इस सराय में मुसाफिर थे सभी – – –

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जो व्यक्ति परमात्मा की भक्ति में लीन हो जाता है , केवल उसी से प्रेम करता है , ऐसी अनन्य भक्ति भावना से उसके अंदर की प्रज्ञा चक्षु खुल जाती है। तब वह प्रत्येक के अंदर एक ही दिव्य ज्योति के दर्शन करता है ।वह अंदर से तृप्त हो जाता है। उसकी कोई इच्छा या कोई वासना या कोई कामना नहीं रहती है। अपने और दूसरे में कोई भेद नहीं समझता है । परोपकार की भावना उसके रोम-रोम में रच बस जाती हैं । वह अपना शरीर भी ऋषि दधीचि की तरह दूसरों के हित के लिए दान कर देता है। वही तो भक्त है और वही परमात्मा को प्रिय भी है।
हमें छोटी-छोटी बातों में भी अपने व्यवहार का ध्यान रखना चाहिए। मानव को ऐसा जीवन जीना चाहिए कि जब हमारी विदा की घड़ी आये तो हर कोई उस पर अफसोस करें ,हर कोई यह समझे यह तो मेरा घनिष्ठ था। सबको ऐसा लगे कि जैसे मेरा अपना ही प्रयोजन या परिजन मुझसे बिछुड़ गया है।
जीवन में आत्मविश्वास काफी बहुत महत्व है । आत्मविश्वास वह बूटी है जिसे प्राप्त करके कोई भी व्यक्ति असंभव से असंभव कार्य को कर डालता है । ईश्वर पर भरोसा करने से और उसका नित्य स्मरण करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है । ऐसा व्यक्ति पहाड़ों को लांघ जाता है , समुद्र की गहराई नाप लेता है और आकाश की ऊंचाई को छू जाता है । इस प्रकार आत्मविश्वास एक बहुत बड़ा संबल है ,जीवन का एक महत्वपूर्ण साधन है l
एक विचारवान व्यक्ति को अपनी असफलताओं पर स्वयं विचार करना चाहिए । दूसरों को दोष नहीं देना चाहिए बल्कि गंभीरतापूर्वक यह खोजना चाहिए कि किन कारणों से व किन परिस्थितियों के कारण यह असफलता प्राप्त हुई है, अथवा हम पिछड़े हैं । अंतरावलोकन करने की यह अवस्था निश्चित रूप से हमें अपने बारे में बता देती है कि मैं सारी परिस्थितियों में कहां दोषी रहा हूं ? सच्चे दिल से अपनी गलतियों को खोजें और खोज कर उन्हें स्वीकार करते हुए उन्हें दूर करने का प्रयास करें ,निश्चित रूप से परिस्थितियां अनुकूल होने लगेंगी ।
संसार में जिन्होंने सुविधाएं पाने का अधिकार तो जाना पर कर्तव्य मार्ग पर चलने में आने वाले कष्टों को सहन नहीं किया, जबकि कष्टों को स्वेच्छा और शक्ति से सहन करना ही सच्ची तपस्या है। जीवन में मनुष्य को शालीन होना चाहिए और शालीनता एक ऐसा गुण है जो बिना मोल मिलती है । इसी शालीनता से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है । शालीनता विनम्रता को जन्म देती है और विनम्रता एक ऐसी औषधि है जो दूसरों को अपना बना लेती है , जो हमसे दूर खड़े थे , वही हमारे सहायक बनकर हमारे साथ आज जुड़ते हैं ।
मनुष्य को अपने गुण, कर्म और स्वभाव का निरंतर परिष्कार करते रहना चाहिए ।मनुष्य को आत्म निर्माण में हमेशा रत रहना चाहिए। आत्म निर्माण का दूसरा नाम भाग्य निर्माण है। मनुष्य को सदैव ईमानदारी का अवलंब ग्रहण करना चाहिए ईमानदारी बहुत ही सरल है । बेईमानी बरतने में अनेकों प्रपंच ,छल ,कपट,छद्म रचने व अपनाने पड़ते है। जिस मनुष्य ने आत्मोत्कृष्टता प्राप्त कर ली हो तो समझो उसने संसार की सबसे बड़ी सिद्धि प्राप्त कर ली है । मानव को प्रत्येक व्यक्ति से मैत्री भाव रखना चाहिए ।शत्रु भाव एक संक्रामक रोग की तरह है जो धीरे-धीरे सारे शरीर में फैल कर उसे विषैला बना देता है ,और उससे अपने शरीर का ही ह्रास होता है ,तथा उच्च रक्तचाप व मधुमेह जैसे भयंकर रोग लग जाते हैं। इसलिए प्रत्येक के प्रति मैत्री भाव रखना चाहिए। यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि मनुष्य को जीवन में परिश्रम अवश्य करना चाहिए , क्योंकि जो व्यक्ति बिना परिश्रम के सभी ऐश्वर्य प्राप्त करना चाहता है वह महामूर्ख कहा जाता है। संतोष का कदापि तात्पर्य यह नहीं है कि मनुष्य को कार्य नहीं करना चाहिए।
मानव को अपने दिल में बुरे विचार नहीं आने देना चाहिए नहीं तो ऐसे विचारों का बुरा असर उस पर स्वयं पर भी पड़ेगा। किसी ने ठीक ही तो कहा है कि :–

उठते हैं ख्याल तो उठता है आदमी ।
गिरते हैं ख्याल तो गिरता है आदमी ।।

मानव को बदले की भावना से कार्य नहीं करना चाहिए , जो मनुष्य ऐसा करता है वह अपने घावों को हमेशा ताजा बनाए रखता है ,लेकिन जो बदला लेना नहीं चाहता , उसके घाव बहुत जल्दी भर जाते हैं । प्रतिशोध की भावना में न जलने वाला ही आर्य होता है । ऐसा व्यक्ति जो वैर विरोध न पालकर शांतमना अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर सीधे अपने रास्ते पर चलने को अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित कर लेता है । इसके विपरीत जो व्यक्ति संसार में रहकर वाणी से , शरीर से , मन से किसी भी प्रकार के झगड़े में फंसा रहता है उसका मार्ग अवरुद्ध हो जाता है
ऐसा व्यक्ति झाड़ियों में अर्थात संसार के कलह , कटुता व ईर्ष्या में जा फंसता है और उसका जीवन व्यर्थ की बकवास में नष्ट हो जाता है । किसी ने क्या खूब कहा है :–

हम फूल चुनने आए थे बाग ए हयात में ।
दामन को खारजार में उलझा के रह गए ।।

पूरे विश्व में ऐसा कोई पहाड़, आकाश ,समुद्र स्वर्ग नहीं है जहां किए गए कर्मों का फल नहीं मिलता। चाहे आप पहाड़ों पर जाकर के देवी-देवताओं के मंदिरों में कितना ही प्रसाद, चढ़ावा चढ़ाएं या कितने गंगा स्नान करें । शुभ अशुभ कर्मों का फल अवश्य मिलेगा यह सिद्धांत स्मृति में रहना चाहिए। मनुष्य द्वारा किए गए बुरे कर्मों का फल उसे बुरा ही मिलता है । अतः जीवन के अच्छे फल को पाने के लिए मनुष्य को अच्छे कर्म करने चाहिए
एक कर्म योगी की तरह काम करना चाहिए। क्योंकि कर्म योगी कभी अपने कार्य से बन्धता नहीं है। आज का मानव जहां चंद्रमा की दूरी और समुद्र की गहराई का अन्वेषण करने में व्यस्त है परंतु मैं कौन हूं ? और इस संसार में क्यों आया हूं ? इस विषय में उसकी जानकारी शून्य है। जबकि आत्ममंथन व आत्मचिंतन अवश्य करना चाहिए। जो व्यक्ति आत्म चिंतन करता है वह अपने आप का सही मूल्यांकन कर लेता है और अपने आपको सही सही समझ लेता है और वह अपने आप का सच्चा साथी बन जाता है । क्योंकि आत्मसंयम करने से असीम सहन शक्ति प्राप्त होती है।मनुष्य को सर्वप्रथम अपने आपको समय के अनुसार बदलना चाहिए और क्रोध पर और अपने आप पर नियंत्रण रखना चाहिए । किसी के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए जिससे दूसरे के मन को चोट पहुं चे ।
बीती हुई बातों को भुला देना चाहिए उन्हें दिल से नहीं लगाना चाहिए अर्थात सकारात्मक सोच अपनानी चाहिए। क्योंकि नकारात्मक सोच कई बीमारियां और झगड़ों की मूल होती है ।अतः हर हालत में अपनी सोच को सकारात्मक ही रखें ।किसी को गाली देने से और बुरा बोलने से विवेक शून्य हो जाता है। हमें दिखावे से भी दूर रहना चाहिए और जितना भगवान ने दिया है उसके लिए आभार प्रकट करते हुए परिश्रम करते रहना चाहिए।
यदि आप दिल के दौरे से बचना चाहते हैं तो आपको अपना दिल संसार को देने के स्थान पर ईश्वर को देना चाहिए तो कभी आपको दिल का दौरा नहीं पड़ेगा क्योंकि संसार आपको धोखा दे सकता है तब आपको दुख होगा, तनाव होगा ,उच्च रक्तचाप होगा ,मस्तिष्क आघात होगा ,लेकिन ईश्वर की शरण में धोखा नहीं है। ईश्वर तो दयालु है। ईश्वर तो कृपालु है ।ईश्वर तो दया के सागर है । वह तो करुणा का गागर है।
एक शायर ने कितना अच्छा कहा है :-

इस सराय में मुसाफिर थे सभी।
कोई जल्दी और कोई रुक कर गया।

यह संसार एक सराय है । इसमें से कोई जल्दी चला जाता है सराय खाली करके और कोई थोड़ा रुक कर चला जाता है । इस सराय रूपी संसार से खाली करके जाना सबको है। सराय में रुकना ही जीवन है।
श्री कृष्ण जी महाराज ने योग: कर्मसु कौशलम – का जो सिद्धांत गीता में दिया है । उसी के अनुसार किसी भी कार्य के आरंभ से पूर्व सुसम्मति और सुमति प्राप्त कर लें और जब करने का निश्चय कर लो तो उसमें पूर्णतया लग जाओ।
मनुष्य को क्रोध आने से पहले उसके परिणाम पर विचार करना चाहिए ।जिस क्षण क्रोध मस्तिष्क पर अपना शासन जमा लेता है उसी क्षण विचार शक्ति शून्य हो जाती है। जो क्रोध पर उचित नियंत्रण रख सकते हैं वही स्वर्ग के सच्चे अधिकारी होते हैं । उनका घर स्वयं ही स्वर्ग बन जाता है । सर्वत्र सुख की अनुभूति होती है और जीवन में आनंद ही आनंद दिखाई देता है। क्योंकि क्रोध मूर्खता से प्रारंभ होता है और पश्चाताप पर समाप्त होता है । क्रुद्घ व्यक्ति का मुंह तो खुला रहता है परंतु नेत्र और ज्ञान चक्षु बंद रहते हैं । इसलिए कहा जाता है कि आपे में ही रहो। यहां अपने आपे में रहने का तात्पर्य ‘स्व’ ‘स्थ’ रहो अर्थात अपने आप में स्थित रहो अर्थात इंद्रियों के वश में ना होवो। इंद्रियों में अपनी ऊर्जा एवं शक्ति का दुरुपयोग मत करो ।अपनी ऊर्जा एवं शक्ति का ह्रास मत करो इसलिए आज भी हमारे बुजुर्ग क्रोध करने वाले से यह कहते हैं कि आपे में रह। यह है अपने आपमें रहने का सार । कितना बड़ा अध्यात्म छिपा है इन साधारण से शब्दों में। इसलिए भारत की सभ्यता और संस्कृति का तोड़ नहीं। इसलिए भारत की सभ्यता और संस्कृति विश्व में बेजोड़ है । इसलिए भारत की सभ्यता, संस्कृति सदैव व सर्वत्र मान्यता प्राप्त रही है।
मनुष्य को अपने मित्रों की प्रशंसा सार्वजनिक रूप से सबके सम्मुख करनी चाहिए किंतु बुराई उससे अकेले में कहो तो बुद्धिमत्ता है। थोड़ा पढ़ो ज्यादा सोचो , कम बोलो ज्यादा सुनो यह समझदारी है। क्योंकि मनुष्य का मौन सर्वोत्तम भाषण है । इसलिए मौन रहो या फिर ऐसी बात कहो जो मौन से बेहतर हो,और अगर बोलना पड़े तो कम से कम शब्दों में बोलना चाहिए। यदि एक शब्द से काम बनता हो तो दो नहीं बोलना चाहिए। क्योंकि शब्द और वाणी की जितनी रक्षा करोगे ये उतनी ही रक्षा आपकी करेंगे।
मनुष्य को चंद्रमा की तरह अपने ज्ञान का प्रकाश समस्त संसार में फैलाना चाहिए , परंतु अपना कलंक या धब्बा अपने तक ही सीमित रखना चाहिए।

किसी ने बहुत सुंदर कहा है :-
उसे क्या काम जेवर का जिसे खूबी खुदा ने दी ,
लगा करता है कितना खुशनुमा ये चांद बे गहने ।।

मानव को विद्वानों का दास बनना अति उत्तम होता है मूर्खों का स्वामी बनना हानिकारक होता है ।
पंडितोअपि परम शत्रु ना मूर्खो हितः कारक।
पंडित शत्रु अच्छा है, क्योंकी वह शत्रु होते हुए भी क्षति नहीं पहुंचाता लेकिन मूर्ख कभी हितकारी नहीं हो सकता।
जैसे विद्वान व्यक्ति हर जगह पूजा जाता है ऐसे ही गुणवान व्यक्ति भी प्रत्येक स्थान पर आदर प्राप्त कर लेता है ,इसलिए विद्वान, गुणवान बनने का प्रयास मनुष्य को करना चाहिए। वह मानव जिसके जीवित रहने से विद्वान, बंधु ,मित्र और संबंधी जीते रहते हैं उसी का जीना सार्थक कहा गया है ।
मनुष्य को निर्दोष व्यक्ति को बचाने के लिए झूठ बोलना पड़े तो वह पाप नहीं होता। जैसे एक अधिवक्ता अपने व्यवहारी के बचाव पक्ष में अपने तर्क प्रस्तुत करता है। मनुष्य पर जितने दुख आते हैं वह उतना ही अधिक प्रखर और प्रवर होता है अर्थात दुख अनुभव का विद्यालय है । दुख जीवन में अवश्य आने चाहिए।दुख जीवन में इसलिए भी आने चाहिए कि जितने दुख इसी जीवन में समाप्त हो जाए उतना ही अच्छा है । अगले जन्म के लिए ना रहे। जिससे कि दुखों का भोग भोगने के लिए बार-बार जन्म न लेना पड़े ।
विद्वानों का तो यहां तक भी कहना है कि दूसरों का दुख यदि मेरे हिस्से में आ जाए और मेरे सुख दूसरे के हिस्से में चले जाए तो भी श्रेष्ठ हैं। मनुष्य को काम, क्रोध ,मद, लोभ, मोह से दूर रहना चाहिए । क्योंकि ये दुर्गुण जीव के दुश्मन हैं। यदि आप पाप करते हैं तो वह पाप आपको अकेले ही भोगना पड़ेगा । चाहे बेशक आपके पाप की कमाई से परिवार के अन्य लोगों ने भी खाया हो ।लेकिन जब अपराध ईश्वर के दरबार में गिने जाएंगे तो वह अपराध आपके हिस्से में ही आएगा, क्योंकि जीवन यात्रा में अकेले ही चलना होता है।
जिसके हृदय में पाप होता है वह चाहे कितने ही तीर्थ करे , पापों से उऋण नहीं हो सकता । शुद्ध नहीं हो सकता। इसलिए यदि आप एक धंधा श्रेष्ठ कर्म करने में लगाते हैं तो हजार गुना लाभ होगा और अगर आप एक धंधा व्यर्थ कर्म करने में लगाते हैं तो हजार गुना हानि होगी।
महर्षि दयानंद द्वारा निर्मित आर्य समाज के 10 नियमों में पांचवा नियम यह है कि सब काम धर्म अनुसार अर्थात सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए। सातवां नियम यह है कि सबसे प्रीति पूर्वक, धर्मानुसार ,यथा योग्य वर तना चाहिए। जबकि नौवां नियम यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी उन्नति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिए बल्कि सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए । यह व्यापक दृष्टिकोण परिवार के प्रति, समाज के प्रति और राष्ट्र के प्रति यदि प्रत्येक व्यक्ति का हो जाए तो विश्व में सर्वत्र शांति का साम्राज्य स्थापित हो जाएगा। दुनिया के झगड़े समाप्त हो जाएंगे। मात्र उक्त नियम के अनुसार आचरण करने के कारण ,क्योंकि उक्त नियमों का पालन करने से मनुष्य एक आदर्श व्यक्ति बनता है और एक आदर्श व्यक्ति व्यवहार कुशल होता है ।मानव जाति की एकमात्र पाठशाला आदर्श है ।मनुष्य इसके अलावा और कहीं नहीं सीखता अर्थात सब आदर्श से सीख सकता है । इसी से “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना को भी बल मिलता है। जब हम सारे विश्व को अपना कुटुंब मान लेंगे अर्थात परिवार समझेंगे तो निश्चित रूप से शांति सर्वत्र स्थापित हो जाएगी।
महान और उदार चरित्र बनाने का एक ही मार्ग है कि एक महान और उदार आदर्श के अनुरूप अपना जीवन मनुष्य को व्यतीत करना चाहिए।

दादू पाती प्रेम की विरले बांचे कोई।
वेद पुराण पुस्तक पढ़े प्रेम बिना क्या होई।।

इसीलिए प्रीति पूर्व क यथायोग्य बरतना चाहिए।
संसार में जहां मूर्खों की पूजा नहीं होती, जहां स्त्री और पुरुष में कलह नहीं होती वहां लक्ष्मी आकर स्वमेव विराजमान हो जाती है। जहां स्त्री की पूजा होती है उस स्थान पर भी देवता निवास करते हैं । यह कहावत हमारे पूर्वजों की सर्वथा उचित है।
अति सर्वत्र वर्जयेत। अति स्वरूप के कारण सीता का हरण हुआ, अति गर्व के कारण रावण मारा गया, अति दान देने के कारण बली को बंधन में पड़ना पड़ा ।इसलिए अति को हमेशा त्यागना चाहिए। जैसे समुद्र में वर्षा का होना व्यर्थ है ,पेट भरे के लिए भोजन दान करना व्यर्थ है ,धनी के लिए दान देना व्यर्थ है, वैसे ही दिन में दीपक जलाना व्यर्थ है। मनुष्य को धन कमाना चाहिए ,ऐश्वर्य के साधन जुटाने चाहिए ,सुख साधन बढ़ाने चाहिए और कमाए हुए धन का उचित व्यय करना चाहिए इससे भी धन की रक्षा भी होती है। मनुष्य को थके हुए और घर पर आए हुए अतिथि को विश्राम तथा भोजन देना चाहिए ।अतिथि को भोजन कराने से पहले स्वयं भोजन नहीं करना चाहिए ,और किसी से उधार ली हुई वस्तु को समय से लौटाना चाहिए जो ऐसा नहीं करता वह भी पापी कहा जाता है।
मनुष्य को दान का ,तप का शूरता का ,सुशीलता का ,नीति निपुणता का ,कभी अहंकार नहीं करना चाहिए । क्योंकि इस पृथ्वी पर एक से बढ़कर एक दानी ,तपस्वी, विद्वान ,सुशील आदि विद्यमान हैं , इसीलिए कहते हैं शेर के लिए सवा शेर बहुत हैं।
कुलीन पुरुष धन-धान्य से क्षीण हो जाने पर भी अपने चरित्र के गुणों सुशील ता, उदारता तथा त्याग शीलता आदि का परित्याग नहीं करता। ऐसे मनुष्य को ही महान कहते हैं और जितना महान होगा उतना ही विनम्र सुशील और सभ्य होगा। मनुष्य को स्वभाव से स्वार्थी नहीं होना चाहिए कि मतलब हो तो आगे पीछे घूमे,वफादारी का प्रदर्शन करें, और जैसे ही मतलब निकल जाए तो वह पराया हो जाए, जैसे उससे उसका कोई परिचय नहीं था। जानता तक नहीं था ।यह अनुचित है। यह ही कृतघ्नता है। इसके विपरीत ऐसे लोगों के प्रति जीवन भर कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए जिन्होंने हमारी किसी भी प्रकार कहीं सहायता की है। उनके प्रति विनम्र रहना चाहिए। स्वार्थी मनुष्य संबंधों तक को नकार देता है, और जरूरत हो तो पराया भी मित्र बना लेता है। जरूरत पूरी होते ही अपने भी पराए। अपने हक में अपनी-अपनी व्याख्या सोच लेता है । सच को सच कहने का साहस नहीं जुटा पाता जो सच को सच नहीं कह पाता , वही कायर है , जो एहसान को भुला देता है ऐसे व्यक्ति कहीं भी और किसी भी परिस्थिति में मौत के मुंह में धकेल देते हैं ।
एक व्यक्ति को पैसों की जरूरत पड़ी । शुभचिंतक ने पैसे दे दिए और जब मतलब निकल गया तो पैसे लेने वाले ने पहचानने से ही इनकार कर दिया । स्वार्थी व्यक्ति ने कहा जब मतलब हो तो मित्र बना लो और जब मतलब निकल जाए तो कौन मित्र ? कैसी मित्रता ? कैसी सहृदयता ? कैसी सहायता ? मतलब से ही सरोकार रखता है और जिस व्यक्ति ने सहायता की थी वह कृतघ्न मित्र की बातें सुनकर उसके तो पैरों तले से जमीन खिसक जाती है । अवाक देखता रह जाता है कि कितना घटिया और स्वार्थी है यह इंसान ? ऐसा व्यक्ति कभी किसी का विश्वास पात्र भी नहीं हो सकता और जो विश्वास कर ले तो वह स्वयं परेशानियों में आ जाता है। ऐसे मित्रों के कारण ही दुनिया में दुश्मन की पहचान करना आसान है , लेकिन मित्र के भेष में दुश्मन की पहचान करना मुश्किल है फिर जीवन में ऐसे व्यक्ति ही धोखा देते हैं जिन्हें गलती से मित्र समझ लिया जाता है ।
दुखियों की पुकार सुनना ही मानवता है। दूसरे के दु:ख दूर करने की कोशिश करनी चाहिए तभी इंसान होने का गौरव निभाया जा सकता है। परोपकार करते रहना चाहिए क्योंकि आयु निश्चित है ,और निश्चित समय में पुण्य कर्म करने का जब भी मन में विचार आए तुरंत कर देना चाहिए। क्योंकि जाति ,आयु और भोग यह तीनों ही पूर्व जन्म कृत कर्मानुसार निश्चित होते हैं । मालूम नहीं कब बुलावा आ जाए ?

किया बहुत तस्वीर मगर,
तकदीर हिकमत चली नहीं।
हजारों कोशिश किया मगर ,
सर की बला तो टली नहीं।।

मनुष्य को इसलिए प्रीति पूर्वक धर्म के अनुसार बरतना चाहिए कि उससे धर्म की रक्षा होती है और जो धर्म की रक्षा करते हैं धर्म उनकी रक्षा करते हैं। यदि आप प्रभु की कृपा के पात्र होना चाहते हैं तो आपको परोपकार करना ही होगा जो व्यक्ति संसार का जितना जितना परोपकार करता है ,परहित के कार्य करता है वह उतना ही ईश्वर की व्यवस्था में सुखी रहता है और मोक्ष का अधिकारी होता है।
मनुष्य के पास धन खूब हो लेकिन धन कमाने का साधन भी उचित हो , क्योंकि संपत्ति वही उत्तम है जो गंगा की भांति सर्वहितकारी है जैसे गंगा का पानी सबका हित करता हुआ शेष समुद्र में जाकर के पड़ता है , इसी प्रकार मनुष्य को अपने धन में से समाज की और राष्ट्र की दान करके सेवा करनी चाहिए।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत

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