अभ्यास और वैराग्य से होती मन की जीत

images-17.jpeg

विरक्ति एवम् त्याग -क्या है ?

विरक्ति एवं त्याग दोनों का संबंध मनुष्य से होता है , लेकिन इनमें भी त्याग का संबंध स्थूल जगत और स्थूल शरीर से होता है । जबकि विरक्ति का अर्थ काम, क्रोध ,लोभ, मोह ,राग, द्वेष आदि से दूर हो जाना है।
व्यक्ति में मन , वचन और कर्म की प्रधानता है , क्योंकि मन , वचन और कर्म से ही अगली योनि और जन्म प्रारब्ध भाग्य बनते हैं । मन , वचन और कर्म तीनों पवित्र हो जाते हैं तीनों में एक आकार और तादात्म्य हो जाता है , सामंजस्य हो जाता है , साधना का मार्ग प्रशस्त हो जाता है , जीवन कल्याणप्रद हो जाता है। जन्म – मरण के चक्कर से मुक्त हो जाता है। संसार का त्याग करना ऐसे व्यक्ति के लिए मुश्किल नहीं रहता है। संसार के प्रति आसक्ति का भाव नहीं रहता। शरीर के प्रति आसक्ति का भाव नहीं रहता। यही त्याग है । इसी त्याग के माध्यम से विरक्ति तक पहुंचा जा सकता है। विरक्ति और त्याग से मोक्ष का द्वार खुलता है।
योगेश्वर श्री कृष्णजी कहते हैं कि अर्जुन मन को जीतना या वश में करना अभ्यास तथा वैराग्य के माध्यम से सम्भव है।

अभ्यास और वैराग्य से होती मन की जीत।
मन को लेते जीत जो पाते रब की प्रीत।।

इस प्रकार श्रीकृष्णजी ने मन को विजय करने का अमोघ अस्त्र अर्जुन को दे दिया। उसे बता दिया कि संसार के इस सबसे दुष्कर और असम्भव से दिखने वाले कार्य को भी सम्भव बनाया जा सकता है और उसके लिए बस इतना ही करना होगा कि हमारा अभ्यास बने और वैराग्य की भावना बलवती होती जाए। जिसने अपनी साधना का अभ्यास बढ़ाना आरम्भ कर दिया-वह निश्चय ही मन की विजय की ओर चल दिया। यह नित्य प्रति का अभ्यास धीरे-धीरे संसार के प्रति हमें विरक्त करता है। यह विरक्ति की भावना ही हमारा वैराग्य बनता है। जिससे हमारे हृदय में ज्ञान का प्रकाश होने लगता है। धीरे-धीरे संसार के विषय वासना की केंचुली से हम मुक्त होने लगते हैं। हमारे ऊपर से अज्ञान का आवरण हटने लगता है, पर्दा हट जाता है और अन्धकार मिट जाता है। ज्ञान के उस प्रकाश में हम मन के संकल्प विकल्पों की आने वाली बार-बार की पत्रावलियों की समीक्षा करने में सक्षम होते जाते हैं। अभी तक हम मन के द्वारा तैयार की गयी पत्रावलियों पर आंख मूंदकर हस्ताक्षर करते जा रहे थे, पर अब हमारी आंखें खुलने लगती हैं और हम खुली आंखों से देखने लगते हैं कि हमारा यह मन नाम का लिपिक या बाबू हमसे क्या करा रहा है ? हम किस कागज पर हस्ताक्षर कर रहे हैं ? -हम उसमें बाद में जाकर कहीं फंसेंगे तो नहीं ? वास्तव में जितने भर भी मामलों में ईश्वर के न्यायालय में या संसार के न्यायालय में हम फंसते हैं उनमें इस मन नाम के लिपिक का या बाबू का सबसे बड़ा योगदान होता है। जिस अधिकारी का लिपिक या बाबू उस पर शासन करने लगता है-वह अधिकारी दुर्बल होता है और उसे उसका लिपिक या बाबू बेचकर खा जाता है। वह बाहर बैठा-बैठा उस अधिकारी के नाम पर पैसे वसूलता है, और उनमें से कुछ उसे देकर उसकी आत्मा को खरीद कर उल्टी सीधी पत्रावलियों पर अधिकारी के हस्ताक्षर करा लेता है। अधिकारी को पता नहीं होता कि उसका सौदा हो चुका है, वह तो पैसे के लालच में सब कुछ करता रहता है और अपने लिपिक या बाबू के यहां अपनी लेखनी और आत्मा दोनों को गिरवी रख देता है।
इसीलिए कहा गया कि — कर मन पर अधिकार ले तेरा हो गया भजन — यदि मन नाम का लिपिक हमारे अनुशासन में आ गया तो समझिए कि हमारा भजन भी हो गया और संसार से त्याग का भाव भी प्रबल हो गया ।इसी प्रकार की मनोभूमि में वैराग्य की खेती होती है।

आशंका अथवा संशय से बचें

जो कुछ नहीं होने वाला उसकी हमेशा आशंका बनी रहती हो , यह ना हो जाए ऐसा ना हो जाये , वैसा ना हो जाए , इसी उधेड़बुन में लगे रहना और इसी उधेड़बुन से चिंता बनने लगती है । अनावश्यक तनाव पैदा हो जाता है । जो अभी न तो हुआ है ना होने वाला हो उसके विषय में अनावश्यक सोच सोच कर मनुष्य अपने स्वास्थ्य को खराब और अपने जीवन को निरर्थक किये जाता है। अपने विकास में स्वयं अवरोध पैदा करता रहता है । संसार में ऐसे बहुत लोग हैं जो हमेशा अनहोनी की आशंका चिंतित रहते हैं। इसी में उनका चिंतन चलता रहता है।
उस विषय में सोचता है जिसका दूर-दूर तक कहीं कोई अस्तित्व नहीं होता। इसलिए मनुष्य के अंदर यह विकार पैदा हो जाता है । अनावश्यक रूप से वह भयातुर रहने लगता है।
काल्पनिक कष्ट हमेशा उसको परेशान करता रहता है। कल्पना कर कर के ही जीवन के बहुमूल्य समय का नाश करता है। इसलिए उनका चिंतन सही दिशा में नहीं चल पाता है और सही दिशा में चिंतन न चलने की स्थिति में व्यक्ति असफल होता है।
जब मनुष्य सोचता है कि जो हुआ वह भी ठीक और जो होगा वह भी ठीक होगा। ईश्वर जो करता है वह ठीक ही करता है । वह मनुष्य ईश्वर की शरण में चला गया समझिए । संसार का जो भी वैभव और ऐश्वर्य हमें दिखाई दे रहा है यह सारा ईश्वर के ऊपर छोड़ दें और जो कुछ प्राप्त हो रहा है या प्राप्त होने वाला है वह केवल अपने कर्म फल का प्रादुर्भाव मान करके सबको स्वीकार करने लगे तो अनावश्यक चिंता, काल्पनिक भय,संशय , आशंका का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा ।
क्योंकि ईश्वर में विश्वास रखने वाला व्यक्ति इन काल्पनिक संशय और आशंकाओं से मुक्त रहकर अपनी विवेक शक्ति के माध्यम से अवरोध नहीं पैदा होने देता और तमाम विकारों को नष्ट करते हुए जीवन को सफल बना देता है तो मनुष्य को विवेकी होना चाहिए और विकारों से दूर रहना चाहिए।

मौन में शक्ति

मौन में बहुत शक्ति है । इतनी बोलने में नहीं जितनी मौन में सकती है। मौन का तात्पर्य होता है – चुप रहना बोलने की क्रिया नहीं करना। बोलने में जो अनावश्यक ऊर्जा का ह्रास होता है उस ऊर्जा का संरक्षण होता है – मौन से । ज्ञान और विवेक में वृद्धि होती है । वास्तव में मौन रहने की भी एक साधना है । जो व्यक्ति इस साधना में परिपूर्ण हो जाता है , उसके चेहरे का ओज और तेज अलग ही दिखाई देने लगता है । जैसे – जैसे व्यक्ति के अंदर विद्वता और परिपक्वता आएगी वैसे – वैसे ही उसको मौन उचित लगेगा। मौन की शक्ति जब टूटती है तो ऐसा व्यक्ति यक्ष बन जाता है । कोई भी जज जब सारे केस को सुनने के पश्चात बोलता है तो सारी अदालत शांत होकर उसके दस पांच शब्दों को सुनने का प्रयास करती है । वैसे ही किसी सभा का अध्यक्ष जब दोनों पक्षों की बातों को सुनकर अंत में कुछ बोलता है तो उसकी बात को भी लोग शांत होकर सुनते हैं । इसी से पता चल जाता है कि जो व्यक्ति मौन की साधना करता है , उसकी बात को सुनने के लिए लोग कितना आतुर रहते हैं और उसकी बात का कितना प्रभाव समाज पर पड़ता है ? मितभाषी होना अर्थात संतुलित , परिमित , नपा – तुला होकर बोलना मौन की साधना का पहला सोपान है।
कहां बोलना है कितना बोलना है – यह सब मर्यादाएं मौन में आ जाती हैं। मानसिक धरातल उच्च हो जाता है ।मन की शक्ति बढ़ती है। एकाग्रता में वृद्धि होती है मौन अंतर्ज्ञान की दिशा में प्रवृत्त करता है । बड़बोलेपन को रोकता है , मौन की शक्ति अक्षुण्ण है।
मौन रहने वाला व्यक्ति आत्मा के आलोक में विचरण करता है। वह संसार को देखकर भी संसार को देख नहीं पाता है । संसार की सुनकर भी संसार की सुनता नहीं है और संसार में रहकर भी संसार में रहता नहीं है। उसका लोक दूसरा हो जाता है । उसका चिंतन परिवर्तित हो जाता है । जो वास्तव में अंतरात्मा का विषय है अब वह उस विषय के साथ आनंदित रहने का अभ्यासी हो जाता है । इसलिए संसार के बड़े से बड़े लोगों को महात्मा लोग ‘बच्चा’ कहकर बोलते हैं। क्योंकि उन्हें नहीं पता होता कि आनंद क्या चीज है ? और संसार के जिस मूर्खतापूर्ण धंधे में वे लगे हुए हैं उसे वह खेल समझ कर खेलते जा रहे हैं , इसीलिए महात्मा की दृष्टि में यह तथाकथित बड़े बड़े लोग भी बच्चे ही हैं । कोई भी महात्मा जब किसी बड़े से बड़े व्यक्ति के लिए बच्चा कहता है तो समझो कि वह स्वयं ऐसा नहीं बोल रहा बल्कि उसकी साधना ऐसा बोलने के लिए उसे भीतर से प्रेरित कर रही है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

Comment:

betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
alobet
vegabet giriş
vegabet giriş
restbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
roketbet giriş
imajbet giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
begaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
roketbet giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
Betkolik giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
Safirbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş