संकट के इस दौर में धर्मगुरुओं की अहम भूमिका , समाज को बहकने से बचाएं

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संजय सक्सेना

मुसलमानों को कोरोना नहीं हो सकता है यह गलतफहमी दूर करने के लिए पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने कोरोना पीड़ित जमातियों को निकाल कर अस्पताल ले जाने की कोशिश की तो इस पर बवाल खड़ा हो गया। पुलिस और मेडिकल टीम पर जमाती हमला करने लगे।

कोरोना काल ने देश को काफी बदल कर रख दिया है। कई नई परम्पराओं ने जन्म लिया है तो कई पुरानी रवायतें टूट या पीछे छूट गई हैं। जिस देश में सामाजिक मान्यताओं को सबसे अधिक महत्व दिया जाता था, वहीं अब सोशल डिस्टेंसिंग ‘रामबाण’ की तरह काम कर रहा है। जो लोग सुबह आफिस की तरफ भागते दिखाई पड़ते थे, वह अब ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे हैं लेकिन इसमें कर्मचारी और कम्पनी दोनों खुश ही नजर नहीं आ रहे हैं जबकि काम भी ज्यादा हो रहा है। मिठाई की दुकानों पर ताले लगे तो लोग घर में स्वादिष्ट व्यंजन बनाने की कला में निपुण हो गए। लॉकडाउन में घर में बेतरतीब पड़े सामान को झाड़ा-पोंछा गया तो उसमें से जरूरत का कई सामान निकल आया। इसी तरह जो पुरूष दो रूपए का हरा धनिया खरीदने के लिए सब्जी बाजार तक दौड़ लगा देते थे, वह अब ऑनलाइन या फिर कोरोना काल में घर के आसपास सज गई फल-सब्जियों की दुकानों से खरीददारी कर रहे हैं। अस्पतालों में कोरोना मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टर ‘धरती के भगवान’ बन गए थे। कुल मिलाकर लोगों की जिंदगी लॉकडाउन में भी ठीकठाक गुजर रही थी, लेकिन इस माहौल को तब ग्रहण लग गया, जब दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज के जमातियों की कारगुजारी सबके सामने आई। यहां हजारों की तादात में जमाती छिपे हुए थे। यह लोग तब बाहर आए जब वहां कोरोना के चलते जमाती बीमार होकर गिरने-पड़ने लगे, लेकिन इनकी गलतफहमी का यह हाल था कि उन्हें लगता था कि कोरोना मुसलमानों का कुछ बिगाड़ ही नहीं सकती है। यहां से निकले जमाती पूरे देश में फैल चुके थे और यह अपने साथ कोरोना को भी लेकर चल रहे थे।
मुसलमानों को कोरोना नहीं हो सकता है यह गलतफहमी दूर करने के लिए पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने कोरोना पीड़ित जमातियों को निकाल कर अस्पताल ले जाने की कोशिश की तो इस पर बवाल खड़ा हो गया। पुलिस और मेडिकल टीम पर जमाती हमला करने लगे। अस्पतालों में स्वास्थ्य कर्मियों और खासकर महिलाए स्टाफ के साथ ओछी हरकत करने लगे। जब इन जमातियों को पता चला कि कोरोना थूकने से फैलता है तो यह जगह-जगह और यहां तक कि कोरोना योद्धाओं तक पर थूकने लगे। इसी दौरान कुछ ऐसे वीडियो भी सामने आए, जिसमें एक वर्ग विशेष के लोग फलों और तराजू के पल्ले में थूक लगाकर फल-सब्जी आदि बेच रहे थे। यही नहीं कुछ सब्जी और फल विक्रता कोरोना पीड़ित होने के बाद अपनी दुकानें और ठेले सजाए हुए थे। यह फल-सब्जी विक्रेता आश्चर्यजनक रूप से फल-सब्जी के साथ ग्राहकों को कोरोना संक्रमण भी दे रहे थे। कुछ लोगों ने इससे आगे कि सोचते हुए यह मान लिया कि जब सब्जी और फल विक्रेता थूक लगाकर सामान बेचने जैसा ‘अपराध’ कर सकते हैं तो उसी धर्म के राशन-पानी बेचने वाले दुकानदार ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं।

सबसे हास्यास्पद यह था कि ऐसे बीमार मानसिकता के लोगों की निंदा करने की बजाए कुछ लोग धर्म की आड़ लेकर इनके कृत्यों पर पर्दा डालने की कोशिश करने लगे, जिससे समाज में उलझन बढ़ने लगी। इसी के बाद लोग फल और सब्जी खरीदने में सतर्कता बरतने लगे और सब्जी-फल या राशन विक्रेताओं का धर्म जानकर सौदा खरीदने लगे। पूरे समाज में ऐसा नहीं हो रहा था, लेकिन जितना भी हो रहा था, वह सही नहीं था। इसी बीच झारखंड से एक खबर आई, जहां एक फल विक्रेता ने अपनी दुकान पर पोस्टर लगा दिया जिसका सार यह था कि यह दुकान हिन्दू की है। इस पर बवाल हुआ तो पुलिस ने दुकानदार को पकड़ लिया, लेकिन इसके साथ ही समाज में यह सवाल भी खड़ा हो गया कि क्यों हमें थूक लगाकर सामान बेचने वालों से सामान खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जिस देश में हिन्दू और मुस्लिम विश्वविद्यालय हो सकता है ? जहां हिन्दुओं के लिए अलग और मुसलमानों के लिए अलग कानून हो ? जहां तमाम दुकानदार बिना विवाद के अपनी दुकान का नाम हसन स्टोर, राम बाजार, हाजी शॉप, साईं स्टोर आदि रख सकते हैं तो वहां एक सब्जी विक्रेता ने अपनी दुकान की पहचान एक हिन्दू के रूप में जगजाहिर करके कौन-सा गुनाह कर दिया।
बहरहाल, इस पूरे प्रकरण को तब एक नया रंग मिल गया, जब भाजपा के कुछ नेता और विधायक भी इस विवाद में कूद पड़े। इसी क्रम में भारतीय जनता पार्टी के महोबा जिले के चरखारी से विधायक बृजभूषण शरण राजपूत ने लखनऊ स्थित अपने आवास से एक सब्जी वाले को भगा दिया। आरोप है कि सब्जी वाला मुस्लिम था और हिन्दू नाम बताकर सब्जी बेच रहा था इसलिए उसे भगा दिया गया। बता दें कि इस प्रकार का मामला बीते दिन भी सामने आया था, जब उत्तर प्रदेश से ही भाजपा विधायक सुरेश तिवारी का एक वीडियो वायरल हुआ था। जिसमें वह लोगों से कह रहे थे कि मुस्लिम विक्रेताओं से सब्जी ना खरीदें। जिसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह से ऐसे नेताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने को कहा था। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के इस तरह के बयानों से उस विपक्ष को मोदी-योगी पर हमला करने का मौका मिल गया जो कल तक थूक लगाकर फल-सब्जी बेचने वालों के खिलाफ मुंह खोलने से बच रहे थे। जब बीजेपी विधायक से इस संबंध में पूछा गया तो उनका साफ कहना था कि कोरोना संकट के बीच फल-सब्जी वालों के कुछ आपत्तिजनक वीडियो सामने आ रहे हैं, उसकी वजह से हिन्दू भयभीत हैं। विधायक ने दावा किया कि कानपुर में 16 सब्जी वाले कोरोना पॉजिटिव निकले हैं, सब्जी बेचने वाले शख्स को ग्लव्स-मास्क पहनना चाहिए। इस तरह गुमराह कर हिन्दू भावनाओं से खेल रहे हैं और मुसलमान होकर हिन्दू नाम बता रहे हैं। विधायक सुरेश तिवारी ने आगे एआईएमआईएम के चीफ असदुद्दीन उवैसी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा- ओवैसी भी हिंदुओं के बारे में आपत्तिजनक बयान देते रहते हैं, इस पर तो किसी को कोई परेशानी नहीं होती है। अगर कोई विधायक अपने क्षेत्र के लोगों के भले के बारे में कोई बात कह रहा है, तो उसे इतना बड़ा मुद्दा बना दिया गया है।

समाज में जिस तरह का विघटन देखने को मिल रहा है, ऐसे में लाख टके का सवाल यही है कि ऐसी नौबत ही क्यों आई जो लोगों के बीच की विश्वास की दीवार कमजोर हो गईं। अगर उक्त समाज के धर्मगुरु और बुद्धिजीवी वर्ग कोरोना कैरियर की तरह पूरे देश मे घूम रहे जमातियों और फल या सब्जी में थूक लगाकर बेचने वालों की तुरंत घोर निंदा करते हुए ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई किए जाने का दबाव सरकार पर बनाते तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते लेकिन हुआ इसके उलट इस समाज का बुद्धिजीवी वर्ग लगभग खामोशी ओढ़े रहा तो जमातियों और ऐसा अमानवीय कृत्य करने वालों का कुछ मुल्ला-मौलवी किन्तु-परंतु के साथ पक्ष लेते रहे। यहां तक कि देश के सौ से अधिक पूर्व नौकरशाहों ने तो इसके लिए कथित साम्प्रदायिक शक्तियों मतलब हिन्दू पक्ष की बात करने वालों के ऊपर ही यह कहते हुए ठीकरा फोड़ दिया कि यह सब मुसलमानों को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है।

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