह का नया निर्माण न तो किया जा सकता है और न ही विद्यमान निर्माण में किसी भी तरह से फेरबदल/हटाने का काम किया जा सकता है। ऐसे स्थलों का उपयोग किसी भी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए किया जाना तथा विभिन्न धार्मिक समुदायों, नृजातियों, भाषाओं, जातियों, धर्मों या क्षेत्रीय समूहों के बीच किसी भी तरह की दुर्भावना फैलाने के लिए नहीं कर सकते हैं।
हमारा मानना है कि हम अपने देश में किसी भी व्यक्ति से इस आधार पर घृणा न करें कि वह हमसे अलग पूजा पद्धति रखता है – यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य होना चाहिए । साथ ही हम स्वयं को राष्ट्र के सुरक्षा प्रहरी मानकर इस बात के प्रति भी सतर्क रहें कि कोई भी व्यक्ति साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह से इतना ग्रसित ना हो जाए कि वह देश की एकता और अखण्डता को या इस देश के सांस्कृतिक मूल्यों को या संवैधानिक परम्पराओं को नष्ट करने की सोचता हो । ऐसे व्यक्ति या व्यक्ति समूहों के प्रति भी हमारा कर्तव्य है कि उन्हें हम कठोर दंड दिलाने के लिए कानून के हाथों में सौंपें । साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के नाम पर प्रत्येक व्यक्ति को सहन करना या फिर प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सहिष्णुता का भाव रखना भी आत्मघाती होता है । अतः ऐसी प्रवृत्ति से बचना ही उचित सतर्कता को अपनाना माना जाना चाहिए।

भारत श्री राम और भरत का देश है

भारत प्राचीन काल से ही लोकतांत्रिक देश रहा है। इसमें लोकतंत्र के गहरे भाव मिलते हैं । इसका समर्पण उन मूल्यों के प्रति है जो सबको विकसित होने देने का अवसर देते हैं । सत्तामोह को त्यागने के सन्दर्भ में यह देश श्रीराम और भरत का देश है । जिन्होंने सत्ता को या राजगद्दी को ही फुटबॉल बना कर रख दिया था । यही कारण रहा है कि यहां पर कभी सत्ता के लिए संघर्ष नहीं हुआ । स्वतंत्रता के उपरांत के अब तक के वर्षों में भी हमने देखा है की जनता ने जो भी निर्णय दिया उसे प्रत्येक राजनीतिक दल ने स्वीकार किया । जनता ने अच्छे-अच्छे शासकों के हाथों से सत्ता छीनकर दूसरों को सौंप दी । यह तभी संभव हुआ है कि जब हमारे देश के मौलिक चरित्र में लोकतांत्रिक गुण और गरिमा समाविष्ट रहे हैं।
जबकि इसी धरती पर चीन जैसे देश भी रहे हैं जो लगभग भारत के साथ ही स्वतंत्र हुए , परंतु वे अपने लोकतांत्रिक स्वरूप को बचा नहीं पाए । वहां के लोग आज तक भी लोकतंत्र नाम की चिड़िया को जानते नहीं हैं और वे किसी एक राजनीतिक दल की तानाशाही को झेलने के लिए अभिशप्त है।
भारत का संविधान भी साम्प्रदायिक सद्भाव और सामाजिक समरसता के प्रति समर्पित रहने के लिए हमें प्रेरित करता है । हमारे संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का संकल्प लिया गया है। संविधान की प्रस्तावना में ही यह भी संकल्प व्यक्त किया गया है कि हम भारत के लोग – – – – – समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और (राष्ट्र की एकता और अखण्डता) सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ईसवीं (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्-द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
भारत के संविधान की प्रस्तावना में मूल रूप में भारत को एक ‘सेकुलर ‘ देश बनाने का संकल्प व्यक्त किया गया । ‘सेकुलर’ शब्द को 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा हिंदी में ‘पंथनिरपेक्ष राज्य’ के रूप में परिभाषित किया गया ।
‘पंथनिरपेक्ष राज्य ‘ का अभिप्राय है कि राज्य का अपना कोई सम्प्रदाय या मजहब नहीं होगा । वह न्याय करते समय देश के समस्त नागरिकों को बिना किसी पक्षपात के और बिना किसी साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह के न्याय प्रदान करेगा । राज्य सामाजिक , आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय प्रदान करते हुए अपने देशवासियों को विकास के सभी अवसर उपलब्ध कराएगा । संविधान की इस भावना को राज्य की ‘लोक कल्याणकारी सद्भावना’ के रूप में समझा जाना चाहिए । जिस राज्य की ऐसी ‘लोक कल्याणकारी सद्भावना’ होती है , उस राज्य के सभी नागरिकों को अपना सर्वांगीण विकास करने के सभी अवसर सहज रूप में उपलब्ध हो जाते हैं । इसके अतिरिक्त जिस देश की सरकारों का दृष्टिकोण ऐसा होता है वहां के नागरिकों में भी सहज रूप में एक दूसरे का सहयोग करने और सद्भाव बनाए रखने का भाव स्वयं ही पैदा हो जाता है । भारत में पन्थनिरपेक्षता की इस भावना को शासक वर्ग ने ‘वोट बैंक’ की स्वार्थपूर्ण राजनीति के साथ नत्थी कर दिया । जिससे राज्य की ‘लोक कल्याणकारी सद्भावना ‘ का पवित्र भाव कुण्ठित हुआ।फलस्वरूप राजनीतिक दल साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह से ग्रसित हो गए । ‘ यथा राजा – तथा प्रजा ‘ – का भाव लोक में प्रस्फुटित हुआ , जिससे लोग भी परस्पर साम्प्रदायिक विद्वेष रखने वाले बनते चले गए।
समय की आवश्यकता है कि लोग दूषित राजनीति के इस प्रदूषित भाव को छोड़कर सांप्रदायिक सद्भाव पैदा करें । केवल उन लोगों के प्रति सतर्कता बरतें जो हमारे देश में किसी भी प्रकार से आग लगाने की योजनाओं में सम्मिलित रहते हैं।

साम्प्रदायिकता को परिभाषित किया जाना चाहिए

वास्तव में हमारे देश में इस समय सांप्रदायिकता क्या है और साम्प्रदायिक सद्भाव किसे कहते हैं ? – यह स्पष्ट परिभाषित किया जाना बहुत आवश्यक हो गया है। राजनीतिक दलों ने साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक सद्भाव दोनों की ही परिभाषाओं को विकृत कर दिया है। अपने-अपने स्वार्थों में इन शब्दों की यह परिभाषाएं गढ़ते हैं और देश में हिन्दू मुस्लिम दंगे कराते हैं या फिर साम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाड़कर अपने राजनीतिक लाभ प्राप्त करते हैं। ऐसे में देश के जागरूक लोगों का यह कर्तव्य है कि वे साम्प्रदायिक सद्भाव और साम्प्रदायिकता की वैज्ञानिक और समयानुकूल परिभाषा स्थापित करें । उनका यह भी कर्तव्य है कि यदि राजनीतिक दल कहीं भी और किसी भी प्रकार से अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति करने के लिए साम्प्रदायिक सद्भाव और साम्प्रदायिकता का अपने-अपने ढंग से अर्थ निकालते हैं या अर्थों को विकृत करते हैं तो ऐसे राजनीतिक दलों को जनता नकार दे।
हमारे देश में साम्प्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय साम्प्रदायिक प्रतिष्ठान की भी स्थापना की गई है । यह प्रतिष्ठान गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में स्वायत्तशासी निकाय है । प्रतिष्ठान का मुख्य कार्य साम्प्रदायिक, जातीय, नृजातीय, आतंकवादी और हिंसा के अन्य रूप, जो सामाजिक सद्भाव में दरार डालते हैं, से प्रभावित बच्चों के पुनर्वास में सहायता करने के कार्यक्रमों और परियोजनाओं को कार्यान्वित करना है। साम्प्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के कार्यक्रमों को आयोजित करने के लिए प्रतिष्ठान शिक्षा संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों और राज्य सरकारों/संघ राज्य क्षेत्र प्रशासनों को वित्तीय सहायता भी प्रदान करता है। प्रतिष्ठान हर वर्ष 19 से 25 नवंबर तक राष्ट्रीय एकता सप्ताह के साथ ‘सांप्रदायिक सद्भाव अभियान’ सप्ताह मनाता है। सप्ताह के दौरान लोगों में सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीयता के मूल्यों को बढ़ावा देने और सामाजिक सद्भभाव का अतिक्रमण करने वाले तत्वों के विरुद्ध जागरूकता फैलाने का कार्य किया जाता है।
प्रतिष्ठान हर वर्ष साम्प्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान करने वाले ‘व्यक्ति’ और ‘संगठन’ की श्रेणी में राष्ट्रीय साम्प्रदायिक सद्भाव पुरस्कार प्रदान करता है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के लिए दो लाख रुपए की राशि तथा संगठन की श्रेणी के लिए पांच लाख रुपए की राशि एवं प्रशस्तिपत्र प्रदान किये जाते हैं।

क्या कहते हैं गांधीजी ?

देश की शांति, साम्प्रदायिक सद्भाव और सुरक्षा को प्रभावित करने वाले सभी कट्टरवादी साम्प्रदायिक संगठनों अथवा समूहों की गतिविधियों पर कानून प्रवर्तनकारी एजेंसियों की सतत् निगरानी रहती है।
दुख का विषय यह है कि देश में जहाँ पर इतनी सतर्कता बरती जाती है , वहाँ पर भी राजनीति सारी व्यवस्था का गुड़ गोबर करती पाई जाती है। जनसाधारण पर यह एजेंसियां अपने ढंग से प्रतिबन्ध लगा सकती हैं या उनकी आपराधिक प्रवृत्ति को कानून के शिकंजे में कसकर देश के सामने ला सकती हैं , परंतु उन राजनीतिक लोगों पर कोई भी कार्यवाही करने से वह भी हिचक जाती हैं जो ऐसी गतिविधियों को अपने राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए करते या कराए जाते पाए जाते हैं।
महात्मा गांधी ने ‘हिन्द-स्वराज’ पुस्तक में ‘हिन्दुस्तान की दशा-3 हिन्दू-मुसलमान’ में कहा हैः — ” हिन्दुस्तान में चाहे जिस धर्म के आदमी रह सकते हैं, उससे वह एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है। जो नये लोग उसमें दाखिल होते हैं, वे उसकी प्रजा में घुल-मिल जाते हैं। ऐसा हो, तभी कोई मुल्क एक राष्ट्र माना जाएगा। ऐसे मुल्क में दूसरे लोगों का समावेश करने का गुण होना चाहिए। हिन्दुस्तान ऐसा था और आज भी है। यों तो जितने आदमी उतने धर्म ऐसा मान सकते हैं। एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एस-दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते, अगर देते हैं तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं हैं…।”
महात्मा गांधी जी का यह चिंतन हमें स्वीकार्य है ।
उन्होंने यह अच्छी बात कही है कि भारत में चाहे जिस धर्म ( सम्प्रदाय ) का व्यक्ति रह सकता है , क्योंकि यह भारत का मौलिक संस्कार है कि वह सभी संप्रदायों को और विभिन्न पूजा पद्धति मानने वाले लोगों को सम्मान देता है। साम्प्रदायिक सद्भाव का यह एक अच्छा उदाहरण हो सकता है कि कोई देश स्वाभाविक रूप से इस प्रकार रहने का अभ्यासी हो । अतः हमारा मानना है कि गांधी जी के इस सिद्धांत की भी अपनी सीमाएं हैं। निश्चित रूप से इस सिद्धांत के अपवाद हैं और वे अपवाद कुछ और नहीं बल्कि यही हैं कि भारतवर्ष हर किसी के लिए सैरगाह और सराय नहीं है । जिसमें जिस किसी का मन किया वही घूमने के लिए चला आया और यहीं आकर रहने लगा । हमें इतनी सतर्कता बरतनी ही पड़ेगी कि जो व्यक्ति यहाँ पर शत्रु भाव से आता है या आता रहा है या इस समय भी आ रहा है , व्यक्ति के लिए इस देश के दरवाजे बन्द होने चाहिए और उसके प्रति शासन सहित जनसामान्य भी सतर्क रहे। जो लोग बाहरी होकर भी इस देश की जनता के साथ घुल मिल जाएं और हमारे देश भारतवर्ष को अपना देश मानकर इसकी सांस्कृतिक विरासत के प्रति श्रद्धा भाव रखने वाले होकर इसके राष्ट्रीय प्रतीकों और मूल्यों में आस्था रखने वाले हों , उन्हें इस देश का स्वाभाविक नागरिक मानना चाहिए।
गांधीजी का उपरोक्त यह कथन अक्षरश: स्वीकार किया जाना चाहिए कि जो लोग विपरीत धर्मी होकर एक दूसरे के धर्म का सम्मान नहीं करते , वह इस देश के नागरिक या एक राष्ट्र होने के योग्य नहीं हैं ।
गांधीजी के उपरोक्त शब्दों में ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग किया गया है । हमारे विचार से यहाँ पर ‘सम्प्रदाय’ शब्द आना चाहिए । क्योंकि सम्प्रदाय या मजहब या रिलीजन ही वह वायरस है जो साम्प्रदायिकता के बीज बोकर लोगों में विवाद उत्पन्न करवाता है । जबकि ‘धर्म’ वह निर्मल जलधारा है जो दो समुदायों के बीच की कटुता को शान्त कर देती है। उनकी आग को बुझा देती है और उनमें अध्यात्म की प्यास जगा देती है।

साम्प्रदायिक दंगों की वास्तविकता

अब हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि देश में साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखना किस लिए आवश्यक है ? इस प्रश्न के उत्तर पर यदि विचार किया जाए तो पता चलता है कि देश में जब भी और जहां कहीं भी साम्प्रदायिक दंगे होते हैं तो उसमें गरीब लोग अधिक मारे जाते हैं । जिन बहनों के भाई चले जाते हैं या जिन बहनों के पति मारे जाते हैं या किसी वृद्ध पिता का कोई जवान बेटा मारा जाता है या किसी मां का लाल मार दिया जाता है , यह दर्द उन्हीं को पता होता है कि ऐसा होने से उनके जीवन में कितना गहरा अंधकार छा जाता है ? माना कि कुछ लोगों की राजनीतिक स्वार्थ इन सांप्रदायिक दंगों में पूरे हो जाते हैं और यह भी माना जा सकता है कि कुछ धर्म के ठेकेदारों की दुकानदारी भी चमक जाती है तो कुछ समाज के ठेकेदारों की ठेकेदारी पर भी चमक आ जाती है , परंतु जिन लोगों के जीवन में अंधकार छा गया , उनके अंधकार की गहरी स्याही को तो जीवन भर कोई नहीं मिटा सकता।
हमारी मानवता इसी में है कि हम प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में प्रकाश भर दें , रोशनी कर दें , उजाला भर दें , उसे यह आभास करा दें कि तेरे चारों ओर मनुष्य ही रहते हैं । जो तेरे शुभचिंतक हैं। हित चिंतक हैं। तेरे प्रति अपने कर्तव्य को समझते हैं और तेरे अधिकारों की रक्षा करना ही अपना सबसे बड़ा कर्तव्य मानते हैं। इस पवित्र भावना का नाम ही वास्तविक अर्थों में साम्प्रदायिक सद्भाव को विकसित करना है। देश और समाज में इस प्रकार साम्प्रदायिक सद्भाव का सन्देश लेकर काम करने वाले लोगों के काम में जो षड्यंत्रकारी शक्तियां बाधा डालें , उनको मिटाना , उनको समाप्त कर देना या उन पर कड़ी चौकसी रखना साम्प्रदायिक सद्भाव की सुरक्षा के लिए बरती जाने वाली अपेक्षित सतर्कता है । बस , आज के सन्दर्भ में हमें सांप्रदायिक सद्भाव और सतर्कता के इस अन्योन्याश्रित सम्बन्ध को समझने की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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