सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा खारिज किया गया हिंदू राष्ट्र का सिद्धांत संविधान सम्मत नहीं : हिंदू महासभा

नई दिल्ली : सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के इस बयान पर कि भारत हिंदू राष्ट्र नहीं है , क्योंकि हमारे संविधान निर्माताओं ने इसे रिपब्लिक ऑफ़ इंडिया कहा है ना कि हिंदू राष्ट्र , अखिल भारत हिंदू महासभा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है ।

पार्टी ने कहा है कि रिपब्लिक ऑफ इंडिया भारत के गणतंत्र स्वरूप को प्रकट करता है जो इस देश ने संपूर्ण भूमंडल के देशों को प्राचीन काल से प्रदान किया है । पार्टी का स्पष्ट मानना है कि संसार में गणतंत्र की विचारधारा भारत से गई है। इसलिए रिपब्लिक ऑफ इंडिया भारत के उस हिंदू राजनीतिक चिंतन को स्पष्ट करता है जिसका एकाधिकार केवल और केवल हिंदू समाज के पास में है । इसलिए हिंदू राष्ट्र की अवधारणा भारत के रिपब्लिक ऑफ इंडिया के विचार के अनुकूल है।

पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारत की सामासिक संस्कृति के उद्धार और कल्याण के लिए जब संविधान हमें विशेष यत्न करने के लिए कहता है तो वह रिपब्लिक ऑफ इंडिया अर्थात भारत के गणतंत्र संबंधी विचारों और उस सारे चिंतन को प्रचारित और प्रसारित करने और उसे व्यावहारिक रूप में अपनाने के लिए कहता है जो भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के उपरांत ही अपनाए जा सकते हैं। असहमति को लोकतंत्र का ‘सेफ्टी वॉल्व’करार दिया।

ज्ञात रहे कि सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जज डीवाई चंद्रचूड़ ने 15 फरवरी को हिंदू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र की थ्योरी को सिरे से खारिज कर दिया है । जज ने कहा है कि संविधान निर्माताओं ने ‘रिपब्लिक ऑफ इंडिया’ की बुनियाद रखी है। गुजरात में अपने एक लेक्चर के दौरान चंद्रचूड़ ने यह बातें कही। वह 15वें जस्टिस पीडी देसाई मेमोरियल लेक्चर में ‘द ह्यूज दैट मेक इंडिया: बहुलता से बहुवाद तक’ विषय पर अपने विचार रखने अहमदाबाद पहुंचे थे।

इस दौरान उन्होंने कहा ‘संविधान के निर्माताओं ने हिंदू इंडिया और मुस्लिम इंडिया की थ्योरी को खारिज किया है। उन्होंने सिर्फ और सिर्फ ‘रिपब्लिक ऑफ इंडिया’ को मान्यता दी है। हमारा संविधान बहुलवाद की परिकल्पना करता है और कोई भी व्यक्ति या संस्था भारत के विचार पर एकाधिकार का दावा नहीं कर सकती है।’

इस पर अखिल भारत हिंदू महासभा का कहना है कि भारत में बहुलवाद इसीलिए जीवित है कि यहां पर हिंदू राष्ट्र के राजनीतिक चिंतन में विश्वास रखने वाले लोगों की संख्या अधिक है । जिस दिन भारत के ‘सबका साथ सबका विकास ‘ – की भावना में अर्थात ‘सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया’ – की विचारधारा को मानने वाले हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे उस दिन यह विचार स्वयं मर जाएगा । अतः भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना आवश्यक है। जिससे संविधान की मूल भावना का सम्मान हो सके।

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