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संसार का सुख क्षणभंगुर है।लेकिन मुक्ति का आनंद वर्णनातीत है जो केवल अनुभव किया जा सकता है । उस परमानंद के सामने सांसारिक सुख कदापि महत्व नहीं पा सकते ।मानव के जीवन का उद्देश्य एकमात्र यही है कि वह परम आनंद को पाता रहे। परमानंद को पाकर उसकी पूर्ण आयु ,महाकाल पर्यंत रमण करता रहे ।इस महान दुखों के सागर अर्थात संसार के दुखों में न पड़े।
शुद्ध कर्म और परमेश्वर की उपासना के द्वारा मृत्यु के दु:ख से मानव पार हो सकता है अर्थात पवित्र कर्म ,पवित्र उपासना और पवित्र ज्ञान से ही मुक्ति होती है । अपवित्र तथा मिथ्या भाषण आदि कर्म, पाषाण मूर्ति आदि की उपासना और मिथ्या ज्ञान से मनुष्य बंधन में पड़ता है अर्थात आवागमन के बंधन में पड़ा रहता है। यह मनुष्य ही है कि जो एक क्षण भी कर्म, उपासना और ज्ञान से रहित नहीं रहता । इसलिए धर्म युक्त सत्य भाषण आदि कर्म करना और मिथ्या भाषण आदि अधर्म को छोड़ देना ही मुक्ति का साधन है।
जो जीव अधर्म और अज्ञान में फंसा है , वही आवागमन के बंधन में पड़ा हुआ है।इसके लिए मनुष्य को विद्या और अविद्या की पहचान कर लेना बहुत आवश्यक होता है। मनुष्य अविद्या से , कर्म उपासना से मृत्यु को तर करके विद्या अर्थात यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है।

जो जीव दु:ख को छुड़ाना और सुख को प्राप्त करना चाहे वह अधर्म को छोड़ धर्म अवश्य करें ,क्योंकि दुख का कारण पापाचरण और सुख का कारण धर्म आचरण है। जीव को सत पुरुषों के संग से विवेक अर्थात सत्यासत्य ,धर्म – अधर्म ,कर्तव्य – अकर्तव्य का निश्चय अवश्य करना चाहिए । जीव पंचकोशों अन्नमय, मनोमय, प्राणमय , विज्ञानमय व आनंदमय कोष का विवेचन भी करें।

मोक्ष और बंधन किसको कहते हैं ?

छूट जाने का नाम मुक्ति है। जिसमें दु:ख में पड़ा नहीं रहना चाहते। दु:ख से छूटना चाहते हैं ।दु:ख संसार में आवागमन है। जन्म और मृत्यु है वह दु:ख के कारण होते हैं। इसलिए मनुष्य उनसे छूटना चाहता है ।मुक्ति में जाना चाहता है। मुक्ति में सुख को प्राप्त करके ब्रह्म में रमण करना चाहता है। ऐसी मुक्त आत्माएं स्थूल शरीर छोड़कर संकल्प में शरीर से आकाश में परमेश्वर में विचरते हैं , क्योंकि जो शरीर वाले होते हैं वे सांसारिक दुख से रहित नहीं हो सकते। स्थूल शरीर तो मरण धर्मा है। ऐसी मुक्त आत्माओं को जो ब्रह्म में रहती है ,को सांसारिक सुख – दु:ख का आभास भी नहीं होता ।वह सदा आनंद में रहता है। इसीलिए उसको परमानंद तथा उस स्थान को परमधाम भी कहते हैं।यदि मनुष्य ऐसा चाहता है तो उसको परमात्मा की आज्ञा का पालन करना होगा । मनुष्य को अधर्म ,अविद्या कुसंग ,कुसंस्कार, बुरे व्यसनों से बचना होगा और सत्य- भाषण, परोपकार, विद्या ,पक्षपात रहित न्याय ,धर्म की वृद्धि करने ,ईश्वर की स्तुति प्रार्थना ,उपासना ,योगाभ्यास करना, विद्या पढ़ना – पढ़ाना, और धर्म से पुरुषार्थ कर ज्ञान की उन्नति करना ,सबसे उत्तम साधनों को करने और जो कुछ करें वह सब पक्षपात रहित न्याय, धर्म अनुसार ही करे। ऐसे साधनों से मुक्ति और इनसे विपरीत कार्य करने से मनुष्य आवागमन के बंधन में पड़ता है।

मुक्ति से लौटना

मुक्ति से जीव फिर कब धरती पर आता है ? कितना समय सब मुक्ति में रहता है ?
परमात्मा जीव को मुक्ति का आनंद प्राप्त कराकर उन्हें माता पिता का संबंध जन्म देकर माता पिता का दर्शन करवाता है । वही परमात्मा मुक्ति की अवस्था करता सबका स्वामी है । किंतु बंधन और मुक्ति सदा नहीं रहती है।
जब आत्मा परमात्मा में अत्यधिक लंबे समय तक रमण करता जाता है तब संसार में आने की, पुनः जन्म धारण करने की इच्छा उसकी प्रबल होती है। तब वह परमात्मा की कृपा से संसार में पुनर्जन्म धारण करता है । मुक्ति में परमानंद को भोग के पुनः महाकल्प के पश्चात मुक्ति सुख को छोड़कर संसार में जीव आते हैं।
परमात्मा की सृष्टि की वर्ष संख्या इस समय कुछ कम लेकिन 2 अरब वर्ष है।परंतु यहभी स्पष्ट किया जाता है कि यह समय मनुष्य की उत्पत्ति का नहीं है। यह सृष्टि की उत्पत्ति के आरंभ से आज तक का है। सृष्टि उत्पत्ति तब से मानी जाती है जब से सृष्टि का बनना आरंभ हुआ। यह वह समय है जब प्रलय का समय पूरा होकर सृष्टि का बनना आरंभ होता है अर्थात मुक्त प्रकृति का परस्पर संघात आरंभ होता है और परमाणु से द्वयणुक आदि बनने आरंभ होते है। इस समय से लेकर सूर्य ,ग्रह, नक्षत्र आदि बनने तक के समय को स्वायंभुव मनु कहते हैं।इस मनु के समय में उत्पन्न उत्तानपाद, ध्रुव आदि नक्षत्र आकाश में विद्यमान हैं ।जिस प्रकार स्वायंभुव मनु के समय नक्षत्र जगत तैयार हुआ , उसी प्रकार दूसरे स्वरोचिष मनु के समय में पृथ्वी तैयार हुई ।तीसरे मनु के समय में पृथ्वी से चंद्रमा पृथक हुआ। चौथे मनु के समय में समुद्र से भूमि निकली। पांचवें मनु के काल में वनस्पति व छठे में पशु और सातवें वैवस्त्व मनु में मनुष्यों का जन्म हुआ।
ध्यान देने योग्य बात है कि मनुष्य की उत्पत्ति सबसे बाद में ईश्वर ने की है। ऐसा क्यों ?
ऐसा इसलिए कि मनुष्य को उत्पन्न करने से पहले उसके लिए जो आवश्यक वस्तुएं होनी चाहिए थीं, पहले ईश्वर ने वह उत्पन्न कीं ।क्योंकि मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना है। इसमें यह भी विशेष रूप से विचारणीय है कि ईश्वर कितना दयालु है कि उसने मनुष्य के उत्पन्न करने से पहले सूर्य, ग्रह, नक्षत्र ,पृथ्वी ,उपग्रह, चंद्रमा, सागर, वनस्पति सब रच करके उसको दिया था। जैसे एक माता अपनी संतान के उत्पन्न होने से पूर्व उसके लिए पहनने के लिए कपड़े , तौलिया, छोटे-छोटे तकिए, बिछौना, खिलौना, खाना, पीना, नहाना, धोना , साबुन, पाउडर आदि सभी आवश्यक वस्तुओं का प्रबंध करती है । उदाहरण के तौर पर देखिए , ईश्वर कैसा दयालु है कि वह मां के स्तनों में दूध बच्चे के उत्पन्न होने से पूर्व उत्पन्न कर देता है। इसी प्रकार उसने मनुष्य के उत्पन्न करने से पूर्व सभी आवश्यक वस्तुएं पैदा कीं। इसलिए ईश्वर हमारी माता व पिता दोनों हैं बल्कि वह तीनों लिंग में है।हम उसकी संतानें हैं । जैसे माता का और पुत्र का ,पिता का और पुत्र का, संबंध होता है , वैसे ही आत्मा – परमात्मा का संबंध होता है। यह उक्त सृष्टि रचना घटनाक्रम से सिद्ध होता है।

मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए उसे क्या-क्या करना चाहिए ? मनुष्य के शरीर में क्या-क्या ईश्वर ने रचा और बनाया ?
मनुष्य की योनि क्यों मिली ?
मनुष्य को मनुष्य बनने के लिए किन-किन नियमों का सिद्धांतों का पालन करना पड़ता है ? इसका सीधा सा उत्तर है कि मनुष्य की योनि शुभ काम करके परमानंद को प्राप्त करने के उद्देश्य से मिली है।
पांच प्राण, पांच ज्ञानेंद्रिय, पांच सूक्ष्म भूत, मन तथा बुद्धि इन 17 तत्वों का समुदाय सूक्ष्म शरीर कहा जाता है। यही 17 तत्व जन्म मरण में जीव के साथ रहते हैं । जिनसे वह सुनना , स्पर्श करना आदि का अनुभव करता है। यह शरीर दो भागों में विभक्त किया जा सकता है – पहला भौतिक शरीर जो सूक्ष्म भूतों के अंशों से मिलकर के बना होता है। दूसरा स्वाभाविक जो जीव के स्वाभाविक गुण रूप हैं , उनसे संबंधित है और यही अभौतिक शरीर कहा जाता है। इसी स्वाभाविक शरीर के माध्यम से स्वाभाविक गुणों से जीव सुख को भोग करता है।
तीसरा कारण शरीर होता है । जो गहन निद्रा की तरह होता है। चौथा तुर्या शरीर होता है । जिसमें समाधि के द्वारा जीव परमात्मा के आनंद स्वरूप में प्रसन्न रहता है। लेकिन इन सभी अवस्थाओं से जीव अलग है। क्योंकि यह सभी जानते हैं की जब मृत्यु होती है तब जीव के निकल जाने को सब कोई कह देते हैं कि जीव निकल गया।
यही जीव सबका प्रेरणा करने वाला, सब को धारण करने वाला ,भोग करने वाला, साक्षी होता है।
मनुष्य का जन्म पुण्य पाप करने के अनुसार उत्तम , मध्यम व निकृष्ट श्रेणी का होता है। क्योंकि जब अधिक पाप होता है तो पशु आदि के शरीर में जाता है और वहां उन पापों का फल भोग लेने के उपरांत मनुष्य शरीर में आता है और फिर भी उत्तम ,मध्यम और निकृष्ट शरीर प्राप्त करता है।

मृत्यु किसे कहते हैं ?

जब जीव शरीर से निकलता है , उसी का नाम मृत्यु है और जब वह शरीर के साथ संयोग करता है तो उसका नाम जन्म होता है।
शरीर छोड़ने के बाद जीव कहां रहता है ?
आकाश में स्थित वायु के अंदर रहता है। जैसा कि वेद में ‘यमेन वायुना’ – लिखा आता है। यहां पर यम का तात्पर्य वायु से है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता।
यम का एक विशेष अर्थ वैवस्वत है । जिस का अर्थ है विवस्वान अर्थात सूर्य का पुत्र। जैसे सूर्य उदय होने के पश्चात वायु अवश्य चल पड़ता है । अतः वैवस्वत का अर्थ वायु होता है और यम वैवस्वत है। वायु का अंतरिक्ष में स्थित होना सभी जानते हैं । शरीर को छोड़कर जीव तथा प्राण पहले वायु में ही जाएंगे। दूसरा शरीर धारण करने अर्थात जन्मांतर अर्थात शरीरांतर से पूर्व वायु में ही जीव रहता है।
अथर्ववेद (20/141/2) में कहा गया है कि मरकर जीव वायु से मिलता है। इस प्रकार यमुना वायु का है और शरीर छोड़ वायु के साथ अंतरिक्ष में जीव रहते हैं। जो पक्षपात रहित परमात्मा अर्थात धर्मराज है वही सब का न्याय करता है।
यहां यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि जब जीव आकाश में स्थित वायु में जाता है तो आत्मा अपने शरीर को जिसमें वह स्थित थी , को भी पड़ा हुआ देखती है। कौन क्या कह रहा है ? कौन किस प्रकार का रुदन कर रहा है ? यह आत्मा अंतरिक्ष में रहते हुए सब देखती है। इसीलिए कभी-कभी पूर्व जन्म की याद रह जाती है तो आत्मा पर वह संस्कार एवम् स्मृति आते हैं । फिर वह बचपन में यदि मनुष्य जन्म पाया है तो अपने पूर्व जन्म के संबंध में बताती है।लेकिन यह भी प्रत्येक जीव आत्मा के साथ नहीं होता।इसलिए कभी-कभी जब अचानक हत्या कर दी जाती है तो जन्मांतर में पूर्व मृत्यु का बखान भी कभी-कभी जीवात्मा कर देती है अर्थात हत्या करने वालों के बारे में भी बता देती है। पूर्व परिवार के विषय में बताती है।
इसी को यमलोक कहते हैं।
जीव अनेक प्रकार के जन्म मरण में तब तक पड़ा रहता है जब तक वह उत्तम कर्म उपासना ज्ञान को प्राप्त करके मुक्ति को नहीं पाया जाता है। मुक्ति में जीव परमेश्वर से मिलता नहीं है , अलग रहता है उसके साथ – साथ अलग रहते हुए विचरता है।
मुक्ति में रहते हुए जिस – जिस आनंद की इच्छा करता है , वही – वही आनंद उसको प्राप्त हो जाते हैं, यही मुक्ति कही जाती है।
मुक्ति के काल में जीव सभी सृष्टि विद्या को देखता है सभी लोक लोकान्तरों को देखते हैं ।उनमें घूमता है।
यही सुख विशेष है। यही स्वर्ग है। त्रिविध ताप आध्यात्मिक, आधिदैविक आधिभौतिक से मुक्त रहता है। परंतु इस को प्राप्त करना बहुत बड़ा पुरुषार्थ है तथा बहुत बड़ी उपलब्धि है।
जीव विषय तृष्णा में उलझकर नरक भोगता है ।
जीव को कर्म के आधार पर किस प्रकार की योनि प्राप्त होंगी ?
जिस जीव के अंदर सात्विक गुण ज्यादा होते हैं , वे देव अर्थात विद्वान बनते हैं । इनमें भी जो उत्तम सात्विक गुण वाले होते हैं तपस्वी, यति , संन्यासी ,वेदपाठी, विमान के चलाने वाले, ज्योतिषी का जन्म प्राप्त करने वाले होते हैं।
लेकिन जो मध्यम सतोगुण वाले होते हैं , वह जीव यज्ञ करता, विद्या के ज्ञाता, रक्षक, ज्ञानी ,अध्यापक आदि का जन्म प्राप्त करते हैं। जो जीव रजोगुण वाले होते हैं वे मध्यम मनुष्य बनते हैं।
इनमें भी जो अधम रजोगुण वाले होते हैं, वह तलवार आदि से मारने वाले या कुदाल आदि से खोदने वाले या मल्लाह नौका आदि चलाने वाले, नट जो बांस आदि पर कला आदि करना, चढ़ना, उतरना आदि करते या शस्त्रधारी नौकर आदिं बनते हैं।
जो मध्यम रजोगुण वाले होते हैं – वे राजा, क्षत्रिय वर्ण वाले या राजाओं के पुरोहित, वाद-विवाद करने वाले ,दूत, प्राकविवाक (एडवोकेट), आदि का जन्म प्राप्त करते हैं। जो उत्तम रजोगुण होते हैं , वह गंधर्व अर्थात गाने वाले, बजाने वाले ,धनाढ्य, विद्वानों के सेवक ,उत्तम रूप वाली स्त्री का जन्म पाते हैं।
जो जीव तमोगुण वाले होते हैं वह नीच गति को प्राप्त होते हैं।
इनमें भी जो अत्यंत तमोगुण वाले होते हैं , वह स्थावर सृष्टि में वृक्ष , कीड़ा मकोड़ा, मछली, सांप, कछुआ ,पशु और हिरण के जन्म को प्राप्त होते हैं। जो मध्यम तमोगुण वाले होते हैं वह हाथी , घोड़ा, शूद्र ,म्लेच्छ, सूअर ,शेर ,बाघ आदि बनते है।
उपरोक्त के अलावा उत्तम तमोगुणी जीव चारण भाट सुंदर पक्षी , दम्भी पुरुष हिंसक , पिशाच,अनाचारी बनते हैं।
इस प्रकार तीनों गुणों के आधार पर जैसा – जैसा जीव कर्म करता है , उसको उसी उसी प्रकार से फल प्राप्त होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि मानव जैसा कर्म करता है उसे वैसा भोगना अनिवार्य है। अंतःकरण में उसके संस्कार नियुक्त रहते हैं , परंतु यह स्पष्ट नहीं कि मानव का अंतःकरण किस काल में जाग जाए और किस काल में समाप्त हो जाए ? – यह मन शुभ अशुभ कार्य करता ही रहेगा तो इसे शुभ कार्य में लगा दो । जब शुभ कार्यों में लग जाएगा तो मन स्थिर हो जाता है । अंतःकरण शुद्ध हो जाता है जन्म – जन्मांतर के संस्कार अंतःकरण को शुद्ध कर उस प्रभु से संबंध करा सकते हैं जो परमात्मा विभु है जो पाप पुण्य कर्मों का फल देने वाला होता है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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