हमारी आत्मा के जन्म और मृत्यु का चक्र इसी प्रकार अनंत काल तक जारी रहेगा

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ओ३म्

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विज्ञान एवं दर्शन का नियम है कि अभाव से भाव पदार्थ उत्पन्न नहीं होता और भाव पदार्थों का अभाव नहीं होता। इसी आधार पर ईश्वर, जीवात्मा और इस सृष्टि का उपादान कारण त्रिगुणात्मक प्रकृति भाव पदार्थ सिद्ध होते हैं जो सदा से हैं तथा जिनका अभाव कभी नहीं होगा। यदि इस जगत् में प्रकृति न होती तो ईश्वर व जीवात्माओं के होते हुए भी यह भौतिक जगत व कार्य सृष्टि बन नहीं सकती थी। हमारे कहने का अभिप्राय है कि सृष्टि है तो इसके लिये ईश्वर, जीव तथा प्रकृति इन तीन अनादि व नित्य पदार्थों का अस्तित्व होना आवश्यक एवं अपरिहार्य है। यह सिद्धान्त हमें वेद व वैदिक साहित्य जो विद्वान व तत्वदर्शी ऋषियों द्वारा प्रदत्त है, के अध्ययन से प्राप्त होता है। इस सिद्धान्त की विवेचना एवं परीक्षा करने पर यह सर्वांश में निर्दोष सिद्ध होता है। अतः ईश्वर, जीव व प्रकृति का यह त्रैतवाद का सिद्धान्त सत्य एवं निर्विवाद है। ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति तीनों सत्तायें अनादि, नित्य एवं अविनाशी हैं अतः इसके आधार पर जीवात्माओं का जन्म-मरण व पुनर्जन्म होना तर्कसंगत सिद्धान्त हैं। जन्म-मरण व पुनर्जन्म का सिद्धान्त वेद तथा सभी वैदिक शास्त्रों सहित तर्क एवं युक्ति से भी सिद्ध है। इस सिद्धान्त के आधार पर हम अनादि काल से जन्म व मृत्यु को प्राप्त होते आ रहे हैं और ऐसा ही अनन्त काल तक जारी रहेगा। इस आधार पर यह निश्चित होता है कि विगत समय में हमारे अनन्त बार जन्म व मृत्यु हो चुकी है। जीवात्मा को उसके कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म मिलता रहता है। इस सिद्धान्त से मनुष्य का अगला जन्म मनुष्य व अन्य किसी भी प्राणी योनि में हो सकता है। यह एक सुविचारित तथ्य है कि मनुष्य का जन्म होना अन्य सभी योनियों में जन्म मिलने से कहीं अधिक अच्छा है। मनुष्य योनि में सुख अधिक व दुःख कम होता है। अपवाद तो मनुष्य योनि में भी मिल सकते हैं जहां अपनी गलती व दूसरे के अत्याचारों से कोई धार्मिक व सज्जन मनुष्य दूसरे पाप कर्मों में लिप्त मनुष्यों व समुदायों के द्वारा त्रस्त किया जा सकता है व मृत्यु को भी प्राप्त हो सकता है। इतिहास में इसके अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं।

हम मनुष्य हैं तथा हमारे पास परमात्मा का दिया हुआ शरीर व इसमें एक महत्वपूर्ण अंग बुद्धि भी है। बुद्धि से हम सोच विचार कर सत्य व असत्य का निर्णय कर सकते हैं। परमात्मा का सृष्टि के आदि काल में दिया गया वेद ज्ञान भी हमारे पास है। चार वेद ईश्वर ज्ञान होने के कारण सब सत्य विद्याओं की पुस्तकें हैं। वेद से ईश्वर और आत्मा का सत्य स्वरूप प्राप्त होता है। वेदों के अनुसार ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनादि, अनन्त, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, सृष्टिकर्ता, जीवात्माओं के लिये सृष्टि की रचना व पालन करने वाला, सृष्टि की प्रलय करने वाला, जीवात्माओं को उनके पूर्वजन्मों के कर्मों के अनुसार मनुष्य आदि विभिन्न योनियों में जन्म देने वाला तथा उन्हें कर्मानुसार सुख व दुःख प्रदान करने वाला है। परमात्मा वेदानुसार कर्म करने वाले मनुष्यों, इच्छा व द्वेष से ऊपर उठकर ईश्वर की उपासना कर उसका साक्षात्कार करने वालों तथा स्वहित के कार्यों को छोड़ परहित के कार्यों को करने वाली जीवात्माओं को मोक्ष भी प्रदान करते हैं। जीवात्मा एक सूक्ष्म सत्ता है जो एकदेशी, अल्प परिमाण, अल्पज्ञ, रंग, रूप व भार से रहित, अनादि, नित्य, अमर, अविनाशी, जन्म व मृत्यु को प्राप्त होने वाली जन्म-मरण में फंसी हुई एक सत्ता है। इस आत्मा को परमात्मा द्वारा मनुष्य योनि प्राप्त होने पर वेदज्ञान प्राप्त कर श्रेष्ठ कर्म करने तथा ईश्वर उपासना, अग्निहोत्र यज्ञ एवं सभी वेदविहित कर्मों को करके मुक्ति का लक्ष्य प्राप्त करना होता है। यह सृष्टि मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने में साधन के रूप में कार्य करती है। जो सृष्टि में सुख व भोगों में फंस जाता है वह मोक्ष के लक्ष्य से दूर हो जाता है। वह कर्मानुसार बन्धनों में बन्ध कर भिन्न भिन्न योनियों में जन्म लेकर सुख व दुःख भोगता रहता है। दुःखों से मुक्ति के लिये आदर्श स्थिति वेदज्ञान प्राप्त कर साधना द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार करना ही है। ऐसा ही सृष्टि के आदि काल से हमारे सभी ऋषि, मुनि, विद्वान, चिन्तक, विचारक, योगी, ज्ञानी, ध्यानी, परमार्थी जन करते आये हैं। हमें भी उनका ही अनुसरण करना है। इसी से हमारा व सभी मनुष्यों का कल्याण होता है।

मनुष्य का आत्मा अनादि होने से अविनाशी है। यह सदा इस ब्रह्माण्ड में अस्तित्व में बना रहेगा। इसी कारण परमात्मा द्वारा इसके कर्मों के आधार पर आत्मा का जन्म-मरण होता रहेगा। अतः इसे दुःख के कारण जन्म व मृत्यु से बचने के लिये मुक्ति प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करने चाहिये। हम देख रहे हैं कि संसार में मनुष्य जन्म लेकर अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों के भ्रम में फंस कर मनुष्य अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं। वह न तो ईश्वर के सत्यस्वरूप को प्राप्त हो पाते हैं और न ही उन्हें सत्य उपासना का ज्ञान होता है। इससे मनुष्य जन्म लेकर ईश्वर के ज्ञानस्वरूप, प्रकाशस्वरूप व सर्वशक्तिमानस्वरूप का साक्षात्कार करने से वंचित हो जाते हैं। अतः सभी मनुष्यों को अपने कर्तव्य को पहचानना चाहिये और ईश्वर को जानने व उसकी प्राप्ति में अपने जीवन का उचित समय लगाना चाहिये। इस काम को करने के लिये हमें सद्ग्रन्थों का अध्ययन करने सहित सद्पुरुषों की संगति करके साध्य की प्राप्ति के साधनों को जानकर उनको आचरण में लाना चाहिये। यही मनुष्य जीवन को कल्याण मार्ग पर चलाने व ईश्वर को प्राप्त करने का उपाय है। जीवन को सफल बनाने का अन्य कोई उपाय नहीं है जिससे हमारा वा हमारी आत्मा का कल्याण हो सकता है। सत्य को जानना व उसका ही आचरण करना धर्म कहलाता है। हमें इसी सूत्र को पकड़कर इसको सार्थक कर जीवन को सफल बनाना है।

सभी प्राणियों में विद्यमान आत्मा अमर व अविनाशी है। यह अनन्त काल तक अपने सत्यस्वरूप में बना रहेगा। अनन्त काल तक इसके जन्म व मरण होते रहेंगे। पुनर्जन्म के अनेक प्रमाण हैं। वेद एवं सभी ऋषि-मुनि पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मानते हैं। ऋषि दयानन्द जी ने भी पुनर्जन्म के अनेक प्रमाण अपने विश्व विख्यात ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में बताये हैं। हमें इन प्रमाणों को देखना व इन पर विचार करना चाहिये। हमारी आत्मा की अनन्त काल की यात्रा में हम जन्म-मरण से छूट सकें और ईश्वर के दीर्घकालीन सान्निध्य को प्राप्त कर दैवीय आनन्द का भोग करते रहे, यही हमारा उद्देश्य होना चाहिये। इसी पर चर्चा व प्रेरणा करने के उद्देश्य से हमने इस लेख की यह पंक्तियां लिखी हैं। हम आशा करते हैं कि हमारे पाठक मित्र इन विचारों से सहमत होंगे। हम अपने सभी मित्रों को सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, वेदभाष्य एवं आर्य विद्वानों के वैदिक विषयों पर महत्वपूर्ण ग्रन्थों के अध्ययन की प्रेरणा करते हैं। ऐसा करने से हम सबकी समस्त भ्रान्तियां दूर हो जायेंगी और हम अपने जीवन के लक्ष्य को जान कर उसकी प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील हो सकेंगे।

हम यह भी कहना चाहते हैं अतीत काल में इसी वैदिक आध्यात्मिक विद्या के कारण भारत विश्व गुरु कहलाता था। ऋषि दयानन्द ने महाभारत काल के बाद विलुप्त इस वैदिक आध्यात्म विद्या को पुनः प्राप्त कर व उसका उद्धार कर भारत को पुनः विश्व गुरु बना दिया है। आध्यात्म विद्या में भारत आज भी विश्व गुरु है। आर्यसमाज का सौभाग्य है कि यह वैदिक आध्यात्म विद्या आर्यसमाज के पास है और वह इसका विश्व में प्रचार करता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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