अथर्ववेद में वायरोलॉजी महामारी की रोकथाम

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यह निर्विवाद मूर्धन्य तथ्य सत्य है कि संसार के पुस्तकालय की सबसे प्राचीनतम पुस्तक वेद है| यद्यपि वेदों की प्राचीनता का कोई कालखंड आज तक निश्चित नहीं हो पाया है जैसे पृथ्वी की आयु , ब्रह्मांड की उत्पत्ति का कालखंड भी विवादित है ऐसे ही वेद कितने प्राचीन हैं इस पर अभी कोई एकमत नहीं है… जो वेद में है वह दुनिया में हैं जो वेद में नहीं वह दुनिया में नहीं है वेद ईश्वर की वाणी है.. यह मनुष्य द्वारा निर्मित कोई ग्रंथ नहीं है|

वेद का ज्ञान सभी मनुष्य मात्र के लिए है किसी देश विशेष या मनुष्य विशेष के लिए नहीं है….|

चारों वेदों में परमाणु से लेकर परमात्मा पर्यंत सारा ज्ञान विज्ञान बीज रूप में भरा हुआ है | आज जितनी भी विज्ञान की शाखाएं हैं सभी का सूक्ष्म दिग्दर्शन वेदों में है… विशेषकर अथर्ववेद में.. अथर्ववेद का उपवेद आयुर्वेद है… आयुर्वेद कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं है समय-समय पर बहुत से विद्वानों ने इस पर ग्रंथ रचना की है लेकिन मूल में वेद ही रहा है |

1880 तक यूरोप अफ्रीका में लोग रोगों के लिए जिम्मेदार सूक्ष्म रोगाणुओं बैक्टीरिया वायरस प्रोटोजोआ के विषय में कुछ नहीं जानते थे… रोगों को दैवीय आपदा या दुष्ट आत्मा का श्राप मान लिया जाता था… कुछ लोग बुरी हवा को इसके लिए जिम्मेदार मानते थे…|

इसी दौरान फ्रांस के निवासी लुई पाश्चर महोदय जो एक वैज्ञानिक हुए उन्होंने जर्म theory ऑफ डिजीज दी रोगों का रोगाणु सिद्धांत | उन्होंने बताया कुछ आंखों से ना दिखाई देने वाले सूक्ष्म जीव वायु जल हमारे खाद्य पदार्थों में मिलकर हमारे शरीर को इनफेक्टेड करते हैं|

हेजा चेचक पीत ज्वर plague के लिए यही जिम्मेदार है | तेजी से अनुसंधान हुआ माइक्रोबायोलॉजी की नींव पड़ी उसकी बहुत सी शाखाएं bacteria logy virology विकसित हुई |

वायरोलॉजी मैं विषाणु का अध्ययन करते हैं विषाणु निर्जीव अनु है जो इंसानों में संक्रमण फैलाते हैं चेचक पोलियो hepatitis HIV जैसे वायरस का अध्ययन ,उनका सोर्स उनका स्ट्रक्चर… यह प्रकृति में कहां से आते हैं कौन-कौन से माध्यमों से फैलते हैं इनकी संरचना कैसी होती है आदि आदि शरीर में जब यह संक्रमण फैलाते हैं तो किस अंग विशेष को प्रभावित करते हैं कैसे रिप्लिकेट करते हैं ?|

लेकिन अपने भारतवर्ष में लाखों करोड़ों वर्ष पहले ही इन सूक्ष्मजीवों जीवो पर अध्ययन की विकसित परिपाटी रही है|

आधुनिक सूक्ष्म विज्ञान जो 100 वर्ष में समझ पाया है वह हजारों लाखों वर्ष पूर्ण भारत वासियों ने समझ लिया था| अर्थ वेद के दूसरे कांड का 31/32 वा सूक्त के दर्जनों मंत्र इन सूक्ष्म जीवो , उत्पन्न रोगों की चिकित्सा पर व्यापक प्रकाश डालते हैं |

दुनिया के बनाने वाले ने दुनिया के सबसे बुद्धिमान प्राणी को पहले ही सावधान कर दिया था |

मानव आत यकृत सिर फेफड़े पसली को संक्रमित करने वाले रोगाणुओं का नामकरण किया गया है… जिन्हें क्रम से अनंवत्रय , शीर्षअन्या, पास्टष्ट्रीय है |

यह सब आप को आसान लग रहा होगा.. लेकिन यह इतना सीधा सरल नहीं है… समय रहते किसी महामारी फैलाने वाले विषाणु के सोर्स उससे अफेक्टेड होने वाले अंग जहां बैक्टीरिया वायरस तेजी से ग्रो करता है पहचान कितनी जरूरी होती है इसे ऐसे समझिए.. 19वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में पोलियो का वायरस महामारी की तरह फैला दुनिया के लाखों करोड़ों बच्चों को जीवन भर के लिए अपंग बना दिया… ऐसा ही एक युवक अमेरिका का राष्ट्रपति भी बना जिनका नाम फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट था… पोलियो का वायरस जब तेजी से फैला तो इसके सोर्स के बारे में किसी को पता नहीं चलाती 40 वर्ष तक… कुछ लोग मानते थे यह वायु में फैलता है.. लेकिन पोलियो का वायरस दूषित जल भोजन से फैलता है अधिकांश लोगों को आज भी मालूम नहीं होगा.. सबसे पहले intestine को संक्रमित करता है फिर दिमाग के तंत्रिका तंत्र को निशाना बनाता है… जब इस अध्ययन हुआ पूरी दुनिया से आज इसका लगभग उन्मूलन हो गया है|

अर्थववेद के दूसरे कांड का पांचवा मंत्र कहता है पर्वत वनौषधि पशुओं में होने वाले सूक्ष्म रोगाणु जल में रहने वाले हमारे शरीर में भी प्रवेश कर जाते हैं हम उन्हें नष्ट करें… |

वायरस की रोकथाम के लिए सोर्स का जानना बहुत जरूरी होता है… एचआईवी का वायरस बंदर से आया इबोला वायरस चिंपैंजी से आया निपाह वायरस चमगादड़ से आया कोरोनावायरस जिसने तबाही मचा रखी है उसके सोर्स पर अभी वैज्ञानिक निश्चित नहीं है.. जो वायरस जंतु जानवर से आते हैं उन्हें जूनोटिक वायरस कहा जाता है…|

दूसरे कांड का छठा मंत्र वायरस की संरचना को बता रहा है… इससे पहले मैं आपको आधुनिक वैज्ञानिकों का मत वायरस की संरचना को लेकर बता दूं वायरस एक निर्जीव अनु है जिसके केंद्र में आर एन ए ने या डीएनए रूपी जेनेटिक मैटेरियल होता है उसके चारों तरफ प्रोटीन का एक खोल होता है.. जिसे कैप्सोल्ड बोला जाता है.. वायरस मटेरियल वेरीऑन सॉलिड को सुरक्षित करने के लिए जल वसा लिपिड का एक दूसरा स्तर होता है जिसे वायरस लिफाफा बोला जाता है… तमाम एंटीवायरल मेडिसिन वैक्सीन सैनिटाइजर अल्कोहल वायरस के इसी कवच को कमजोर कर उसकी प्रोटीन को नष्ट कर देते हैं जिससे वह रिप्लिकेट नहीं हो पाता को कोशिका संक्रमण नहीं फैला सकता..|

अथर्ववेद में वायरस की इसी दोहोरी संरचना को क्रम से शृषड कुशुंभ कहा गया है… पहला शब्द वायरस की प्रोटीन है दूसरा वायरस का लिफाफा है…|

मंत्र का भावार्थ यह है हे! रोग कृमि में तेरे सींग की भांति कष्ट देने वाले अंगों तेरे इस जल पात्र को भी नष्ट करता हूं जो तेरे विष धारण का काम देता है..|

कोरोना वायरस की संरचना भी कांटेदार हैं जिन्हें स्पाइक प्रोटीन बोला जाता है यह एचआईवी के वायरस का सरचना में हमशक्ल है…|

ईश्वर की वाणी वेद लाखों करोड़ों वर्ष पूर्व हमें सावधान कर रही हैं इन खतरनाक वायरसों से..| महामारियो से बचने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग आइसोलेशन की भी शिक्षा वेदों में है अर्थ वेद में अनेक मंत्रों में ग्राही व तपेदिक रोग से ग्रस्त युवक उसकी मन स्थिति का वर्णन किया गया है| अलंकारिक तौर पर एक ऐसी युवती की भी मनोदशा का वर्णन किया गया है जिसके प्रजनन अंगों में bacteria virus संक्रमण के कारण उसका गर्भ बार-बार गिर जाता है गर्भपात होता है उसकी चिकित्सा का उपदेश किया गया है… पर्सनल हाइजीन का विस्तृत वर्णन अथर्ववेद में है यहां लेख के विस्तृत होने से इसका मंत्र सहित उल्लेख नहीं किया जा रहा है.. ऐसे सैकड़ों मंत्र हैं |

अथर्ववेद के 20 कांड में से अनेक कांडों में इन वायरस के खात्मे की क्रिया प्रणाली का उल्लेख किया गया है… जिनमें अग्निहोत्र सूर्य किरणों से संपर्क… जल चिकित्सा निष्ठा पूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन तो बहुत जरूरी है इससे तेजी से इम्यून सिस्टम बूस्ट होता है, वानस्पतिक भोजन वचा अमृता मुंज सिन्हा वाली, जैसी सैकड़ों औषधियों का उल्लेख है |

आर्य समाज के संस्थापक देव ऋषि महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज का यह नियम यूं ही नहीं बना दिया.. वेदों का गहन गंभीर अध्ययन के पश्चात यह नियम उन्होंने वेद मंत्रों की आज्ञा के आधार पर ही बनाया कि ”

वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है वेद का पढ़ना पढ़ाना सुनना सुनाना सब आर्य अर्थात श्रेष्ठ पुरुषों का परम धर्म है”

वेद कोई मजहबी ग्रंथ नहीं है… क्योंकि यह स्वार्थी मजहबी मनुष्य धर्म गुरुओं पैगंबर द्वारा निर्मित नहीं है|

ना ही वेदों में टोने टोटके उटपटांग कथानक है |

वेद सृष्टि का संविधान है जो प्रत्येक मनुष्य जीव-जंतुओं पर लागू होता है कोई माने या ना माने यह अलग बात है लेकिन उसका उल्लंघन बहुत भारी पड़ता है मानव सभ्यता को…|

आर्य सागर खारी ✍✍✍

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