अधिकार से पहले कर्तव्य अध्याय — 8 , गुरु के प्रति शिष्य के कर्तव्य

images (33)

भारत में गुरु शिष्य परम्परा प्राचीन काल से है । हमारे प्राचीन वैदिक साहित्य में गुरुओं का भी गुरु परमपिता परमेश्वर को कहा गया है । वेद ने हमें यह शिक्षा दी है कि गुरुओं का भी गुरु परमपिता परमेश्वर है , क्योंकि ईश्वर ने सृष्टि के प्रारंभ में ही यह ज्ञान जिन ऋषियों को दिया उनसे यही परम्परा आगे बढ़ी । जब गुरु के बारे में लोग यह कहते हैं कि उससे परे कोई नहीं तो उसका अभिप्राय यही होता है कि उनका संकेत उस परमगुरु परमेश्वर से है जो सृष्टि के प्रारंभ में खड़ा हुआ था । सचमुच उससे परे फिर कुछ नहीं है।
गुरु-शिष्य परम्परा वास्तव में आध्यात्मिक प्रज्ञा को नयी पीढ़ियों तक पहुंचाने का एक क्रम है , जिसमें सनातनता है , निरंतरता है , प्रवाहमानता है , पुरातन को नवीन के साथ जोड़ने की एक ऐसी अटूट श्रृंखला है जो हमें ‘सनातनी’ बनाती है । इस परम्परा के अन्तर्गत एक सच्चा गुरु अपने शिष्य को जो ज्ञान देता है , उस ज्ञान के देने में वह किसी प्रकार का पक्षपात नहीं करता । गुरु का प्रयास होता है कि यह ज्ञान अपने शिष्य को वह यथावत रूप में प्रदान कर दे । ज्ञान देते समय गुरु शिष्य के भीतर यह भी झांक ले कि किसी प्रकार का दोष कहीं पर रह न जाए। इस प्रकार गुरु से प्राप्त किए गए उस ज्ञान को वह शिष्य उसी रूप में अगली पीढ़ियों तक पहुंचाता है । भारत के द्वारा खोजी गई इस श्रृंखलाबद्ध गुरु शिष्य परम्परा के कारण ही अध्यात्म , संगीत , कला , वेदाध्ययन , वास्तु आदि की विद्या भारत से दीर्घकाल तक लुप्त नहीं हुई। महाभारत युद्ध के पश्चात इसमें घुन लगना आरम्भ हुआ । जब विदेशियों का शासन भारत में स्थापित हुआ तो उस समय यह परम्परा और भी अधिक पतन को प्राप्त हुई । जिसके परिणामस्वरूप भारत में अज्ञान और अविद्या का सर्वत्र अंधकार व्याप्त हो गया।

गुरु और भारत में राष्ट्रवाद

वास्तव में’गु’ शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और ‘रु’ शब्द का अर्थ है प्रकाश , ज्ञान। अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रह्म रूप प्रकाश है, वह गुरु है। इस प्रकार गुरु का कार्य शिष्य के भीतर व्याप्त किसी भी प्रकार के अज्ञान और अविद्या के बंधनों को काटकर उसे शुद्ध सोना बना देना है , अर्थात शिष्य के हृदय की ग्रंथियों को खोलकर उसको धर्मानुरागी बनाकर मोक्षाभिलाषी बना देना या उसका पात्र बना देना गुरु का कार्य है। गुरु का कार्य शिष्य को ज्ञानवान बनाकर उसके भीतर क्रांतिकारी परिवर्तन करना है । संसार के क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठाकर उसे परमार्थ के कार्यों में लगाना और उसके जीवन को सार्थक बनाना गुरु का ही महान कार्य है।
समय आने पर देश , समाज और राष्ट्र के लिए भी सर्वोत्कृष्ट बलिदान देने से हमारे यहाँ पर गुरु भी चूके नहीं हैं । उन्होंने अपना बलिदान भी दिया है और साथ ही अपने शिष्यों को भी इस बलिदानी परम्परा को आगे बढ़ाने में सहायता प्रदान की है। यहाँ पर हर एक चक्रवर्ती सम्राट के साथ कोई न कोई ‘चाणक्य’ खड़ा है , हर एक बंदा बैरागी के साथ भी कोई ना कोई ‘गुरु गोविन्दसिंह’ खड़ा है , इसी प्रकार हर एक ‘महर्षि दयानन्द’ के साथ भी कोई ना कोई ‘विरजानंद’ खड़ा है ,जिससे पता चलता है कि प्रत्येक क्षेत्र में गुरु ने क्रांतिकारी परिवर्तन करने और निर्णय लेने में भारत में साहसिक पहल की हैं। भारत के राष्ट्रवाद को प्रबल करने में गुरुओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

विद्यार्थी के लक्षण

जो गुरु हमारा मार्गदर्शन करता है और हमारे जीवन निर्माण में अपनी विशेष भूमिका अदा करता है उसके बारे में आचार्य चाणक्य ने एक आदर्श विद्यार्थी के गुणों को इस प्रकार स्पष्ट किया है :-
“काकचेष्टा बको ध्यानी श्वाननिद्रा तथैव च ।
अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्चलक्षणम् ”।।

यहां पर बताया गया है कि एक अच्छे शिष्य को गुरु से शिक्षा प्राप्त करने के लिए कौवा जैसी चेष्टा वाला और बगुले जैसा ध्यान वाला होना चाहिए । इसके अतिरिक्त कुत्ते जैसी नींद उसकी होनी चाहिए । उसे अल्पाहारी होना चाहिए और गृह त्याग करने को भी उद्यत रहना चाहिए । जिस विद्यार्थी के भीतर यह 5 गुण होते हैं वह निश्चय ही अपने गुरु से उत्तम शिक्षा प्राप्त करने में समर्थ होता है ।
चाणक्य ने विद्यार्थी के भीतर ये पांच लक्षण उत्तम शिक्षा प्राप्त हेतु बताए हैं । इन्हीं के साथ यह भी ध्यान रखने की बात है कि उत्तम शिक्षा की अभिलाषा करने वाले विद्यार्थियों का कर्तव्य है कि वह अपने भीतर इन पांच गुणों का विकास करें। इसके लिए उन्हें कठोर साधना की आवश्यकता होती है । जिससे उन्हें फिसलना नहीं चाहिए । क्योंकि उनका आलस्य , प्रमाद या किसी भी प्रकार की असावधानी उनके जीवन को नष्ट कर सकती है। ज्ञान देने वाले गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा शिष्य के हृदय में होनी चाहिए । क्योंकि कहा गया है कि ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानम्’ – अर्थात जिसके पास श्रद्धा होती है , ज्ञान को वही प्राप्त करता है । इस श्रद्धा का अभिप्राय अंधश्रद्धा से नहीं है और ना ही किसी भी पाखंडी अज्ञानी व्यक्ति को गुरु मान लेने से है । विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह गुरु का उपहास न उड़ाए । गुरु से मिलने वाली शिक्षा को श्रद्धा के साथ स्वीकार करे । गुरु से प्राप्त ज्ञान पर चिंतन , मनन , निदिध्यासन करे । जो विद्यार्थी गुरु का उपहास उड़ाते हैं उन्हें कभी विद्या प्राप्त नहीं होती। गुरु से प्राप्त किए गए ज्ञान को एक अनुपम भेंट मानकर स्वीकार करना भी शिष्य का कर्तव्य है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी ने गुरु-शिष्य परम्परा को ‘परम्पराप्राप्तम योग’ बताया है। गुरु-शिष्य परम्परा का आधार सांसारिक ज्ञान से आरम्भ होता है,परन्तु इसका चरमोत्कर्ष आध्यात्मिक शाश्वत आनंद की प्राप्ति है,जिसे ईश्वर -प्राप्ति व मोक्ष प्राप्ति भी कहा जाता है। बड़े भाग्य से प्राप्त मानव जीवन का यही अंतिम व सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए। ”
हमारे देश में ऋषियों ने यह निश्चित किया कि विद्या प्राप्ति की इच्छा से जो शिष्य अपने गुरु के पास जाता है उसे नियम – अनुशासन में रहना चाहिए । शिष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए गुरुजनों की आज्ञा का यथावत पालन करना चाहिए । जो शिष्य इस बात का ध्यान रखता है वह निश्चय ही अपने जीवन को पवित्र बना लेता है । ज्ञान गंगा में स्नान कर वास्तविक स्नातक बनकर विद्यालय परिवार से अथवा गुरु के गर्भ से जब वह बाहर आता है तो सचमुच वह संसार के लिए बहुत उपयोगी होकर आता है । गुरु एक मशाल है तो शिष्य उसका प्रकाश है । इस विचार को सदा अपनाये रखना शिष्य का कर्तव्य है । वह मसाल का प्रकाश बन स्वयं एक दिन मसाल बनने की तैयारी करे ।

वेदों में विद्यार्थियों के कर्तव्य

भारत के प्रमाणिक ग्रंथ वेद हैं । वेदों में भी विद्यार्थियों के कर्तव्य और अकर्तव्य का उल्लेख किया गया है। वेद भारत के ही नहीं बल्कि संसार के भी धर्मशास्त्र हैं। वेदों में ऐसी व्यवस्था दी गई है जिसको अपनाकर गुरु – शिष्य परम्परा को भी आगे बढ़ाया जा सकता है और समाज व राष्ट्र की उन्नति के साथ-साथ प्राणीमात्र का कल्याण भी किया जा सकता है।
आजकल हम देखते हैं कि बच्चों की प्रवेश परीक्षा के लिए कुछ ऐसी परिपाटियां विद्यालयों में डाली गई हैं जो पूर्णतया अवैज्ञानिक और अतार्किक हैं। परंतु भारत में ऋषियों के द्वारा ऐसी परम्पराएं डाली गयीं जो पूर्णतया वैज्ञानिक और बुद्धि संगत थीं । जैसे अथर्ववेद में उल्लेख है कि :–
“आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं इच्छते …तं रात्रिस्तिस्र उदरे बिभर्ति…।”
वेद के इस मंत्र में स्पष्ट किया गया है कि आचार्य प्रवेश से पूर्व विद्यार्थी को तीन दिन परिक्षण में रखता था । इस परीक्षा के माध्यम से बच्चे का पारिवारिक संस्कार परीक्षण होता था । उसकी रुचि -अभिरुचि आदि का पता लगाया जाता था । उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि , मानसिक सोच और चिंतन की दिशा आदि को परखने का प्रयास गुरुजन किया करते थे । जो विद्यार्थी उस कठोर परीक्षण में उत्तीर्ण होते थे, उन्हें ही प्रवेश दिया जाता था और उनका उपनयन संस्कार किया जाता था । मन्त्र में तीन दिन के लिए तीन रात्रि का प्रयोग आया है।
वेद विद्यार्थी के लिए यह भी कर्तव्य निर्धारित करता है कि उसे स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु होना चाहिए। जिज्ञासा के अभाव में कितना ही उत्कृष्ट ज्ञान आगे पड़ा हो उसे कोई ग्रहण नहीं कर सकता। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे बिना भूख के सामने भोजन रखे होने पर भी उसकी इच्छा नहीं होती । अतः जैसे भोजन के लिए भूख का होना आवश्यक है , वैसे ही विद्या ग्रहण के लिए जिज्ञासा का होना आवश्यक है। ऋग्वेद का कथन है कि “तान् उशतो वि बोधय..।” अर्थात् जो व्यक्ति जिज्ञासु होते हैं और वेदादि का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें ही शिक्षा देनी चाहिये ।
विद्यार्थी का शिक्षा ग्रहण के लिए कर्मठ होना भी आवश्यक माना गया है। इसके लिए कहा गया है कि शिष्य कर्मठ हो – “अप्नस्वती मम धीरस्तु ।” विद्यार्थी या शिष्य को कर्मठ होना आवश्यक है कर्मठता व्यक्ति को अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित करती है । उसके यात्रा पथ की सभी बाधाओं को दूर करने में भी सहायक होती है। ज्ञान ग्रहण के लिए कठोर अध्यवसाय की आवश्यकता होती है । जिसे बिना कर्मठता के प्राप्त नहीं किया जा सकता ।
ज्ञान ग्रहण की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी के लिए आवश्यक है कि वह तीव्र बुद्धि वाला हो । तीव्र बुद्धि के धनी विद्यार्थी के मस्तिष्क में गूढ़ ज्ञान अथवा गूढ़ विद्या के रहस्य भी सरलता से समझ में आने लगते हैं ।जिसकी बुद्धि तीव्र व सक्रिय होती है , वही ज्ञान का अधिकारी होता है । ऐसा विद्यार्थी ही वास्तव में ज्ञान ग्रहण करने में समर्थ हो पाता है । अतः ऋग्वेद का कथन है कि “शिक्षेयमस्मै दित्सेयम्…।” अर्थात् गुरु उसी विद्यार्थी को उच्च शिक्षा प्रदान करना चाहता है जिसकी बुद्धि तीव्र हो ।
गुरु के समक्ष कक्षा में बैठे हुए सभी विद्यार्थियों को गुरु की ओर से समान रूप से शिक्षा दी जाती है , परंतु जिस विद्यार्थी की बुद्धि तीव्र होती है अर्थात गूढ़ विषयों को शीघ्र और सरलता से समझने में समर्थ होती है गुरु भी ह्रदय से उसी की कामना करता है। इसका कारण यह भी है कि ऐसी बुद्धि वाला विद्यार्थी ज्ञान की गंभीरता को तो समझता ही है ,साथ ही उससे ज्ञान का दुरुपयोग करने की संभावना भी नहीं होती । क्योंकि वह ज्ञान को यथावत और सकारात्मक रूप में ग्रहण करता है। ज्ञान का यथावत और सकारात्मक रूप में प्राप्त करना विद्यार्थी का बहुत बड़ा गुण है । यदि ज्ञान को नकारात्मक रूप में स्वीकार कर लिया गया तो समझो कि वह शिष्य बड़ा होकर उस ज्ञान का दुरुपयोग करेगा । जैसे आज विध्वंसकारी हथियारों का निर्माण करने के लिए वैज्ञानिक लोग अपनी बुद्धि का दुरुपयोग कर रहे हैं। कहने के लिए वह अपने देश की सेवा कर रहे हैं , परंतु वह मानवता के विध्वंस की तैयारी भी कर रहे हैं – इस तथ्य को भी समझना चाहिए । हमारे ऋषि लोग भी वैज्ञानिक होते थे , परंतु वह किसी राजा से वेतन नहीं लेते थे । जिससे उनका स्वाभिमान जीवित रहता था और स्वाभिमान के जीवित रहने के कारण उनकी बौद्धिक क्षमताओं को कोई खरीद नहीं पाता था। आज का वैज्ञानिक वेतन लेता है और अपने देश के लिए घातक से घातक हथियार बना कर देता है । जिन्हें उनका देश मानवता के विरुद्ध प्रयोग करता है ।
विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह अपने ज्ञान का सदुपयोग करने वाला बनेगा और ऐसे आविष्कार एवं शोध करेगा जो मानवता के हितों के अनुकूल होंगे ।
हमारे प्राचीन ऋषियों के पास बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र हुआ करते थे परंतु उनका दुरुपयोग कहीं ना हो इसलिए उसके ज्ञान को वे अपने पास रखते थे । बहुत ही मेधावी तथा जिम्मेदार विद्यार्थी को ही अपने उस ज्ञान को वे दिया करते थे । राजा लोग भी उस ज्ञान का सदुपयोग करने का प्रयास करते थे , दुरुपयोग नहीं । इसीलिए रासायनिक हथियारों तक के निर्माण के ज्ञान से संपन्न होने के उपरांत भी कहीं मानवता के विनाश करने वाले हथियारों के निर्माण की आज जैसी होड़ प्राचीन भारत में दिखाई नहीं देती।

परमेश्वर के प्रति आस्थावान रहे विद्यार्थी

ज्ञान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी को अनुशासन प्रिय भी होना चाहिए । गुरुजी जिन – जिन मर्यादाओं का पाठ उसे पढ़ाएं उनके पालन में उसे आत्मानुशासित होना चाहिए । जैसे प्रातः काल में उठकर शौच आदि से निवृत्त होकर नित्य ध्यान करना , विद्याध्ययन करना आदि । अनुशासनहीन विद्यार्थी कभी भी विद्या ग्रहण नहीं कर पाता । क्योंकि वह गुरु की आज्ञा पालन करने में शिथिलता , असावधानी और उपेक्षा वर्त्तता है। एक श्रेष्ठ विद्यार्थी का यह भी कर्तव्य है कि वह गुरूजी की आज्ञा के विपरीत या गुरु जी की इच्छा के विपरीत कोई अप्रिय आचरण कभी भी न करे । गुरु जी के प्रति सदा श्रद्धा भाव रखने वाला तथा अन्तर्मन से गुरु जी की सेवा करने वाला होना चाहिये । गुरु माता – पिता की भांति हमारा सदैव कल्याण चाहता है । इतना ही नहीं , वह माता-पिता से आगे बढ़कर हमारे जीवन में प्रकाश भरता है। हमें द्विज बनाने की सबसे प्रमुख जिम्मेदारी गुरु ही निभाता है। अतः दिव्य गुणों से सुसज्जित व्यक्तित्व के स्वामी गुरु के प्रति विद्यार्थी के ह्रदय में सच्ची श्रद्धा और सम्मान का होना परम आवश्यक है।
सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सब का आदि मूल परमेश्वर है । अतः विद्यार्थी को चाहिए कि वह परमेश्वर के प्रति सदैव आस्थावान बना रहे । उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है , वेद का पढ़ना और पढ़ाना सभी विद्यार्थियों का परम कर्तव्य है । एक अच्छे विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को वेद अनुकूल बनाए रखने के लिए सदैव प्रयास करता रहे । वैदिक ज्ञान के प्रति सच्ची निष्ठा से ही उसका जीवन सोने से कुंदन बन सकता है , यह सोचकर वेद की शिक्षा को हृदयंगम करने का कर्तव्य कर्म सदैव करता रहे। अथर्ववेद का निर्देश है कि विद्यार्थी वेदों के आदेशों के अनुसार ही अपना जीवन व्यतीत करे । ऐसा कोई भी कार्य न करे जो कि वेदों में निषेध किया गया हो ।
ऋग्वेद में बताया गया है कि “विश्वान देवान उषर्बुध..” अर्थात् विद्यार्थी का कर्तव्य है कि उसको प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में ही शय्यात्याग करना चाहिये । जो प्रातःकाल शीघ्र ही उठता है वह स्वस्थ, बलवान, दीर्घायु होता है । भारत में प्राचीन काल से ही प्रातः काल में शीघ्र उठने की परम्परा रही है। कहा जाता है कि प्रातः काल में ईश्वर सोना बांटते हैं । सोना बांटने का अभिप्राय है कि उस समय बुद्धि ज्ञान सबसे अधिक निर्मल होता है । शांत और एकांत वातावरण में बुद्धि की ज्ञान ग्रहण क्षमता भी बड़ी उत्तम होती है। जो उसका लाभ उठाता है , वह उस बेला में निश्चय ही सोना प्राप्त करता है। प्रातः कालीन बेला में मन बहुत शांत होता है । चौबीसों घंटे की उछल कूद को छोड़कर वह उस समय शांत हुआ बैठा होता है । यदि उस समय उसे ज्ञान ग्रहण में लगाया जाएगा तो हर विद्यार्थी विषयों की गंभीरता को बड़ी सरलता से समझ लेगा । जिस दिशा में उसके गुरु उसे ले जाना चाहते हैं , उस दिशा में वह बड़ी सरलता से आगे बढ़ने लगेगा।
विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह अपने चित्त को शांत रखने का प्रयास करे । शान्तचित्त विद्यार्थी के भीतर गंभीरता जैसा गुण विकसित होता है । जो उसे एक व्यक्ति निराला व्यक्तित्व प्रदान करता है । गंभीर व्यक्तित्व के व्यक्ति निराले होते हैं और संसार में उनका सर्वत्र सम्मान होता है । विद्यार्थी का कर्त्तव्य है कि उसको कभी भी आलस्य, प्रमाद और वाचालता आदि से युक्त न होना चाहिये । उसको सदा संयमी और सदाचारी बने रहना चाहिए ।
वेद प्रत्येक विद्यार्थी को एक ऐसा मार्ग प्रदान करते हैं जिन पर चलकर वह अपने जीवन को उत्कृष्टता में ढाल सकता है । इस मार्ग का अंत मोक्ष पर जाकर होता है । कहने का अभिप्राय है कि इसका ध्येय मोक्ष है। बीच की सारी बाधाओं को कैसे पार किया जाएगा ? – इसके लिए भी विद्यार्थी की ऊंची साधना को वेद अपने साथ – साथ लेकर चलता है । इसे ऐसे समझो कि जैसे किसी मेले में एक पिता अपने बच्चे की अंगुली पकड़ लेता है और उसे मेले में खोने नहीं देता ।, वैसे ही वेद ज्ञान हमारा मार्गदर्शन करते हुए अथवा हमारी अंगुली पकड़ हमें साधना पथ पर लिए चलता है । वह भी हमें सांसारिक विषय भोगों में या संसार के बीहड़ जंगल में कहीं खोने नहीं देता।
वेद विद्यार्थी के भीतर धीरे-धीरे वह सारे गुण भर देता है जो उसे बीच की बाधाओं से लड़ने में सहायता प्रदान करते हैं । अतः प्रत्येक विद्यार्थी का यह कर्तव्य है कि इन ईश्वर प्रदत्त कर्तव्य कर्मों का अच्छी प्रकार अनुसरण करके अपने जीवन को सुख-शान्ति से युक्त करे और एक आदर्श व्यक्ति बनने का प्रयत्न करे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betebet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
pusulabet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betnano giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betparibu giriş
betlike giriş
parmabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
parmabet giriş
betlike giriş
vaycasino giriş
betparibu giriş
klasbahis giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş